शांति की खोज में हिंसक यात्राएं

अजित रायपत्रकार एवं लेखक इस समय फ्रांस की दर्जनभर चर्चित फिल्मों में शांति की खोज का स्वर प्रमुखता से उभरा है. उनमें से दो फिल्मों का उल्लेख करना बहुत जरूरी है. एक है शाक ओदियार की फिल्म ‘दीपन’ और दूसरी है लुक बेसां की फिल्म ‘द लेडी’.विश्व सिनेमा में इस समय एक स्वर बड़ा मुखर […]

अजित राय
पत्रकार एवं लेखक

इस समय फ्रांस की दर्जनभर चर्चित फिल्मों में शांति की खोज का स्वर प्रमुखता से उभरा है. उनमें से दो फिल्मों का उल्लेख करना बहुत जरूरी है. एक है शाक ओदियार की फिल्म ‘दीपन’ और दूसरी है लुक बेसां की फिल्म ‘द लेडी’.विश्व सिनेमा में इस समय एक स्वर बड़ा मुखर है- शांति की खोज. आश्चर्य है कि फ्रेंच फिल्मों का भी यहीं स्वर है. फ्रांस की जो दर्जनभर फिल्में इधर चर्चा में रही हैं, उनमें यह स्वर प्रमुखता से उभरा है. उदाहरण के लिए उनमें से दो फिल्मों का उल्लेख हम कर सकते हैं. एक है शाक ओदियार की ‘दीपन’ और दूसरी है लुक बेसां की ‘द लेडी’.
विश्व सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में शुमार ओदिआर की फ्रेंच फिल्म ‘दीपन’ को कान फिल्म समारोह (2015) में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पाम दि ओर पुरस्कार मिल चुका है. इस वक्त ओदिआर को फ्रांस में कई वजहों से भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है. एक तो उन्होने फ्रांस में कानून-व्यवस्था को अराजक और इंग्लैंड को सबसे अच्छा दिखाया है. दूसरे, मुख्य भूमिकाओं में श्रीलंकाई-भारतीय लोगों को लिया है.
विश्व सिनेमा में यह पहली बार देखा जा रहा है कि एक फ्रेंच फिल्म के अधिकतर संवाद तमिल में हैं. नायक की भूमिका निभानेवाले जेसुदासन एंटनीदासन असल जिंदगी में श्रीलंका के जाफना मेंतमिल टाइगर रहे हैं, जो चेन्नई- थाइलैंड होते हुए 1993 में फ्रांस में राजनीतिक शरण लेते हैं.
इस फिल्म से पहले लीना मणिमेखलै की एक तमिल भारतीय फिल्म ‘सेंगदल’ में वे लेखन और अभिनय कर चुके हैं. पेरिस में कई छोटे-मोटे काम करते हुए वे कम्युनिस्ट पार्टी के एक धड़े से जुड़े. उन्होंने शोभाशक्ति नाम से तमिल में लिखना शुरू किया. उनके अनुभवों पर आधारित दो उपन्यास- गुरिल्ला (2001) और गद्दार (2004) दुनियाभर में चर्चित रहे हैं.
फिल्म में उनकी नकली पत्नी की भूमिका में चेन्नई की कालीश्वरी श्रीनिवासन हैं, जिनका सिनेमा से कोई खास रिश्ता कभी नहीं रहा. हालांकि, वे रंगमंच से जुड़ी रहीं हैं. बच्ची की भूमिका क्लोदैन वीणासितंबी ने की है.
यह फिल्म जाफना के जंगल में आधी रात को मारे गये तमिल टाइगरों के सामूहिक शवदहन के बाद हमारे नायक द्वारा चिता में अपनी वर्दी जलाने के दृश्य से शुरू होती है. उसे दीपन नाम के एक मृत श्रीलंकाई तमिल परिवार के जाली पासपोर्ट पर एक अनजान युवती को पत्नी और उसके द्वारा गोद ली गयी अनाथ बच्ची को बेटी बनाकर पेरिस पहुंचना है.
इस खतरनाक यात्रा के बाद दीपन को पेरिस के रिफ्यूजियों के एक ऐसे मोहल्ले की देखभाल का काम मिलता है, जहां गैर-फ्रांसीसी गुंडे अपराधी और गैर-कानूनी काम करनेवालों का राज चलता है.
रोज-रोज के गैंगवार में अपनी नयी गृहस्थी को बचाने के लिए उसे फिर से हथियार उठाना पड़ता है. यहां उसे श्रीलंका में ली गयी गुरिल्ला ट्रेनिंग काम अाती है. साथ रहते हुए तीनों में सचमुच के परिवार की भावना विकसित होती है. तीन अनजान बाशिंदों का एक परिवार में बदलना ही फिल्म का मर्म है. युवती को जल्दी ही समझ में आ जाता है कि फ्रांस में वे कभी शांति से नहीं जी सकेंगे.
वह हमारे नायक से बार-बार लंदन चलने की जिद्द करती है. अंत में, नायक का नकली परिवार असली परिवार बनकर लंदन में सुखमय जीवन बिताने लगता है. फिल्म यह साबित करती है कि कई बार जिंदगी की असली कहानियां सिनेमा की फंतासियों से ज्यादा दिलचस्प होती हैं.
लुक बेसां की ‘द लेडी’ बर्मा (म्यांमार) की मशहूर शख्सियत आंग सांन सू की के जीवन पर बनी है, जिन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला था. म्यांमार में सैनिक तानाशाही के खिलाफ जनमत बनाने में इस फिल्म की निर्णायक भूमिका रही है. साल 1947 में सू की के पिता बर्मा के स्वाधीनता आंदोलन के अगुआ नेता थे. 19 जुलाई, 1947 को सैनिक वर्दी में सशस्त्र हमलावरों ने उनकी और उनके साथियों की हत्या कर दी थी.
तब सू की दो साल की थी. बड़ी होकर वह पढ़ने के लिए इंग्लैंड के आॅक्सफोर्ड विवि गयीं, जहां ब्रिटिश नागरिक माइकल ऐरिस से उन्होंने प्रेम विवाह किया. अपनी मां को देखने 1988 में वे यंगून लौटीं, तो फिर वापस नहीं जा पायीं.
यह पूरी फिल्म हिंसा के माहौल में शांति की कोशिश और उम्मीद की कहानी है. एक दृश्य में सू की एक सैनिक से बात करना चाहती हैं, तो वह कहता है कि उसे राजनीति से कोई मतलब नहीं. सू की का जवाब है- ‘भले ही तुम राजनीति के बारे में दिलचस्पी मत रखो, पर राजनीति हमेशा तुम्हारे बारे में दिलचस्पी रखती है.’

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By Prabhat khabar digital desk

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