लिट्टी-चोखे की बढ़ती महिमा

पुष्पेश पंत हमारे प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व असाधारण रूप से करिश्माई है- वह जो कुछ भी करते हैं, चुंबक की तरह दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करता है. हाल ही में जब उन्होंने ‘लिट्टी-चोखे’ का नाश्ता किया, तो करोड़ों देशवासियों का ध्यान पूर्वांचल के इस लोकप्रिय जनसाधारण के खाने की चीज की ओर गया. निश्चय ही […]

पुष्पेश पंत
हमारे प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व असाधारण रूप से करिश्माई है- वह जो कुछ भी करते हैं, चुंबक की तरह दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करता है. हाल ही में जब उन्होंने ‘लिट्टी-चोखे’ का नाश्ता किया, तो करोड़ों देशवासियों का ध्यान पूर्वांचल के इस लोकप्रिय जनसाधारण के खाने की चीज की ओर गया. निश्चय ही आनेवाले दिनों में इसकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी और इस सेहतमंद व संतुलित आहार का प्रचार-प्रसार होगा. पुरानी कहावत है- ‘महाजनो येन गतः स पन्थाः!
वास्तव में यह गरीबों की भली देहाती खूराक हाल के वर्षों में देश के महानगरों में अपने पैर पसारने में कामयाब रही है. राजधानी दिल्ली में और कोलकाता में ही नहीं, बंगलुरू तक में लिट्टी-चोखा बेचनेवाले भोजनालय खुल चुके हैं. लिट्टी राजस्थान की बाटी की तरह गोबर के उपलों की धीमी आंच पर सेंकी जाती है और इस गोले के भीतर भरा रहता है सत्तू. चोखे को आप आलू का भरता कह सकते हैं, पर इसका मजा निराला होता है. कुछ लोग आलू के साथ बैंगन, टमाटर आदि भी मिला लेते हैं. सात्विक रखना हो, तो प्याज को अलग रख हरी मिर्च, धनिया, अदरक को यथेष्ठ समझा जाता है. नाम सार्थक करनेवाले तीखेपन के लिए सरसों के कच्चे तेल को काम में लाया जाता है. कहीं कहीं अचार के तेल के प्रयोग से इसमें अचारी मसाले का पुट भी डाला जाता है.
यह न समझें कि लिट्टी का आनंद मात्र शाकाहारियों के लिए है. हमारे एक बिहारी मित्र ने छत पर चंपारण का मिर्च-मसालेदार मटन बनाकर उसकी जुगलबंदी लिट्टी से करायी, जो किसी भी कोरमे-नान-खमीरी रोटी को मात दे रही थी. स्वादिष्ट तरी को सोखने के बाद लिट्टी का निवाला अलौकिक आनंद दे रहा था. इसी तरह चोखे का सामिष रूपांतरण ‘पॉट बेली’ नामक रेस्तरां चलानेवाली पूजा साहू कर चुकी हैं. मड़ुये की नन्हीं पूरियों को वह हिलसा मछली के चोखे से भर कर मेहमानों को चकित करती रही हैं.
इस तरह के प्रयोगों का भविष्य क्या होगा कहना कठिन है, परंतु यह बात निर्विवाद है कि लिट्टी-चोखा का जायका एक बार जिसकी जुबान पर चढ़ा उतरता नहीं. कभी सड़क किनारे रेड़ियो, खोमचों पर जो सस्ती पेट भरने की सामग्री बिकती थी, वह पराठों, पूरी सब्जी, छोले भटूरों/कुल्चों तक सीमित थी. फिर इस सूची में चाउमीन और मोमो जुड़ गये. आज लिट्टी-चोखा का जादू इन सभी के सर पर चढ़ कर बोल रहा है.
यहां इस बात को रेखांकित करने की जरूरत है कि यह स्वदेशी ‘फास्ट फूड’ सिर्फ प्रवासी पूर्वांचली आबादी की पसंद के कारण लोकप्रिय नहीं हो रहा है. इसे खड़े-खड़े निबटाया जा सकता है, यह किफायती होने के साथ-साथ कम कीमत पर पेट भरने में समर्थ है.
राजस्थानियों को यह उनकी बाटी की याद दिलाता है, तो मध्य प्रदेश वालों को बाफलों की. चोखे की रिश्तेदारी भरते के साथ-साथ पराठों में भरे जानेवाली सामग्री का स्मरण कराती है. जाहिर है कि शहरों में बाटी उपलों पर नहीं सेंकी जा सकती है, अतः कबाब की तरह सिगड़ी पर कोयले की आंच काम आती है. स्टेनलेस स्टील के बर्तन में धूल-गर्द-मक्खी से बचा कर रखा महीन कपड़े या जाली से ढका चोखा सेहत की चिंता करनेवालों को भी निरापद लगता है. अगर बहुत भूख न लगी हो, तो इसे मिल-बांट कर खाना आसान है.
लिट्टी-चोखे
पूर्वांचल से निकला लिट्टी-चोखा आज महानगरों में भी अपना जादू बिखेर रहा है.
यह व्यंजन सस्ता भी है और संतुलित भी तथा आसानी से खड़े-खड़े भी खाया जा
सकता है.
लिट्टी-चोखा शाकाहारियों के लिए तो है ही, इसका मजा मटन के साथ भी उठाया जा सकता है.
प्रधानमंत्री मोदी के खाने के बाद इसका चौतरफा प्रचार-प्रसार होना स्वाभाविक है.

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat khabar digital desk

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >