विभाजन की त्रासदी का एक चित्र

अशोक भौमिक चित्रकार सन् 1947 में मिली आजादी के साथ जुड़ी विभाजन और विस्थापन की त्रासद कथाओं को हम हिंदी प्रदेश के लोगों ने केवल इतिहास में ही पढ़ा है और कहानियों में ही सुना है. इस विभाजन से सबसे ज्यादा प्रभावित भारत के दो इलाके के लोग हुए थे, जिनके घरों के आंगन, खेतों […]

अशोक भौमिक

चित्रकार

सन् 1947 में मिली आजादी के साथ जुड़ी विभाजन और विस्थापन की त्रासद कथाओं को हम हिंदी प्रदेश के लोगों ने केवल इतिहास में ही पढ़ा है और कहानियों में ही सुना है. इस विभाजन से सबसे ज्यादा प्रभावित भारत के दो इलाके के लोग हुए थे, जिनके घरों के आंगन, खेतों की फसलों और सदियों की रिश्तेदारियों को यकायक एक अंधी लकीर ने दो हिस्सों में बांट दिया था.

विश्व के इतिहास में इतनी विशाल आबादी को अपने घर-द्वार छोड़कर सीमा पार कर एक नये मुल्क में जाना पड़ा था. इस विस्थापन के साथ-साथ पंजाब और बंगाल में व्यापक नरसंहार भी हुआ था. विभाजन की त्रासदी पर उर्दू और पंजाबी में अनेक कहानियां लिखी गयी हैं, जिनके हिंदी-अनुवादों के जरिये हम बेघर हुए लोगों के दर्द को जान पाते हैं, पर उस दौर के कई बड़े चित्रकार भी थे, जिन्होंने विभाजन को करीब से महसूस किया था और अपनी कला में उस त्रासदी को उकेरा था.

विभाजन के उस दौर में चित्रकार प्राण नाथ मागो (1923-2006) ने इस महान चित्र ‘विषाद में औरतें’ (1947) को बनाया था. यह दुखद है कि आज इस चित्र को ही नहीं, बल्कि प्राण नाथ मागो सरीखे चित्रकार को भी लगभग भुला दिया गया है, पर विभाजन पर लिखी गयी महान साहित्यिक कृतियों जैसी ही यह चित्र निस्संदेह एक बड़ी कृति है.

इस महत्वपूर्ण चित्र में हम औरतों के एक झुंड को विलाप करते हुए चित्रित पाते हैं. चित्र में इन सभी औरतों के चेहरे ढंके हुए हैं, पर बावजूद इसके उनके ‘सब कुछ खोने’ के दुख को सहज समझा जा सकता है.

ये सभी औरतें हमारे लिए भले ही अपरिचित क्यों न हों, हम इनके दर्द को महसूस कर पाते हैं. चित्रकार प्राण नाथ मागो ने इस चित्र में सीमित रंगों का प्रयोग किया है. चित्र में औरतों के झुंड के अलावा और कुछ भी नहीं है, जहां सभी एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं. इस प्रकार चित्र में हम मानों किसी ऐसे हादसे पर, जिसमें सबों का सब कुछ खो गया है; इन विलाप करती औरतों की आवाज को हादसे के सात दशकों बाद भी स्पष्ट सुन पाते हैं.

जैसा कि इस चित्र की संरचना में एक अद्भुत कसाव के साथ-साथ आकृतियों में एक लयात्मकता दिखती है, वहीं चित्रकार द्वारा औरतों की इस भीड़ में भी एक केंद्रीय चरित्र को अलग से दिखाने के लिए सफेद चादर का अभिनव प्रयोग इस चित्र को एक बड़ी कृति बना देती है.

प्राण नाथ मागो एक बड़े चित्रकार ही नहीं, बल्कि एक कला समीक्षक और कला-कार्यकर्त्ता भी थे. कश्मीर की संस्कृति से सघन रूप से जुड़े प्राण नाथ मागो विभाजन के बाद लाहौर से दिल्ली आ गये थे. उस दौर के कई अन्य विस्थापित चित्रकारों जैसे सतीश गुजराल, बीसी सान्याल, धनराज भगत, कंवल कृष्ण, दमयंती चावला आदि चित्रकारों को साथ लेकर उन्होंने 1949 में ‘दिल्ली शिल्पी-चक्र’ की स्थापना की थी, जिसे भारतीय आधुनिक चित्रकला के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है.

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