कोलंबिया, कोस्टा रिका, मेक्सिको व अमेरिका ने दिखाया दम
ब्राजील में चल रहे विश्व कप फुटबॉल फाइनल्स में अब तक नीदरलैंड्स और एक हद तक फ्रांस को छोड़ दें, तो ‘बड़ी’ कही जानेवाली किसी और टीम ने अपेक्षा या अपनी प्रतिष्ठा के मुताबिक दमक नहीं दिखायी है. हां, हारने वाली बड़ी टीमों के कुछ खिलाड़ी टुकड़ों-टुकड़ों में जरूर चमके, लेकिन यह उनकी टीम के आगे बढ़ने के लिए काफी नहीं था.
सत्येंद्र रंजन, वरिष्ठ खेल पत्रकार
टूर्नामेंट शुरू होने के पहले जिन तीन सबसे बड़े सितारों- नेयमार जूनियर, लियोनेल मेसी और क्रिश्चियानों रोनाल्डो की चर्चा थी, वे जरूर चमके हैं. दरअसल, यह नेयमार और मेसी की प्रभा ही है कि ब्राजील और अर्जेटीना अब भी खिताबी दौड़ में मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं. रोनाल्डो टुकड़ों-टुकड़ों में जरूर चमके, मगर पुर्तगाल की बाकी टीम इतनी फिसड्डी थी कि रोनाल्डो अपने कंधों पर खींच कर उसे ग्रुप दौर से नहीं निकाल सके. जिन टीमों ने अपने खेल लोगों को सबसे ज्यादा मुग्ध किया है, वे कोलंबिया, कोस्टा रिका, मेक्सिको और अमेरिका हैं.
प्री-क्वार्टर फाइनल में विवादास्पद पेनाल्टी शॉट से नीदरलैंड्स के हाथों पराजित होकर मेक्सिको की टीम घर लौट चुकी है. मगर उसके खिलाड़ियों ने जो तालमेल, तेजी और जज्बा दिखाया, वह लंबे समय तक याद रहेगा. अल्जीरिया ने भी जतायी गयी संभावनाओं से बेहतर खेल दिखाया है. ऑस्ट्रेलिया और कुछ अन्य टीमें कुछ मैचों मैदान पर खूब चमकीं, मगर सफलता हासिल किये बगैर वापस चली गयीं.
जाहिर है, भारत जैसे देश में, जहां विश्व फुटबॉल को वल्र्डकप जैसे मौकों पर ही अधिक देखा जाता है, वहां यह बात बड़ी पहेली है कि आखिर ‘बड़ी’ या ‘प्रतिष्ठित’ टीमें क्यों अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरीं. गौरतलब है, पिछले आठ विश्व चैंपियंस में से चार (स्पेन, इटली, इंगलैंड और उरुग्वे) टीमें मुकाबले से बाहर हो चुकी हैं, जबकि ब्राजील, अर्जेटीना और जर्मनी का खेल साधारण रहा है (या कम से कम अपनी प्रतिष्ठा के मुताबिक नहीं रहा). ऐसे उदाहरणों के निर्विवाद या अकाट्य कारण ढूंढ़ने तो कठिन हैं, मगर आज विश्व फुटबॉल का जो असली ढांचा है, उसमें इसके कुछ सूत्र जरूर तलाशे जा सकते हैं. यह सुनना अनेक लोगों को अटपटा लग सकता है, मगर सच्चाई यही है कि भूमंडलीकरण की परिघटना ने फुटबॉल को क्रमिक रूप से उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां राष्ट्रीय टीमें प्राथमिक महत्व की नहीं रह गयी हैं.
असल में जानकार तो यह मानते हैं कि अब विश्व कप या महाद्वीपीय टूर्नामेंट आनुष्ठानिक महत्व के ही रह गये हैं- उनमें खेल की असली गुणवत्ता या प्रतिस्पर्धा भाव देखने को नहीं मिलता. इसका स्थान अब यूरोप के विभिन्न देशों के क्लबों के लीग हैं.
इसीलिए कहा जाता है कि उच्चतम गुणवत्ता का फुटबॉल देखना हो तो यूरोपीय चैंपियंस लीग के मैच देखने चाहिए. तथ्यों पर गौर कीजिए. यूरोप में यह न्यायिक निर्णय से तय हो चुका है कि खिलाड़ी क्लबों की मिल्कियत है. क्लब करोड़ों रुपये में खिलाड़ियों, कोच और दूसरे सपोर्ट स्टाफ को खरीदते हैं. वहीं विभिन्न देशों से आये खिलाड़ियों के साथ उनकी ट्रेनिंग होती है. हर खिलाड़ी क्लब की रणनीति में तय भूमिका के मुताबिक खुद को ढालता है. साल में तकरीबन नौ महीने ये खिलाड़ी इस भूमिका में रहते हैं. राष्ट्रीय मुकाबलों के लिए बचे समय में उन्हें क्लब से छुट्टी मिलती है, जहां अलग-अलग क्लबों से आये खिलाड़ियों के बीच उन्हें रोल मिलता है.
