कालीघाट चित्रकला: पौराणिकता से समकालीनता का सफर

अर्चना शर्मा, स्वतंत्र लेखिका वर्षों तक अंग्रेजों के समय में कलकत्ता राजधानी होने की वजह से अविवादित रूप से इसे सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जाना जाता रहा.लगभग 18वीं शताब्दी के अंत और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में बंगाल के विख्यात कालीघाट मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में कालीघाट चित्रकला परंपरा की शुरुआत पट्टुआ समुदाय […]

अर्चना शर्मा, स्वतंत्र लेखिका

वर्षों तक अंग्रेजों के समय में कलकत्ता राजधानी होने की वजह से अविवादित रूप से इसे सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जाना जाता रहा.लगभग 18वीं शताब्दी के अंत और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में बंगाल के विख्यात कालीघाट मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में कालीघाट चित्रकला परंपरा की शुरुआत पट्टुआ समुदाय के लोगों ने की. कला की इस विधा के पनपने का कारण आजीविका ही रहा होगा, क्योंकि मंदिर में दर्शन करने आये श्रद्धालु स्मृति के तौर पर काली मां की पेंटिंग खरीदते थे. यह आमतौर पर हाथ से बने कागज या कपड़े पर बनायी जाती थी.

पट्ट या कपड़े पर पेंटिंग बनाने की वजह से ही इन कलाकारों को पट्टुआ कहा जाता है. लंबे-लंबे पट्टों पर पौराणिक कथा चित्र के रूप में बनायी जाती और चित्रकार गांव-गांव घूमकर गाने के माध्यम से अपने चित्र की कथा सुनाते थे. समय बीतने के साथ चित्रकला बेचने का यह तरीका कलाकारों के लिए थकाऊ और मुश्किल भरा होने लगा और उन्होंने मंदिर के पास ही अपनी दुकानें खोल लीं.

बाद में भी जरूरत और मांग के हिसाब से इस कला ने कई परिवर्तन झेले. चित्रकारी के विषय अधिकतर धार्मिक और पौराणिक हुआ करते थे, जैसे मां दुर्गा, शिव, विष्णु और उनके दस अवतार, रामायण और महाभारत के अनेक प्रसंग. परंतु, धीरे-धीरे बुद्धिजीवी वर्ग के प्रभाव में आने के बाद चित्रकला ने समकालीन कलेवर भी ओढ़ा.

पौराणिक घटनाओं के साथ-साथ रोजमर्रा की घटनाएं, विवादित, बहुचर्चित, चिंतनशील विषयों को भी कारीगर अपनी कला में उकेरने लगे. जैसे कि किसी पेंटिंग में जमींदार बाबू तेल लगे सलीके से काढ़े बालों में हुक्का गुड़गुड़ाते दिखते, तो किसी अन्य चित्र में वेश्यालय में नृत्य-संगीत का आनंद लेते हुए दिखते. वर्ष 1873 के बहुचर्चित तारकेश्वर हत्या कांड को भी कालीघाट पेंटिंग में दर्शाया जा चुका है.

यह बड़ा ही रोचक पहलू है कला का, जो दर्शाता है कि किस तरह कलाकार की संवेदनशीलता और बेबाकी कला के माध्यम से मुखर हो उठती है.

इस हत्याकांड ने पूरे बंगाल में एक सनसनी पैदा कर दी थी. कहानी यूं है कि नबीनचंद्र बनर्जी की खूबसूरत पत्नी एलोकेशि का तारकेश्वर स्थित शिव मंदिर के महंत के साथ प्रेम हो गया. नबीनचंद्र को जब इस प्रसंग की भनक लगी, तो वे आग बबूला हो गये और मछली काटनेवाले चाकू से अपनी पत्नी की हत्या कर दी. कोर्ट में केस चला.

उस समय कोर्ट की कार्यवाही देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ती थी और जज ने फैसले में नबीनचंद्र को उम्रकैद और मंदिर के महंत को तीन साल की सजा सुनायी. इस चर्चित घटना से संबंधित अनेक चित्र बने, जैसे एलोकेशि और महंत के मिलने का चित्र, एलोकेशि की नबीनचंद्र द्वारा हत्या का चित्र, तो कहीं क्षमा-याचना करती एलोकेशि का चित्र.

