अमित शाह का दिल्ली के नतीजों पर क्यों है मुँह बंद

AFP दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अमित शाह ख़ामोश हैं. उन्होंने ये लेख लिखे जाने तक न तो अरविंद केजरीवाल को बधाई दी है न अपनी पार्टी की हार पर ही कोई टिप्पणी की है. ये सच है कि पार्टी की कमान अब उनके […]

<figure> <img alt="अमित शाह" src="https://c.files.bbci.co.uk/185D4/production/_110869799_059144252-1.jpg" height="549" width="976" /> <footer>AFP</footer> </figure><p>दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अमित शाह ख़ामोश हैं. उन्होंने ये लेख लिखे जाने तक न तो अरविंद केजरीवाल को बधाई दी है न अपनी पार्टी की हार पर ही कोई टिप्पणी की है. ये सच है कि पार्टी की कमान अब उनके हाथ नहीं है.</p><p>लेकिन जिस तरह दिल्ली के चुनाव प्रचार में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, शाहीन बाग़ का मुद्दा उठाया, सीएए की बात की, वोटरों से शाहीन बाग़ तक करंट पहुँचाने की अपील की, उससे लग रहा था कि उनके लिए ये चुनाव कितने अहम हैं.</p><p>दिल्ली में भाजपा को हारना था और वह हार गई. लेकिन सवाल है कि उसकी हार के कारण क्या हैं. साथ ही कि इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? क्योंकि दिल्ली में भाजपा की यह लगातार छठी हार है.</p><p>दो दशक से हारते जाने का मतलब है कि दिल्ली भाजपा में कुछ बुनियादी ख़ामी है, लेकिन इस हार से ब्रैंड अमित शाह को नुक़सान हुआ है.</p><p>पहले बात ताज़ा चुनाव की करते हैं. भाजपा की हार के कारणों की पड़ताल करें तो पांच बातें उभरकर आती हैं. एक, पार्टी की चुनावी रणनीति को अरविंद केजरीवाल ने फेल कर दिया. दूसरा, संगठन की अक्षमता. तीसरा, बाहरी नेताओं/कार्यकर्ताओं पर भरोसा. चौथा, आम आदमी पार्टी की सरकार की खामियों को उजागर करने में नाकामी. पाचवां, परसेप्शन की लड़ाई हार जाना.</p><p><strong>नहीं </strong><strong>काम आया</strong><strong> शाहीन बाग़ का मुद्दा</strong></p><p>भाजपा की चुनावी रणनीति कैसे फेल हुई? पार्टी ने एक मुद्दे पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा किया. वह मुद्दा था शाहीन बाग़ में नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में मुस्लिम औरतों का धरना. भाजपा को इसमें अवसर नज़र आया. </p><p>एक, इसके ज़रिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया जा सकता है. दूसरे, इस धरने के कारण सड़क बंद होने से जिन क़रीब 25-30 लाख लोगों को रोज़ परेशानी हो रही है, उनका ग़ुस्सा. दोनों उल्टा पड़ा. सड़क बंद होने से लोगों में ग़ुस्सा तो था लेकिन वे समझ गए कि केंद्र सरकार यानी भाजपा जानबूझ कर धरने पर बैठे लोगों को नहीं हटा रही है.</p><p>लोग कहने भी लगे थे जिस सरकार को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने में दर नहीं लगी, उसके लिए धरने पर बैठे लोगों को हटाना कौन सा मुश्किल काम है. इसलिए ये नाराज़ लोग या तो वोट देने नहीं गए और जो गए उन्होंने भाजपा के ख़िलाफ़ वोट दिया.</p><p>शाहीन बाग़ का मुद्दा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए ज़रूरी था कि इसमें अरविंद केजरीवाल कूदें. लेकिन भाजपा की तमाम कोशिशों के बावजूद केजरीवाल ने शाहीन बाग़ जाना तो दूर इस मुद्दे पर कुछ बोला ही नहीं.