ईश्वर शून्य, रंगकर्मी
आषाढ़ का एक दिन हिंदी रंगमंच में एक मील का पत्थर है, किंतु इसको ज्यादातर इसके पारंपरिक रूप में ही खेला गया है. नाटक को मल्लिका की दृष्टि से क्यों नहीं खेला जाता है या निर्देशकों को इसमें और संभावनाएं क्यों नहीं दिखतीं? इन्हीं सवालों के संदर्भ में वरिष्ठ रंग निर्देशक-परिकल्पक बापी बॉस द्वारा निर्देशित नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ का उल्लेख करना अत्यावश्यक है.
अलबेला साजन आयो रे… गीत पर दो प्रेमी युगल द्वारा प्रेम की सुंदर अभिव्यक्ति से नाटक शुरू होता है. वर्षा में भीगती मल्लिका का भाव आपको सहज और मधुर प्रतीत होने लगता है. निर्देशक ने शुरुआत में ही मालिका और अंबिका को एक ही फ्रेम में दिखाकर बता दिया कि ये एक ही स्त्री के दो रूप हैं. इसी फ्रेम में नाटक का सार तत्व भी छिपा दीखता है. मोहन राकेश ने अम्बिका को एक यथार्थवादी धरातल पर रखा है, जिसे मल्लिका की भावनामयी जीवन युक्ति से कोई जुड़ाव नहीं है.
अंबिका की यह जीवन दृष्टि उसके स्त्रियोचित अनुभवों ने उत्पन्न हुई है, जो पुरुष प्रधान समाज में रहकर उत्पन्न होती है. जिस अभिनेत्री ने अंबिका का चरित्र निभाया उन्होंने चरित्र में अनुभव कम और घृणा एवं चिड़चिड़ापन अधिक दिखाया. संवाद धड़ाधड़ बोलती हैं, जिससे सारे अर्थ खो जाते हैं. अभिनेताओं द्वारा संवादों के साथ बरती गयी यही असावधानी, छुपे अर्थ दर्शकों तक नहीं पहुंचने देती. यह नाटक अभिनेता से वाचन के स्तर पर कविता जैसी समझ की उम्मीद करता है.
रंगीनी-संगिनी, अनुस्वार-अनुनासिक ने नाटक में प्रहसन जैसा प्रभाव उत्पन्न किया. जिसे दर्शकों ने कॉमिक रिलीफ की तरह लिया. कहीं कहीं विलोम का चरित्र भी संस्कृत नाटकों के विदूषक जैसा लगने लगा. जबकि कालिदास से अलग विलोम एक ऐसा व्यक्तित्व है, जो यथार्थ के धरातल पर जीता है.
एक दृश्य में मल्लिका स्वप्न में कुछ अलग-अलग आकृतियों से डर रही है, वहीं दूसरे स्पॉट में कालिदास का नृत्य में लीन होना, दोनों पात्रों की जीवन स्थिति और चरित्र को मजबूती से सामने लाता है. मोहन राकेश ने नाटक में सामाजिक विद्रूपता का उल्लेख किया है कि किस तरह स्वार्थ से प्रेरित कालिदास सत्ता सुख भोग रहा है और मल्लिका मजबूरी और गरीबी में विलोम जैसे व्यक्ति से संबंध रखने पर मजबूर हो जाती है.
यहां कालिदास के बहाने से मोहन राकेश कलाओं और कलाकारों की स्वार्थलोलुपता को भी चिह्नित करते हुए चलते हैं कि अधिकतर कलाकार अपनी कला का इस्तेमाल साधन जुटाने और सत्ता स्थापित करने के लिए ही करते हैं. नाटक यह सवाल उठाता हुआ चलता है कि सत्तासमीकरण और कला एक साथ नहीं निभाये जा सकते. देर-सवेर सत्ता संस्थाओं की राजनीति कलाओं को नष्ट कर देती है. इसलिए कालिदास को बार-बार अपनी जड़ों की तरफ लौटना पड़ता है.
नहीं तुम काशी नहीं गये… वाले एकालाप में मल्लिका लगभग विक्षिप्त हो गयी नजर आती है और लगता है कि आगे बापी बॉस की मल्लिका, मोहन राकेश की मल्लिका से अलग हो जायेगी. वह स्त्री मुक्ति के स्वर को बुलंद करेगी, किंतु अगले ही दृश्य में मल्लिका कालिदास के प्रति पूर्ण समर्पित नजर आती है.
निर्देशक आखिरी दृश्य में मोहन राकेश के कथ्य से अलग जाकर मल्लिका का एक नया रूप रचते हैं, जो प्रेम की आदर्श छवि को तोड़कर स्त्री की अस्मिता को मजबूती से उभारती है. यहां निर्देशक ने अलग ही कथ्य रचा है, स्त्री का पुरुष की दासता, उसके साहचर्य से मुक्ति का. किंतु नाटक पिछले दृश्य में ही समाप्त हो गया था, जहां मल्लिका कालिदास के चले जाने पर मौन है.
नाटक के समय काल का पता नहीं चलता. नाटक में इस्तेमाल हुए संगीत में समय या भाषा का सामंजस्य नहीं दिखता. एक समय आधुनिक पंजाबी गीत बजता है, तो दूसरे समय 60-70 के दशक का फिल्मी गीत. सेट का डिजाइन एकदम अलग है, किंतु अभिनेताओं के गति संचालन में अवरोध भी उत्पन्न करता है. शायद नाटक को कमानी जैसे बड़े सभागार की आवश्यकता है, जहां नाटक का डिजाइन और निखर कर आ सके.
