प्रेम कुमार मणि की पहचान एक साहित्यकार के रुप में रही है. अभी तक कई किताब लिख चुके मणि अभिवंचित वर्ग की समस्याओं पर हमेशा मुखर रहे हैं. इस वर्ग में व्याप्त दुश्वारियों पर पैनी नजर रखने वाले श्री मणि केंद्र व राज्य सरकारों की उन योजनाओं व कार्यकलापों पर नजर रखते हैं, जिनका सारोकारअभिवंचित वर्ग के हितों और प्रगति से सीधे तौर पर होता है. अभिवंचित वर्ग में हो रहे बदलाव की गति को तेज करने के लिए आगे कौन-से कदम उठाने की जरूरत है, इस मुद्दे पर पंचायतनामा ने उनसे बात की.
बिहार-झारखंड के वंचित वर्ग की वर्तमान हालत पर आपकी क्या राय है?
दोनों प्रदेशों की गिनती पिछड़े प्रदेशों में होती है. आबादी पिछड़ी है तो प्रदेश पिछड़ा है. जनता पर निर्धारित होता है कि प्रदेश की हालत क्या है? दोनों जगहों के निवासी बहुत पिछड़े हैं. इनमें साक्षरता, स्वास्थ्य, शहरी विकास आदि को देखा जाता है. औसतन 10.47 प्रतिशत शहरी करण है. बहुसंख्यक आबादी हर स्तर पर निम्न है. पूरे बिहार, झारखंड का यह हालत है, तो जाहिर है दलित व वंचित वर्ग भी इसमें स्वाभाविक रुप से शामिल हैं. वे और भी पीछे होंगे. यह सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए चुनौती है. पहला राजनैतिक एजेंडा यही होना चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसा नहीं हुआ. बिहार, झारखंड में भूमि सुधारों का ना होना भी एक बड़ा कारण है. पहले जमींदारी प्रथा थी. इस प्रथा में जोतदारों का शोषण किया गया.
ज्यादा जोतदार अभिवंचित वर्ग से ही आते थे. खास तौर पर पिछड़े वर्गो की निमA जातियां, जिसे लोअर ओबीसी या अतिपिछड़ा कहने का प्रयास आरंभ हुआ, कृषि व्यवस्था में इनकी भागीदारी बाहरी व्यक्ति के रुप में होती थी. यह खुद जमीन के मालिक नहीं थे. इन सबके बीच समाजवादियों का नारा ‘ जोते बोए काटे धान, खेत का मालिक वहीं किसान’ जमीन पर नहीं आ सका. पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकारों ने भूमि सुधारों को लागू नहीं होने दिया. सामाजिक न्याय का नारा देकर सत्ताशीर्ष तक पहुंचने वाले लालू प्रसाद ने भी इसे लटका कर रखा. नीतीश सरकार के समय बी बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग बनाया गया. आयोग ने तय समय पर रिपोर्ट भी सौंप दी. न्याय के साथ विकास का नारा देने वाले नीतीश कुमार से उम्मीद थी कि इसे लागू करेंगे, लेकिन उन्होंने भी इसे ठंढ़े बस्ते में डाल दिया. इसे ऐसे कह सकते हैं कि किसी भी सरकार ने गरीबों और वंचित वर्ग की परेशानियों को खत्म करने के लिए गंभीर हो कर काम नहीं किया. आयोग या समिति बना देने से ही समस्या का समाधान नहीं हो सकता है. जरूरत उन रिपोर्ट पर काम करने की है, जो इस वर्ग में परिवर्तन या बदलाव लाने में सक्षम है. अभी बिहार की राजनीति की बागडोर वंचित तबके से ताल्लुक रखने वाले नेता के हाथ में है. यह देखना होगा कि सार्थक बदलाव के लिए नियम कानून के ढ़ांचे में परिवर्तन करते हैं या नहीं. यदि उत्पादन के ढ़ांचे को पूर्ववत ही रखा गया, तो सामाजिक बदलाव की कोई बड़ी उम्मीद नहीं कर सकते हैं. इसलिए मेरा मानना है कि बिहारी समाज में एक रस्साकस्सी चल रही है. वर्चस्व प्राप्त तबका अपनी पकड़ खोना नहीं चाहता, वंचित तबका अपने संघर्ष से वापस नहीं आना चाहता. इस संघर्ष से आग निकलेगी, ऐसी उम्मीद है.
