जो प्रेमी है, वही ईश्वर को पा सकता है

ओशो सिद्धार्थ औलिया ओशोधारा, सोनीपत गुरु गोबिंद सिंह जी (1666-1708 ई.) गुरु सिक्खी परंपरा के दसवें और अंतिम पातशाह हैं. कहते हैं, पटना में उनके जन्म के समय, करनाल (हरियाणा) में रह रहे प्रसिद्ध सूफी फकीर शेख भीखनशाह को किसी मसीहे के जन्म की अनुभूति हुई. वे एक हजार किलोमीटर की यात्रा कर जब पटना […]

ओशो सिद्धार्थ औलिया ओशोधारा, सोनीपत

गुरु गोबिंद सिंह जी (1666-1708 ई.) गुरु सिक्खी परंपरा के दसवें और अंतिम पातशाह हैं. कहते हैं, पटना में उनके जन्म के समय, करनाल (हरियाणा) में रह रहे प्रसिद्ध सूफी फकीर शेख भीखनशाह को किसी मसीहे के जन्म की अनुभूति हुई. वे एक हजार किलोमीटर की यात्रा कर जब पटना पहुंचे, तो वहां शिशु गोबिंद सिंह के दर्शन कर उनका मन आह्लाद से भर गया.

उन्होंने वहीं भविष्यवाणी की कि मानवजाति को इस बालक से बहुत कुछ मिलनेवाला है. यही बालक आगे चलकर एक योद्धा संत के रूप में उभरा.

उन्होंने 14 युद्ध लड़े, लेकिन धर्मांतरण के खिलाफ़ मुगलों के साथ 1704 के उनके युद्ध की बड़ी चर्चा होती है. यह भीषण युद्ध था. गुरु गोबिंद सिंह जी के पास दस हजार सैनिक थे, जबकि मुगलों के पास एक लाख. लेकिन दीये और तूफान के संघर्ष में दीया जीता, तूफान को हार माननी पड़ी. हालांकि युद्ध के बाद की एक घटना ने गोबिंद सिंह जी का जीवन-दर्शन बदल दिया और हम एक योद्धा को एक प्रेमी संत के रूप में पाते हैं.

कहते हैं कि युद्ध के बाद भाई कन्हैया न केवल गुरु गोबिंद सिंह जी के घायल सैनिकों को, बल्कि घायल मुगल सैनिकों को भी पानी पिला रहे थे. शिकायत पहुंची तो गुरु गोबिंद सिंह जी ने कारण पूछा. भाई कन्हैया बोले- ”गुरु जी, मुझे तो कोई दुश्मन दिखाई नहीं देता, मुझे तो सभी में गोबिंद ही दिखाई देते हैं.“ उनके भीतर की संवेदना और प्रेम ने गोबिंद सिंह जी के दर्शन को एक नया आधार दिया और आगे चलकर उन्होंने अपने कई पदों में प्रेम को जितना मूल्य, जितनी गरिमा प्रदान की, वह अद्भुत है.

गोबिंद सिंह जी कहते हैं- प्रेम ही प्रभु का द्वार है और बिना प्रेम के प्रभु तक न जा पाओगे- ”साचु कहों सुन लेहु सभै, जिन प्रेम कीओ, तिन ही प्रभु पाइयो.’’ प्रेम भी तीन तरह का होता है- पहला लौकिक प्रेम, दूसरा गुरु के प्रति प्रेम, जिसको आप श्रद्धा कह सकते हैं और तीसरा गोबिंद के प्रति प्रेम, जिसे भक्ति कहा जा सकता है. जिससे लौकिक प्रेम होता है, दुनिया में उससे सुंदर कोई नहीं दिखता. एक दिन यही प्रेम श्रद्धा बन जाता है. आगे चलकर यही श्रद्धा भक्ति बन जाती है.

गोबिंद सिंह जी कहते हैं- ‘‘जो दोउ लोचन मूंद कै बैठि रहिओ बक धिआन लगाइओ, न्हात फिरिओ लीए सात समुद्रनि लोक गयो परलोक गवाइओ ॥’’ लोग बगुले की तरह आंख बंद करके बैठे रहते हैं, सोचते हैं ध्यान लगाने से परमात्मा मिल जायेगा. तीरथ-व्रत करने से, गंगा नहाने से गोबिंद की प्राप्ति नहीं होती. गुरु की दो आंखों में डूब जाओ, तो फिर सब कुछ पा लेते हो, अन्यथा चाहे सचमुच ही सात समंदर पार कर लो, कुछ भी हाथ नहीं लगता. परलोक तो छूटा ही, इस लोक का समय भी नष्ट हुआ.

गोबिंद सिंहजी कहते हैं- लोग प्रवचन देते हैं, सूत्रों की व्याख्या करते हैं, उपनिषद के, वेदांत के सूत्र समझाते हैं, शास्त्र बताते हैं. ऐसी व्याख्याओं में जीवन बीता जाता है- ‘‘बास कीओ बिखिआन सो बैठ कै ऐसे ही ऐसे सु बैस बिताइओ ॥’’ लेकिन हाथ कुछ भी लगता नहीं.

जब तक ओंकार हाथ न लग जाये, तब तक कुछ भी हाथ नहीं लगता. एक ही पूंजी है और वह है ओंकार. वही परम सत्य है और वह परम सत्य सद्गुरु की आंखों में डूबने से ही मिलता है. जीवित गुरु के प्रेम से ही गोबिंद से प्रेम होता है और गोबिंद से प्रेम होते ही आपकी सारी चाह समाप्त हो जाती है. फिर आप स्वयं शहंशाह हैं, क्योंकि अब आपकी कामनाएं विदा हो गयी हैं.

गुरु गोविंद सिंह का जीवन भक्ति और शक्ति का अद्भुत संगम था. वे अपने में संत और सिपाही, दोनों के गुणों को समेटे थे. धर्म की रक्षा के साथ देश रक्षा के बारे में भी शिक्षा दी. उनके अनुसार सभी धर्मों के पूजा-स्थलों और तरीकों में कोई फर्क नहीं- ‘देहुरा मसीत सोई, पूजा ओ निवाज ओई, मानस सबै एक पै अनेक को भ्रमाउ है.’ अराजक हो चुके आज के माहौल में सही रास्ता निकालने के लिए जरूरी है कि हम भक्ति के नैतिक स्वरूप को अपनाएं और इसी आधार पर शक्ति के सदुपयोग के पथ पर बढ़ा जाये.

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