राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में चुनावी बयार देश के बाकी इलाकों से अलग होती है. यहां जाति और मजहब पर वोट न दिये जाते हैं, न मांगें जाते हैं. यह बात दीगर इनमें से ज्यादातर गांवों में आजादी के इतने सालों बाद भी बहुत कुछ बदला नहीं है.
लिहाजा देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी आधारभूत संरचनाओें का विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, खेती-किसानी और नागरिक सुरक्षा जैसे मुद्दे यहां भी चुनाव में उठते हैं, लेकिन जहां अन्य क्षेत्रों में जाति और मजहब चुनावी समीकरण पर असरदार होता है, यहां इनकी जगह राष्ट्रवाद चुनावी भावना सबसे प्रबल होती है. हाल के पुलवामा आतंकवादी हमले और उसके बाद भारतीय वायु सेना के एयर स्ट्राइक ने यहां के लोगों को और भी राष्ट्रवादी बना दिया है.
रा जैसलमेर व बाड़मेर जिले में भारत-पाक बॉर्डर पर स्थित सरहदी गांवों की तस्वीर खास नहीं बदली है, लेकिन एयर स्ट्राइक के बाद राष्ट्रवाद का ज्वार यहां इन मुद्दों पर हावी हो गया है. इस बार क्षेत्र में राष्ट्रभक्ति की हवा है.
बॉर्डर के नजदीक जैसलमेर के सम क्षेत्र व करड़ा गांव तथा बाड़मेर के तामलोर में बुजुर्ग 65 और 71 की लड़ाई में सेना के शौर्य व उनके द्वारा की गयी सेना की सेवा की कहानी सुनाते हैं, तो युवा जोश से भर उठते हैं. कहते हैं, सीमाएं ही सुरक्षित नहीं रहेंगी, तो पहले शिकार हम ही होंगे.
पाक से हिसाब चाहिए
जैसलमेर से 150 किमी आगे करड़ा जैसे दर्जनों गांवों में डिजिटल इंडिया नदारद है. किसानों के मकान कच्चे हैं. सिंचाई सिर्फ बादलों के भरोसे हैं. यहां विकास के बुनियादी सवाल 70 साल पुराने हैं,पर जाति और मजहब के नाम पर वोट मांगने वालों की पूछ नहीं है. इस बार भी यहां के मतदाता पाकिस्तान से हिसाब पूरा करना चाहते हैं.