संवैधानिक और कानूनी अधिकार एवं संरक्षण दिये जाने के बाद हालत कितने बदले हैं? क्या ये बदलाव किसी मानक के दायरे में आते हैं?
भारतीय संविधान जब बन रहा था, तब उसके तीसरे वाचन पर बोलते हुए डॉ आंबेदकर ने कहा था कि आने वाले समय में हम अंतर्विरोधो वाले समय में प्रवेश करेंगे. शायद आंबेदकर ने उसी वक्त इस बात का अंदाजा लगा लिया था कि भारत की वर्ण व्यवस्था का स्वरुप क्या होने वाला है और इसका भारतीय समाज और निचले तबके पर क्या असर पड़ेगा. आजाद भारत में एक व्यक्ति- एक वोट का अधिकार होगा, लेकिन हर व्यक्ति को बराबर आर्थिक, सामाजिक अधिकार नहीं होंगे. राजनीतिक अधिकार बराबर होना, आर्थिक, सामाजिक अधिकार बराबर ना होना हमारे संविधान का अंतर्विरोध था, जबकि यह होना ही नहीं चाहिए था. सबको एक समान, एक जैसी सुविधा मिलनी चाहिए थी. समाज का कोई अंग अगर कमजोर होगा, तो हमारा समाज तरक्की नहीं कर सकेगा. बिल्कुल हमारे शरीर की तरह. सभी अंग स्वस्थ रहते हैं, तो शरीर में ऊर्जा रहती है. उसी प्रकार अगर समाज में सभी प्रगति करेंगे, तो यह देशहित में होगा. हमारे राष्ट्रीय आंदोलन में आजादी का मान तो था लेकिन फ्रांसीसी क्रांति के आदर्श, समानता, भाईचारा स्वतंत्रता की त्रयी में नहीं था. आंबेडकर आजादी को आर्थिक समानता और भाईचारा को आर्थिक समानता और भाईचारे के साथ नत्थी कर देखना चाहते थे.
वह जानते थे कि इन सभी विषयों को एक साथ रखा जायेगा तो समाज में सबकों एक साथ रहने का अवसर मिलेगा. संविधान ने यह अधिकार नहीं दिया. इसलिए भारत खास कर बिहार का वर्चस्व प्राप्त तबका बार- बार संवैधानिक उपाय, मानक की बात कहता है. वह जानता है भारत के वर्तमान संविधान अप्रत्यक्ष रुप से उसके हितों की संरक्षण की व्यवस्था है. दलित, वंचित, शोषित तबके के लोग जब भी आंदोलन करते हैं, तब बड़ी आसानी से उनको नक्सलवादी या माओवादी बता दिया जाता है. उनकी बातों, परेशानियों को नहीं समझा जाता है. यह कहा जाता है, हमारा संविधान और संवैधानिक ढांचा खतरे में है. मेरे हिसाब से इस विषय पर आज भी सम्यक विमर्श की जरूरत है. वंचितों, आदिवासियों के आंदोलनों को कुचलने के लिए लोकसभा में ग्रीन हंट के फैसले लिये जाते हैं और उसी लोकसभा में सन् 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल होने वाले, अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाने वाले कुंवर सिंह, तात्या टोपे, लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. यह दुर्भाग्य है कि हम अपने दोहरे चरित्र को नहीं देख पाते हैं. वंचित वर्ग, आदिवसी भी तो अपने हक के लिए ही हथियार उठाते हैं. हमे उनकी बातों को दबाने का हक नहीं है. उनको अपने साथ रख कर, उनकी परेशानियों, दुश्विारियों को जानने का प्रयास करना होगा. हमे अपने संविधान, इसके ढांचे, मानकों पर विचार करना होगा और वंचित शोषित के नजरिये से देखना होगा.
मानव विकास के प्रमुख सूचकांक में अभिवंचित वर्ग की स्थिति कितनी संतोषजनक है?
