इस्लाम फोबिया पर सिनेमा की नजर

अजित राय वरिष्ठ फिल्म समीक्षक हाल ही में संपन्न हुए भारत के 50वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में ऐसी कई फिल्में दिखायी गयीं, जो इस्लाम फोबिया से ग्रस्त हमारी दुनिया में अंतर्धार्मिक रीति-रिवाजों की टकराहट को सामने लाती हैं. समारोह की ओपनिंग फिल्म ‘डिस्पाइट द फाग’ यूरोप में जारी मुस्लिम शरणार्थियों की समस्या की पृष्ठभूमि में […]

अजित राय

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक
हाल ही में संपन्न हुए भारत के 50वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में ऐसी कई फिल्में दिखायी गयीं, जो इस्लाम फोबिया से ग्रस्त हमारी दुनिया में अंतर्धार्मिक रीति-रिवाजों की टकराहट को सामने लाती हैं. समारोह की ओपनिंग फिल्म ‘डिस्पाइट द फाग’ यूरोप में जारी मुस्लिम शरणार्थियों की समस्या की पृष्ठभूमि में एक अनाथ बच्चे की कहानी है.
सर्बिया के चर्चित फिल्मकार गोरान पास्कलजेविक ने यूरोपीय देशों में मुस्लिम शरणार्थियों की स्वीकृति और अस्वीकृति का मुद्दा उठाया है. इससे पहले वे उत्तराखंड में विक्टर बैनर्जी को लेकर ‘देवभूमि’ फिल्म बना चुके हैं, जिसे अमेजन पर तकरीबन एक करोड़ लोग देख चुके हैं.
फिल्म ‘डिस्पाइट द फाग’ युद्ध के खिलाफ एक राजनीतिक टिप्पणी है. यूरोप में जारी मुस्लिम शरणार्थियों के विरोध के घनघोर माहौल में गोरान पास्कलजेविक सवाल करते हैं कि कोई भी अपना देश और संस्कृति शौक से नहीं, मजबूरी में ही छोड़ता है. आठ साल का मोहम्मद स्वीडन से इटली आने के दौरान अपने पिता से बिछड़ गया है. वह रोम की सुनसान सड़क के बस अड्डे पर ठंड से बचने की असफल कोशिश करता है.
रात गहरा रही है, लेकिन संकट यह है कि सुबह से पहले कोई दूसरी बस नहीं आयेगी. रेस्त्रां मैनेजर पाउलो उसे अपने घर ले आता है. थोड़ी हिचकिचाहट के बाद उसकी पत्नी वेलेरिया उसे घर में रखने को राजी हो जाती है.
मोहम्मद अपनी मुस्लिम पहचान के प्रति सचेत है. वह कमरे में छुपकर नियम से नमाज पढ़ता है, जबकि वेलेरिया उसमें अपने मर चुके बेटे मार्को की छवि देखने लगती है. क्रिसमस आनेवाला है और सारा रोम उसकी तैयारी में जुटा हुआ है. ईसाई संस्कृति से अनजान मोहम्मद को अकेलापन महसूस होता है और वह बार-बार स्वीडन जाने की जिद करता है.
फिल्म में धार्मिक रीति-रिवाज को लेकर कई बहसें हैं. अधिकतर ईसाई परिवार मोहम्मद को रखने के खिलाफ हैं. क्रिसमस की सुबह पाउलो के कहने पर मोहम्मद को लेने पुलिस आती है, पर तब तक वेलेरिया उसे लेकर स्वीडन की ओर निकल चुकी होती हैं. गहरी धुंध से भरी वीरान सड़क पर कार में वेलेरिया और मोहम्मद दूर जाते दिखते हैं.
मास्टर फ्रेम खंड में बेल्जियम के ज्यां पियरे और लुक दारदेन की फिल्म ‘यंग अहमद’ दुनियाभर में कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों द्वारा जेहाद के नाम पर बच्चों के दिमाग में हिंसा का जहर घोलने की साजिशों के खिलाफ एक सिनेमाई प्रतिरोध है. तेरह साल का अहमद एक मौलवी के चक्कर में जेहादी बनना चाहता है.
वह जेहाद के अभ्यास के लिए अपनी ईसाई टीचर की हत्या का असफल प्रयास करता है. उसे सुधारने के लिए एक फार्म हाउस में रखा जाता है. फार्म हाउस के मालिक की बेटी लूइस एक दिन उसे प्यार से चूम लेती है. अहमद को लगता है कि वह इस चुंबन से अपवित्र हो गया और उसका जेहाद खतरे में पड़ गया.
वह लूइस को कहता है कि उसके चुंबन से वह अपवित्र हो गया है, इसलिए वह इस्लाम कबूल कर ले, जिससे सब ठीक हो जाये. अहमद की मां, टीचर, जज, वकील, मनोवैज्ञानिक, सहपाठी, दोस्त- किसी को सपने में भी यकीन नहीं हो सकता कि अहमद जैसा मासूम बच्चा सच्चा मुसलमान बनने के लिए दूसरे की हत्या करने का निर्णय ले सकता है. यह फिल्म यूरोप में मुस्लिम बच्चों के मनोविज्ञान को सादगी से सामने लाती है.
कैंपस थियेटर
विवि कैंपस में रंगमंच पर कोई व्यावसायिक या कलात्मक दबाव नहीं रहता, तो यह साहस रहता है कि कलात्मकता और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में प्रयोग किये जाते रहें. यहां युवाओं के बीच की जानेवाली रंगमंचीय गतिविधियों का लाभ बहुमुखी भी है.

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