‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ चिल्लाने वाली लड़कियां ही लाएंगी बदलाव: वुसत का ब्लॉग

Arooj Aurangzeb/Facebook फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की याद में मेला हर साल ही लाहौर में होता है और इस मेले में सबसे ज़्यादा इक़बाल बानो की गाई वो नज़्म ही सुनाई पड़ती है: ‘लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, वो दिन कि जिसका वादा है.'पर इस बार फ़ैज़ […]

<figure> <img alt="उरूज औरंगज़ेब" src="https://c.files.bbci.co.uk/181DD/production/_109818789_45f785ec-ed06-402d-b9f0-a0182629319f.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Arooj Aurangzeb/Facebook</footer> </figure><p>फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की याद में मेला हर साल ही लाहौर में होता है और इस मेले में सबसे ज़्यादा इक़बाल बानो की गाई वो नज़्म ही सुनाई पड़ती है: ‘लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, वो दिन कि जिसका वादा है.'</p><p>पर इस बार फ़ैज़ मेले में जिस नज़्म को सबसे ज़्यादा टीआरपी मिली, वो राम प्रसाद बिस्मिल अज़ीमाबादी की 98 वर्ष पुरानी नज़्म<strong> ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है’ </strong>रही. </p><p>सब जानते हैं कि शहीद-ए-आज़म भगत सिंह पर जो भी फ़िल्मी खेल बनता है, उसमें ये नज़्म ज़रूर डाली जाती है. मगर इस वर्ष पाकिस्तानी युवाओं की नई पीढ़ी ने नस्ल-दर-नस्ल चलने वाली इस नज़्म को एक नई ज़िंदगी दी. </p><p>कुछ सिरफ़िरे नौजवानों ने फ़ैज़ मेले में इस नज़्म को नारे की तरह गाया. </p><p>इस भीड़ में सबसे जोशीली और ऊंची आवाज़ उरूज औरंगज़ेब की थी. तब से उरूज औरंगज़ेब कम से कम सोशल मीडिया की हद तक, नई पीढ़ी के लिए उत्साह का निशान बन गई हैं. </p><p>कोई भी देश जो बहुत देर से किसी सच्ची तब्दीली के लिए जूझ रहा हो, वहां अगर कोई महिला स्टार बनकर उभरे तो इसका मतलब ये है कि परिवर्तन की भूख कितनी गहरी है. </p><p><strong>ये भी पढ़ें</strong><strong>:</strong><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-47512760?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">एक चीज़, जिससे लड़कियों को चाहिए आज़ादी</a></p><figure> <img alt="उरूज औरंगज़ेब" src="https://c.files.bbci.co.uk/7455/production/_109818792_853f3f19-b92b-4ed1-8047-2bd3e0157120.jpg" height="688" width="483" /> <footer>Social Media/You Tube Grab</footer> <figcaption>उरूज औरंगज़ेब की नारे लगते वीडियो वायरल हो रही है.</figcaption> </figure><p>जैसे यमन में जब 2011 में अरब स्प्रिंग की लहर आई तो अली अब्दुल्ला सालेह की तानाशाही को चैलेंज करने वालों में तवक्कुल किरमान आगे-आगे थीं. </p><p>तवक्कुल को इसी वर्ष नोबेल सम्मान भी मिला. </p><p>जेएनयू में जब तीन वर्ष पहले सरकारी दख़लअंदाज़ी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए तब पाकिस्तानी छात्रों में सबसे लोकप्रिय दो नाम थे- कन्हैया कुमार और शहला रशीद. </p><p>दिसंबर 2017 में ईरान में हिजाब की सरकारी ज़बरदस्ती के ख़िलाफ़ जो प्रदर्शन हुए, उसमें विदा महाविद की तस्वीर सबसे ज़्यादा वायरल हुई. </p><p>विदा ने तेहरान में एक ऊंची जगह चढ़कर अपने सफ़ेद स्कार्फ़ को झंडे की तरह फहराया. वो गिरफ़्तार भी हुईं मगर इस तस्वीर ने बाक़ी ईरानी औरतों को प्रेरित किया.</p><p><strong>ये भी पढ़ें</strong><strong>: </strong><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-45769338?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">औरतें यौन शोषण पर इतना बोलने क्यों लगी हैं</a></p><figure> <img alt="विदा महाविद" src="https://c.files.bbci.co.uk/AC3B/production/_109819044_29fcad58-72b0-416e-aef2-4085044b808d.jpg" height="549" width="976" /> <footer>BBC</footer> <figcaption>विदा महाविद ने अपने हिजाब को कुछ यूं लहराया था</figcaption> </figure><p>पिछले अप्रैल में सूडान की राजधानी ख़ार्तूम में जिस नौजवान जत्थे ने सेना के हेडक्वॉर्टर के सामने कई दिन धरना दिया, इस धरने को 22 बरस का सफ़ेद लिबास वाली एक लड़की आला सलह लीड कर रही थी. </p><p>बेरूत में भ्रष्ट शासन और राजनीति के ख़िलाफ़ पिछले दो महीने से जो आंदोलन चल रहा है, उसमें भी महिलाएं सबसे आगे हैं. </p><p>इनमें से एक महिला, जिसने मंत्री का बॉडीगार्ड को किक मारी, उसकी चर्चा तो आज तक है.</p><p>पाकिस्तान में मानवाधिकारों से जुड़ी वकील आसमा जहांगीर के बारे में कहा जाता था कि वो ‘पाकिस्तान का सबसे दलेर मर्द’ थीं.</p><p><strong>ये भी पढ़ें</strong><strong>: </strong><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-42092697?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">’हां, मैं मां नहीं बनना चाहती…तो? </a></p><figure> <img alt="सूडान" src="https://c.files.bbci.co.uk/FA5B/production/_109819046_70c2871b-657e-4461-b017-adf7d36f0597.jpg" height="549" width="976" /> <footer>BBC</footer> <figcaption>सूडान में क्रांति का प्रतीक बनी महिला</figcaption> </figure><p>दो वर्ष पहले उनके देहांत के बाद कुछ अरसे एक कमी महसूस होती रही. मगर अब उरूज औरंगज़ेब, जलीला हैदर और ग्रेटा थनबर्ग जैसी लड़कियों को देखकर लगता है कि जो परिवर्तन हमारी नस्ल न ला सकी, शायद इक्कीसवीं शताब्दी के ये लड़के-लड़कियां ले आएं और हम उन्हें ही क़ामयाब देखकर थोड़ा सा ख़ुश हो लें और अपनी नाक़ामयाबी सकें, थोड़ी देर के लिए ही सही. </p>

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By Prabhat khabar digital desk

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