</p><figure> <img alt="केजरीवाल" src="https://c.files.bbci.co.uk/78B0/production/_110869803_059880873-1.jpg" height="549" width="976" /> <footer>AFP</footer> </figure><p>इतना ही नहीं वे खुलकर सीएए के ख़िलाफ़ भी नहीं बोले. अनुच्छेद 370 और तीन तलाक़ पर तो केजरीवाल ने मोदी सरकार का साथ दिया. भाजपा ने केजरीवाल को तमाम तरह से घेरने की कोशिश की कि वे शाहीन बाग़ के मुद्दे पर खुलकर सामने आएं. इसका नतीजा यह हुआ कि ध्रुवीकरण न होता देख भाजपा की हताशा बढ़ने लगी.</p><p>ऐसे में उसके नेता भारत-पाकिस्तान, गद्दारों को गोली मारने, आतंकवादी और न जाने क्या बोलने लगे. इससे फ़ायदा होने की बजाय नुक़सान हुआ. जब भी किसी लोकप्रिय नेता पर व्यक्तिगत आक्रमण होता है तो आक्रमण करने वाले को नुक़सान होता है. यह बात भाजपा से बेहतर कौन समझ सकता है. मोदी को उनके विरोधियों ने जितनी गाली दी मोदी को उतना ही फ़ायदा हुआ. यह जानते हुए भी भाजपा ने केजरीवाल पर निजी हमले क्यों किए यह समझ से परे है.</p><h1>जब अमित शाह ने थामी कमान</h1><p>इस रणनीति को फेल होता देख अमित शाह ने चुनाव की कमान एक तरह से अपने हाथ में ले ली. उन्हें लगा कि शाहीन बाग़ के मुद्दे पर वे बोलेंगे तो मतदाता पर असर पड़ेगा. यह भी नहीं चला. उसके बाद उन्होंने न केवल अपनी रैलियों की संख्या बढ़ा दी बल्कि नुक्कड़ सभाएं भी करने लगे.</p><p>पार्टी के दूसरे नेताओं से भी कहा गया कि वे बड़ी रैलियों की बजाय नुक्कड़ सभाओं पर ध्यान दें. उन्होंने चुनाव को एक तरह से केजरीवाल बनाम अमित शाह बना दिया. फिर भी भाजपा का 22 साल का वनवास ख़त्म नहीं हुआ. क्षेत्रीय दलों से चुनावी लड़ाई में भाजपा की हार का एक नया आयाम है. </p><figure> <img alt="नरेंद्र मोदी" src="https://c.files.bbci.co.uk/C6D0/production/_110869805_059744519-1.jpg" height="549" width="976" /> <footer>AFP</footer> </figure><p>अमित शाह का कोई भी दांव नतीजे को बदलना तो दूर लड़ाई को नजदीकी बनाने में भी कामयाब नहीं हुआ, यह हार उन्हें काफ़ी समय तक खलेगी.</p><p>दिल्ली में भाजपा का संगठन उसकी पुरानी दुखती रग है. यहां नेता अपने राजनीतिक विरोधियों से ज़्यादा अपने लोगों से लड़ते हैं. एक विधानसभा सीट जीतने की जिनकी हैसियत नहीं है उनका मुगालता आसमान छूने वाला है. साल 2015 में हार के बाद भाजपा ने कोई सबक नहीं सीखा.</p><h1>नेतृत्व का संकट और मनोज तिवारी</h1><p>अगले चुनाव की कोई तैयारी नहीं की. अक्षम सतीश उपाध्याय की जगह प्रदेश की बागडोर मनोज तिवारी को सौंप दी. उन्हीं मनोज तिवारी को जिन्हें राजनीति में अमर सिंह लाए और गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़वाया. बात सिर्फ़ इतनी नहीं है कि वे दूसरी पार्टी से आए हैं. उनका राजनीति में योगदान शून्य है. </p><p>भाजपा की विचारधारा से उनका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है. पार्टी को पता है कि दिल्ली में कांग्रेस के समय से ही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है झुग्गी झोपड़ी के वोटरों में जनाधार न होना. कांग्रेस का वह जनाधार केजरीवाल ले गए. उसमें सेंध लगाने के लिए भाजपा ने पिछले पांच साल में कोई प्रयास नहीं किया.</p><p>इसके बावजूद कि मोदी-शाह के युग में शहरी ग़रीबों में भाजपा का वोट काफ़ी बढ़ा है. लेकिन दिल्ली में वह नौ दिन में अढ़ाई कोस भी नहीं चल पाई. चुनाव के समय झुग्गी-झोपड़ी पर्यटन से न कुछ होना था और न हुआ. प्रदेश के बाहर के नेताओं की चुनाव के समय भीड़ जुटाने का 2015 में दिल्ली और बिहार दोनों जगह नुक़सान हुआ और पार्टी ने यह नीति बदली.