अगर उसमें वे ठीक से नहीं रम पाते, तो जाहिर है, इसे आसानी से समझा जा सकता है. फिर वफादारियों का भी सवाल है. पहली वफादारी उम्दा रोजी-रोटी देनेवाले क्लब के प्रति हो या उस देश के प्रति जिसे वे छोड़ आये हैं- यह सवाल भावनात्मक तौर पर बेतुका लग सकता है (लोग यही मानेंगे कि देश सबसे अहम है), लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप से इसके महत्व को शायद ही नजरअंदाज किया जा सकता है. इस संदर्भ में अमेरिका और जर्मनी के मैच को याद कीजिए.
अमेरिका के कोच जुर्गेन क्लिंसमैन वह हस्ती हैं, जिन्होंने जर्मनी को आखिरी बार (1990) में विश्व चैंपियन बनवाने में बेहद खास भूमिका निभायी थी. मगर अब विपक्षी टीम की कोच की भूमिका में इस वल्र्डकप में उन्होंने अपने देश की टीम को हराने की रणनीति बनायी. प्रश्न यह है कि ऐसी अनगिनत मिसालों के बीच खिलाड़ी या कोच की वफादारी का आज भी क्या वही पैमाना हो सकता है, जो फुटबॉल के भूमंडलीकरण के पहले था?
भूमंडलीकरण की इस परिघटना से फुटबॉल मनोरंजन का एक उत्पाद बन चुका है, जिसे क्लब तैयार करते हैं और टेलीविजन/इंटरनेट के जरिये दुनिया भर में फैले उपभोक्ताओं तक पहुंचाते हैं.
फीफा इस उद्योग का संचालक है. उसने आज भी राष्ट्रीयता आधारित मुकाबलों को महत्व दे रखा है, तो सिर्फ इसलिए कि इसका भी बड़ा बाजार है. ब्राजील में 11 अरब डॉलर के खर्च से आयोजित विश्व कप से फीफा को दो अरब डॉलर का मुनाफा होगा. जबकि आयोजक देश ब्राजील के राजकोष पर पड़े दबाव का ही परिणाम है कि वहां (अपेक्षित) गौरव के इस मौके पर जनता का एक बड़ा हिस्सा इस आयोजन के खिलाफ सड़कों पर उतर आया.
इनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे, जिन्हें फुटबॉल या विश्व कप से शिकायत नहीं थी. बल्कि उनके आक्रोश का केंद्र फीफा की यह शर्त बनी कि इस आयोजन के लिए ‘फीफा स्टैंडर्ड’ के स्टेडियम और इंफ्रास्ट्रर बनाये जाने चाहिए. वहां मुद्दा यह उठा कि जिन देशों में आम जीवन स्तर ‘फीफा स्टैंडर्ड’ का नहीं है, उन पर आयोजन संबंधी सुविधाओं के लिए यह शर्त क्यों थोपी जानी चाहिए? वैसे यह बात तमाम खेल आयोजनों पर लागू होती है. अतीत में कई देशों में ओलिंपिक्स या वल्र्डकप जैसे आयोजनों के लिए वल्र्ड स्टैंडर्ड के जो स्टेडियम, स्वीमिंग पुल आदि बनाये गये, अनुभव यह है कि उनसे स्थायी स्तर पर खेलों के विकास या उस दौरान खर्च हुई भारी रकम से वहां के जन समुदायों की जिंदगी सुधारने में कोई मदद नहीं मिली. मसलन, दक्षिण अफ्रीका में 2010 के फुटबॉल वल्र्डकप के लिए बने कई भव्य स्टेडियम आज बिना इस्तेमाल के पड़े हुए हैं.
यह विश्व कप इन तथ्यों और उनसे उठे सवालों को चर्चा में लाने के लिए याद रहेगा. संभवत: इस चर्चा से लोगों की फुटबॉल के आधुनिक ढांचे की समझ अधिक गहरी होगी. तब लोग समझ पायेंगे कि जिन्हें वे ‘बड़ी’ राष्ट्रीय टीम समझते हैं, वे असल में अपने बड़े नाम वाले खिलाड़ियों के कारण ऐसा समझी जाती हैं. मगर ये नाम क्लब फुटबॉल में प्रदर्शन से बनते हैं. कच्ची प्रतिभाओं को तराश कर क्लब उन्हें सितारा बनाते हैं. मुमकिन है कि ऐसे सितारे अपनी जगह पर पूरा सीजन खेलने के बाद थके-हारे जब कुछ दिनों के लिए ‘देश के लिए’ खेलने जायें, तो उसी ढंग से ना चमकें, जैसी उनकी पहचान है. ऐसा पहले के विश्व कप फाइनल्स में भी हुआ है. इस बार भी यह देखने को मिल रहा है.
