हिंदी के शिखर आलोचक नामवर सिंह का निधन

हिंदी के प्रख्यात आलोचक और साहित्यकार नामवर सिंह का दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया है. वो 93 वर्ष के थे. वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि नामवर सिंह के परिवार वालों से उनकी बात हुई और उन्होंने ये जानकारी उनको दी है. ओम थानवी के अनुसार मंगलवार […]

हिंदी के प्रख्यात आलोचक और साहित्यकार नामवर सिंह का दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया है. वो 93 वर्ष के थे.

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि नामवर सिंह के परिवार वालों से उनकी बात हुई और उन्होंने ये जानकारी उनको दी है.

ओम थानवी के अनुसार मंगलवार की देर रात क़रीब 1150 पर उनका देहान्त हो गया. वो दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में पिछले कई दिनों से भर्ती थे.

जनवरी के महीने में अचानक वो अपने रूम में गिर गए थे. तब उन्हें एम्स के ट्रॉमा सेंटर में उन्हें भर्ती कराया गया था.

डॉक्टरों ने बताया था कि उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ था. लेकिन वो ख़तरे से बाहर हो गए थे और डॉक्टरों के अनुसार उनकी हालत में सुधार भी हो रहा था.

नामवर सिंह के परिवार के अनुसार दिल्ली के लोधी रोड स्थित शमशान घाट में बुधवार को दोपहर बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1927 को वाराणसी के एक गांव जीयनपुर (वर्तमान में ज़िला चंदौली) में हुआ था. उन्होंने बीएचयू से हिंदी साहित्य में एमए और पीएचडी किया. कई वर्षों तक बीएचयू में पढ़ाया और उसके बाद सागर और जोधपुर विश्वविद्यालय में पढ़ाया और फिर वो दिल्ली के जेएनयू में आ गए. वहीं से रिटायर हुए.

साहित्य अकादमी सम्मान से नवाज़े जा चुके नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य में आलोचना को एक नया आयाम और नई ऊंचाई दी है.

ओम थानवी के अनुसार हिंदी साहित्य के बड़े आलोचकों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल से जो परम्परा शुरू होती है, नामवर सिंह उसी परम्परा के आलोचक थे.

छायावाद(1955), इतिहास और आलोचना(1957), कहानी : नयी कहानी (1964), कविता के नये प्रतिमान(1968), दूसरी परम्परा की खोज(1982), वाद विवाद और संवाद(1989) उनकी प्रमुख रचनाएं हैं.

अध्यापन और लेखन के अलावा उन्होंने जनयुग और आलोचना नामक हिंदी की दो पत्रिकाओं का संपादन भी किया है.

1959 में चकिया-चंदौली लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार भी रहे लेकिन हारने के बाद बीएचयू छोड़ दिया.

ओम थानवी के अनुसार वो कट्टर मार्क्सवादी थे लेकिन उन्होंने प्रतिभा को पहचानने और प्रोत्साहन देने में अपने निजी विचारों को उसके रास्ते में नहीं आने दिया. उनकी उदारता धीरे-धीरे और पनपती चली गई.

हिंदी के जाने माने लेखक निर्मल वर्मा जिनको कुछ लोग दक्षिणपंथी कहते थे, उनको जब ज्ञानपीठ सम्मान मिला तो उस चयन समिति के अध्यक्ष नामवर सिंह ही थे.

ये कहना ग़लत नहीं होगा कि उर्दू साहित्य में जो हैसियत शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की है हिंदी साहित्य में वही हैसियत नामवर सिंह की है.

ओम थानवी के अनुसार दोनों में एक बुनियादी फ़र्क़ ये है कि फ़ारूक़ी ने लिखा बहुत ज़्यादा है जबकि नामवर सिंह ने फ़ारूक़ी की तुलना में कम लिखा है.

नामवर सिंह उर्दू के भी बड़े जानकार थे. उनके किसी भी भाषण में उर्दू पर उनकी पकड़ साफ़ दिखती थी.

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