</p><p>लेकिन इस बार दिल्ली में वही ग़लती दोहराई. बाहर से लोग आते हैं तो स्थानीय कार्यकर्ता निष्क्रिय हो जाता है. यह जानते हुए भी पार्टी ने ऐसा किया. इन बाहरी लोगों के भरोसे 15 दिन में चुनाव पलट देने की अमित शाह की रणनीति फेल हो गई. जबकि अमित शाह ख़ुद ही कहते हैं कि आख़िरी समय पर कोई चुनाव नहीं बदलता. मतदाता चुनाव से छह महीने पहले ही अपना मन बना लेता है कि किसे वोट देना है.</p><figure> <img alt="अमित शाह" src="https://c.files.bbci.co.uk/2A90/production/_110869801_059309169-1.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Reuters</footer> </figure><h1>केजरीवाल के काम पर ज़ोर का नहीं मिला काट</h1><p>आम आदमी पार्टी ने आठ महीने पहले से अपनी चुनावी तैयारी शुरू कर दी थी, जब मुफ्त योजनाओं की घोषणा होने लगी. लोकसभा चुनाव बाद केजरीवाल ने हार से सबक लिया कि मोदी पर निजी हमले से नुक़सान हो रहा है. और उसके बाद मोदी पर निजी हमले छोड़िए, ख़िलाफ़ बोलने से भी बचने लगे.</p><p>केजरीवाल सरकार ने इस बात का बड़ा प्रचार किया कि बजट का 27 फ़ीसदी शिक्षा पर ख़र्च किया. लेकिन इतने बड़े आबंटन से पांच साल में कोई नया स्कूल, कॉलेज नहीं खुला. छात्रों की संख्या घट गई और परीक्षा परिणाम पहले से ख़राब हो गए. फिर पैसे का किया क्या?</p><p>तो पुराने स्कूलों में कुछ नए कमरे बनवाए, रंग रोगन किया, फर्नीचर और बच्चों की यूनिफार्म बदल दी. इसी तरह दूसरी योजनाओं की खामियों को लोगों तक पहुंचाने में भाजपा नाकाम रही.</p><p>भाजपा की पांचवीं खामी थी, केजरीवाल को मुस्लिम समर्थक या हिंदू विरोधी साबित करने की कोशिश, जिसमें वह औंधे मुहं गिरी. केजरीवाल ने हनुमान चालीसा का पाठ करके नरम हिंदुत्व का जो कार्ड खेला उससे भाजपा चित हो गई. वह इस मुद्दे पर केजरीवाल पर जितनी आक्रामक हुई उन्हें उतना ही फ़ायदा मिला. </p><p>इस हार में भाजपा के लिए संतोष की एक ही बात है कि इसे उसके राष्ट्रवाद या हिंदुत्व के एजेंडे की हार के रूप में पेश करना उसके विरोधियों के लिए कठिन होगा. केजरीवाल ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि वे भाजपा के इस एजेंडे के ख़िलाफ़ हैं. दरअसल केजरीवाल और उनकी पार्टी की कोई विचारधारा है ही नहीं.</p><p>भाजपा के एजेंडे पर उनके मौन को स्वीकृति समझ लिया जाय तो उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं है. सात साल पहले जो केजरीवाल अपने को नास्तिक कहते थे, वे आज हनुमान भक्त हो गए. इससे भाजपा को तब तक चिंता नहीं होगी जब तक केजरीवाल अपने को दिल्ली तक सीमित रखते हैं.</p><p><strong>(</strong><strong>बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां </strong><a href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi">क्लिक</a><strong> कर सकते हैं. आप हमें </strong><a href="https://www.facebook.com/bbchindi">फ़ेसबुक</a><strong>, </strong><a href="https://twitter.com/BBCHindi">ट्विटर</a><strong>, </strong><a href="https://www.instagram.com/bbchindi/">इंस्टाग्राम</a><strong> और </strong><a href="https://www.youtube.com/bbchindi/">यूट्यूब</a><strong> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</strong></p>

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By Prabhat khabar digital desk

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