रंगमंच को समझना-परखना सिखाता नेमिचंद्र का लेखन

अमितेश रंगकर्म समीक्षक भारतीय रंगमंच को समझने के लिए कौन-सी किताब बेहतर है? इसके जवाब में अगर ‘रंग दर्शन’ का नाम लिया जाये, तो शायद ही किसी को आपत्ति हो. ‘रंग दर्शन’ भारतीय रंगमंच की प्रवृत्तियों, विशेषताओं, सौंदर्य, सामाजिकता, ऐतिहासिकता, व्यवहारिकता आदि को एक साथ समझने के लिए एक समग्र किताब है. इस किताब के […]

अमितेश

रंगकर्म समीक्षक
भारतीय रंगमंच को समझने के लिए कौन-सी किताब बेहतर है? इसके जवाब में अगर ‘रंग दर्शन’ का नाम लिया जाये, तो शायद ही किसी को आपत्ति हो. ‘रंग दर्शन’ भारतीय रंगमंच की प्रवृत्तियों, विशेषताओं, सौंदर्य, सामाजिकता, ऐतिहासिकता, व्यवहारिकता आदि को एक साथ समझने के लिए एक समग्र किताब है. इस किताब के लेखक नेमिचंद्र जैन की यह जन्मशताब्दी का वर्ष है.
नेमिचंद्र जैन ‘तार सप्तक’ के कवि और ‘अधूरे साक्षात्कार’ उपन्यास आलोचना की किताब के लेखक के रूप में साहित्य जगत में अपनी छवि बना चुकने के बाद रंग आलोचना में आये, तो इसी में रम गये और रंग आलोचना की एक नयी जमीन तैयार की. साल 1967 में ‘रंग दर्शन’ के प्रकाशन से दो साल पहले 1965 में उन्होंने नटरंग पत्रिका की शुरुआत की. नटरंग, रंगमंच की अनिवार्य पत्रिका है, जिसका निरंतर प्रकाशन होता है.
आजादी के बाद के भारतीय रंगमंच का इतिहास नटरंग में पढ़ा जा सकता है, जिसमें केवल दिल्ली शामिल नहीं है, छोटे-छोटे शहर भी हैं. हिंदी रंगमंच पर जब ‘नाटक नहीं हैं’ का राग अलापा जा रहा था, तब नटरंग ने रंगकर्मियों को मंचन योग्य नाटक उपलब्ध कराया. भारतीय रंगमंच का शायद ही कोई ऐसा पहलू है, जिसकी चर्चा नटरंग में नहीं है और शायद ही कोई ऐसा मूर्धन्य है, जिसका लेख नटरंग में नहीं है.
नेमि जी ने नटरंग प्रतिष्ठान की स्थापना करके रंगकर्म के क्षेत्र में शोध करनेवालों को उपहार दिया. नटरंग के पास दुर्लभ दस्तावेजों का ऐसा जखीरा है, जिससे गुजरे बिना रंगकर्म पर शोध मुश्किल है. हिंदी रंगआलोचना के लिए कई आलोचकों को भी नेमि जी ने इस पत्रिका के जरिये तैयार किया, जिन्होंने उनके काम को आगे बढ़ाया.
साल 1978 में मैकमिलन प्रकाशन से एक किताब छपी जिसका संपादन नेमिचंद्र जैन ने किया- ‘आधुनिक हिंदी नाटक और रंगमंच’. इसकी भूमिका रंगमंच को समझने का तो सूत्र देती ही है, इस किताब की परिकल्पना नें नेमि जी हिंदी रंगमंच के सभी पक्षों को समेट लेते हैं. उनकी एक और किताब है- ‘रंग परंपरा निरंतरता और बदलाव’, यह भारतीय रंगमंच की ऐतिहासिकता को समझने में हमारी मदद करता है. अनुवाद भी नेमि जी का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है. दीनबंधु मित्र के प्रतिबंधित नाटक ‘नीलदर्पण’, विजन भट्टाचार्य का नाटक ‘अंतिम अभिलाषा’, और हेनरिक इब्सन का नाटक ‘घोस्ट’ उनके द्वारा किये गये प्रमुख अनुवाद हैं.
नेमि जी दिनमान पत्रिका में रंगमंच पर नियमित स्तंभ लिखते थे, इस स्तंभ में प्रस्तुतियों की समीक्षा के साथ ही रंगमंच के जिन समकालीन सवालों को वे उठाते हैं, वह गौर करने लायक है, जिसमें दर्शकों का सवाल भी है और भाषा का सवाल भी. हिंदी रंगमंच को लेकर उनकी चिंता बराबर इस स्तंभ में व्यक्त हुई है. प्रस्तुति की समीक्षा करते हुए उनका ध्यान प्रस्तुति करनेवाले के नाम पर नहीं, बल्कि प्रस्तुति पर रहता है, जहां से निर्देशक अपने लिए सूत्र पा सकता है.
आजादी के बाद भारतीय रंगमंच को गढ़नेवालों में नेमिचंद्र जैन बेहद महत्वपूर्ण हैं. वे मंच पर, मंच के पीछे और आलोचना में एक साथ सक्रिय रहे. भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से उसकी स्थापना के समय से ही जुड़े थे. स्वतंत्रता के बाद बननेवाले संस्थानों के प्रशासन से भी वे जुड़े. नवस्थापित संगीत नाटक अकादमी से जुड़े और भारतीय रंगमंच की रूपरेखा पर विचार करने के लिए आयोजित ड्रामा सेमिनार को संपन्न कराने में अपना योगदान दिया.
इसके बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की संकल्पना को साकार करने में भूमिका निभाने के साथ वहां अध्यापन भी किया. जेएनयू के कला और सौंदर्यशास्त्र विभाग में भी रहे. दिल्ली में 16 अगस्त को आईआईसी में नटरंग प्रतिष्ठान ने वर्षभर चलनेवाले आयोजन नेमि शती का शुभारंभ किया, जिसमें रोमिला थापर ने ‘अन्यता की उपस्थिति’ पर व्याख्यान दिया. हिंदी के रंग केंद्रों को भी चाहिए कि इस वर्ष वे नेमि जी को याद करें, इससे वर्तमान पीढ़ी भी उनके कामों से अवगत हो पायेगी.
कला-आयोजन

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