मेरे हिसाब से बिल्कुल असंतोषजनक है. वंचितों की हालत भयावह है. बिहार में अभी भी बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी है. मेरे ख्याल से यह संख्या करीब 89 प्रतिशत है. विकास का जो ढांचा हमने विकसित किया है, उसमें गैर बराबरी की खाई को चौड़ा, गहरा किया है. वंचित तबके के लोग 1950 में कैसे थे, 2014 में कैसे हैं? केवल यह नहीं देखना चाहिए. यह देखना है, सन् 1950 में सबसे समृद्ध, दरिद्र के बीच कितना अंतर था? गांव, कस्बों में यह अंतर बढ़ा और इसके बढ़ने के साथ ही वंचित तबकों का असंतोष भी बढ़ा. शिक्षा, सेहत के मामले में पहले इतना अंतर नहीं था. देहाती क्षेत्रों में संपन्न और भूमिहीन किसानों के बच्चे एक समान स्कूल में पढ़ते थे. उनका इलाज एक समान स्वास्थ्य केंद्रों में होता था. आज बड़ों के स्कूल, अस्पताल अलग है और गरीबों के अलग. अमीरों के स्कूल अलग हैं, गरीबों के अलग. अमीर दिन प्रतिदिन अमीर और गरीबों की हालत बदतर हो रही है. इस पर ध्यान नहीं दिया तो हम एक विकृत समाज को बढ़ावा देंगे. जहां सांस्कृतिक-शैक्षणिक रुप से दो तरह का समाज विकसित होगा. वंचितों का, अभिजनों का समाज. पौराणिक जमाने में कृष्ण-सुदामा एक साथ पढ़ लेते थे. द्रुपद-द्रोण पढ़ लेते थे. आज यह संभव है क्या? अमीर वर्ग के बच्चों के लिए महंगे स्कूलों में शिक्षा की सुविधा है, दूसरी तरफ वंचित वर्ग के लिए सरकारी स्कूल ही मयस्सर हो पाता है.
राजनैतिक तौर पर वंचित समाज को प्रतिनिधित्व मिला है.चाहे वह संसद, विधान सभा हो या पंचायती राज संस्थान. इसके बाद उसके जीवन मूल्यों में आये बदलाव को आप किस रुप में देखते हैं?
डॉ आंबेडकर की एक किताब है, ‘कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया’. इसमें आंबेडकर ने कांग्रेस की राजनीतिक चालबाजी का जिक्र किया, जिसमें दलित प्रत्याशियों का चुनाव करते हैं. आंबेडकर यह बतलाते हैं कि कांग्रेस के नेता, दलित प्रत्याशियों का चुनाव करते वक्त दो चीजों का ध्यान रखते हैं. पहला वह मानसिक रुप से अयोग्य हो. दूसरा पिछलग्गू हो.
ऐसा करने से कांग्रेस को दो लाभ होते. उन्हें पिछलग्गू, दलित विधायक, सांसद मिल जाते हैं. जो केवल समर्थन में हाथ उठाते हैं. आंबेडकर ने तकलीफ के साथ कहा था, संसद में दलित सदस्य केवल तभी मुंह खोलते है, जब जम्हाई आती है. मेरा कहना है, वहीं हालात आज भी है. सभी दलों के नेता वैसे दलित वंचितों को आगे करते हैं, जो आयोग्य और पिछलग्गू हो. लेकिन कभी – कभी इतिहास के अवचेतन साधन किसी व्यक्ति को आगे कर देते हैं. बिहार में समाज के सबसे पिछले हिस्से से आने वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री का पद मिला है.
यह इतिहास का अवचेतन साधन है. अवसर मुश्किल से मिलते हैं. वंचित वर्ग को इसका महत्व समझना चाहिए और अपने समाज की किस्मत बदलने के लिए पद की ताकत का उपयोग करना चाहिए. इस वर्ग में व्याप्त उन तमाम अवरोधों को समयबद्ध तरीके से खत्म करने की पहल करनी चाहिए, जो परिवर्तन की गति पर असर डाल रहे हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में अनिवार्य रुप से सुधार करने की पहल होनी चाहिए. इस वर्ग को शिक्षा के महत्व को समझना चाहिए. शिक्षित होंगे तो एक होंगे. समाज के निचले भाग में जब तक बुनियादी परिवर्तन नहीं होगा, सामाजिक खुशहाल समाज का निर्धारण नहीं होगा. समानता, भाईचारा आदर्श होना चाहिए. इसके बिना न्याय की कल्पना नहीं कर सकते है.
प्रेम कुमार मणि
साहित्यकार व दलित चिंतक पटना