बदलते समय के साथ समकालीनता का जामा पहने यह चित्रकारी प्रसिद्ध होती गयी और फिर अचानक 1930 के बाद विलुप्त हो गयी. शायद अंग्रेजों का इस कला में कम होता शौक इसका कारण रहा होगा.

पट्टुआ समुदाय के कलम पट्टुआ ने इस कला को समसामयिक शक्ल के साथ पुनर्जीवित किया है. दिल्ली के क्राफ्ट्स म्यूजियम, प्रगति मैदान में इन्होंने मुलाकात के दौरान इस कला के अनेकों पक्षों को उजागर किया. उन्होंने बताया कि किस तरह के रंगों और तकनीक का इस्तेमाल वह अपने चित्रों को बनाने में करते हैं.

पेशे से कलम एक पोस्टमास्टर हैं. दिन ढलने के बाद दफ्तर से घर पहुंचकर सभी कामों से छुट्टी पाकर वे अपने ब्रश और कैनवस से अनेक रंग भरते हैं. यह उनका जुनून है, जो उन्हें इतनी हिम्मत और मेहनत की प्रेरणा देता है.

अपनी कला के रुझान के बारे में बताते हुए उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता दोनों तरफ से उन्हें कला विरासत के रूप में मिली. उनके पहले गुरु उनके चाचा थे. तेरह वर्ष की आयु से इन्होंने चित्रकारी शुरू की. साल 1986 में कलकत्ता में एक चित्रकारी प्रतियोगिता में इन्होंने हिस्सा लिया, जिसमें इन्हें तीसरा स्थान मिला.

इस बात से वे निराश हुए, पर आयोजकों ने बताया कि उनका काम बहुत बढ़िया है और उसमें प्रख्यात कलाकार जैमिनि रॉय की झलक है. आयोजक उन्हें जैमिनि रॉय के घर लेकर गये और उनकी पेंटिंग दिखायी. इस घटना के उपरांत इनकी मां ने इनके मामा, गोपाल चित्रकार और बंकु चित्रकार से अपने बेटे को कला सिखाने की गुजारिश की. इनके दोनों मामा फकीर तबियत के थे और मिनटों में तस्वीर बना देते थे.

इस तरह अपनी लगन और मेहनत से कलम पट्टुआ आगे बढ़ते गये और साल 2004 में इन्होंने पहली चित्रकला प्रदर्शनी की, जिसमें इनकी सारी पेंटिंग बिक गयी. इससे इन्हें जोश मिला और विलुप्त हो रही कला नये रंगों और आयामों में सजकर बाहर आने लगी. उनके चित्रों में- अमेरिका के ट्विन टाॅवर हमले की खबर टीवी पर निर्लिप्त भाव से चाय पीते देखते दंपति, गोवा में सैलानियों की विभिन्न वेशभूषाएं,, नारी शक्ति, पोस्ट ऑफिस में रोमांस और ऐसे कितने ही हास्य व्यंग से भरे चित्र शामिल हैं.

चित्रों में भरे जानेवाले रंगों के बारे में बताते हुए उन्होंने बताया कि ये रंग भी खास होते हैं, जैसे कि नीले रंग के लिए नील, काले के लिए दीये की कालिख, बेल के फल से निकला गोंद या फिर पत्थर का चूरा करके बनाये हुए रंग. हालांकि, आजकल बाजार में उपलब्ध वॉटर कलर भी इस्तेमाल किये जाते हैं. रंगों और पानी का सही अनुपात बहुत आवश्यक होता है. ब्रश के एक स्ट्रोक में पेंटिंग बनाना इस चित्रकला की खासियत है.

अरसे से एक सपना घुमड़ता था कि एल्बर्ट म्यूजियम में इस चित्रकला की प्रदर्शनी लगे और ऐसा हुआ भी. इसके बाद लिवरपूल, कनाडा, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया, इन सभी जगहों पर इनकी चित्रकला की प्रदर्शनी हुई. बंगाल के कालीघाट मंदिर से निकलकर यह चित्रकला विश्वव्यापी हो गयी है.

दिल्ली के नेशनल गैलरी ऑफ माॅडर्न आर्ट में भी इनकी पेंटिंग सुशोभित है. पोस्टमास्टर से पेंटर का सफर आसान तो नहीं, पर आनंददायक है, क्योंकि कला में अभिव्यक्ति का दायरा नितांत अपना होता है. इसमें एक आजादी, एक ऊंची उड़ान भरने की चाहत पुरजोर रहती है.

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By Prabhat khabar digital desk

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