दलित रंगमंच की जरूरत हमें ‘ब्लैक थियेटर’ से लेनी चाहिए प्रेरणा

ईश्वर शून्य, रंगकर्मी रंगमंच क्या है? उसकी जरूरत क्या है? उसका स्वरूप कैसा होना चाहिए? हमेशा से यह बहस का मुद्दा रहा है. हम मानते आये हैं कि रंगमंच जीवन का प्रतिबिंब है. यह कथन तभी सफल होगा, जब दर्शकों के जीवन को यह प्रतिबिंबित करे. उस समय और समाज की बात करे, जिसमें हम […]

ईश्वर शून्य, रंगकर्मी
रंगमंच क्या है? उसकी जरूरत क्या है? उसका स्वरूप कैसा होना चाहिए? हमेशा से यह बहस का मुद्दा रहा है. हम मानते आये हैं कि रंगमंच जीवन का प्रतिबिंब है. यह कथन तभी सफल होगा, जब दर्शकों के जीवन को यह प्रतिबिंबित करे. उस समय और समाज की बात करे, जिसमें हम रह रहे हों.
रंगमंच सिर्फ जीवन का प्रतिबिंब नहीं होना चाहिए, बल्कि वह उस प्रतिबिंब की परख भी करता हो और उसके टेढ़ेपन को ठीक भी करता हो. रंगमंच को असमानताओं, पूर्वाग्रहों, भेदभावों, मान्यताओं, मूल्यों को चुनौती देते रहना चाहिए.
पश्चिम में, खासतौर से अफ्रीकी-अमेरिकी अश्वेत लोगों ने इस बात को समय रहते समझ लिया था. इसलिए वहां ‘ब्लैक थियेटर’ ‘अश्वेत चेतना’ की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया. इसने जीने के लिए समाज से गहरा अर्थ मांगा, मुक्ति का स्वर गाया और क्रांति की एक भाषा रची.
ब्लैक थियेटर ने कला के संदर्भ में अमेरिकी अभिजात्य फ्रेम तोड़ने का काम किया और एक अमेरिकी-अफ्रीकी दृष्टिकोण रचा. नस्लवाद-रंगभेद के खिलाफ वहां आवाजें 19वीं शताब्दी के शुरू में ही उठने लगी थीं. पहला ब्लैक नाटक जेम्स ब्राउन का किंग शॉटअवे माना जाता है.
ब्लैक थियेटर में हार्लेम रेनेसां का बहुत बड़ा प्रभाव रहा. अफ्रीकी-अमेरिकी अश्वेतों ने अपनी संस्कृति, संगीत, रीति-रिवाजों, पहनावे आदि को अहमियत देना शुरू किया, बजाय अमेरिकी तौर-तरीकों के पीछे भागने के. और दूसरे विश्वयुद्ध के बाद तो ब्लैक थियेटर ने जैसे गति ही पकड़ ली.
आज हम उसी दौर से गुजर रहे हैं, जिससे तब अफ्रीकी-अमेरिकी समाज गुजर रहा था. हमें अपनी कलाओं व रंगमंच में दलितों-शोषितों, आदिवासियों-महिलाओं, किसानों-मजदूरों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाना चाहिए.
रंगमंच में पश्चिम के पूंजीवाद और वस्तुवाद के दायरे से बाहर आकर अपनी सांस्कृतिक, भाषाई धरोहर को बचाते हुए, सभी वर्गों के लिए बराबरी और सम्मान से जीने की स्थितियां बनाने की जरूरत है. इसके लिए रंगमंच में एक बड़े आंदोलन की कमी बहुत खलती है. हालांकि, महाराष्ट्र और देश के कुछ हिस्सों में दलित थियेटर की दस्तक हो चुकी है.
सामाजिक और महिलाओं के मुद्दों पर जागरूकता पैदा करने के लिए स्वतंत्रता के बाद लोक/मौखिक/सड़क प्रदर्शन के रूप में दलित थियेटर अस्तित्व में आया और इसने दलितों के खिलाफ अत्याचारों और सांस्कृतिक-सामाजिक भेदभाव और हिंसा के विरुद्ध आवाज मुखर की.
लेखकों-रंगकर्मियों ने महसूस किया कि भारतीय थियेटर की अपनी सीमाएं हैं, इसमें शोषितों-दलितों के मूल प्रश्नों की कमी है और रंगमंच का पारंपरिक अभिजात्य स्वरूप सुधार की संभावनाओं को पेश करने में विफल रहा है.
इसलिए, स्थापित रंगमंच और मौजूदा जमीन की वास्तविकताओं के प्रश्नों ने दलित थियेटर को जन्म दिया. दलित रंगमंच ने संकीर्ण डोमेन से छुटकारा पाने की कोशिश की और अस्पृश्यों, भूमिहीन मजदूरों और महिलाओं के उत्पीड़न और हर व्यक्ति के शोषण से संबंधित मुद्दों को शामिल किया. दलित थियेटर मुख्यत: अांबेडकर के विचारों, दर्शन और उनकी वैचारिक विरासत का मूल्यांकन करता रहा है. शोषण के खिलाफ विद्रोह इसमें अंतर्निहित है.
हमारे यहां दलित रंगमंच या इस तरह के किसी भी रंगमंच को आसानी से स्वीकृति नहीं मिल सकती. ब्लैक थियेटर को भी शुरू में नकार दिया गया था.
ब्लैक थियेटर की ही तरह भारतीय अभिजात्य रंगमंच से जुड़े लोग दलित रंगमंच की धारा और उसके अस्तित्व का विरोध करते रहते हैं. हमें ब्लैक थियेटर से प्रेरणा लेनी चाहिए और यहां की महिलाओं, आदिवासियों, दलितों की आवाजों को रंगमंच में उभरने देना चाहिए, ताकि आनेवाली पीढ़ी अपनी समृद्ध परंपरा पर गर्व कर सके.

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By Prabhat khabar digital desk

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