समाजवैज्ञानिक विमर्श

साहित्य में अनामंत्रित’ किताब के प्राक्कथन में अभय कुमार दुबे कहते हैं कि साहित्य में मीमांसा हिंदी साहित्य के शलाकापुरुष राजेंद्र यादव की आत्मीय साजिश का नतीजा मानता हूं. हिंंदी आलोचना का परिदृश्य हमेशा एक धुंधली तस्वीर ही पेश करता रहा है. विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ाने आये शिक्षक ही जब आलोचक की भूमिका में […]

साहित्य में अनामंत्रित’ किताब के प्राक्कथन में अभय कुमार दुबे कहते हैं कि साहित्य में मीमांसा हिंदी साहित्य के शलाकापुरुष राजेंद्र यादव की आत्मीय साजिश का नतीजा मानता हूं.

हिंंदी आलोचना का परिदृश्य हमेशा एक धुंधली तस्वीर ही पेश करता रहा है. विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ाने आये शिक्षक ही जब आलोचक की भूमिका में उतर आये, तो होना यही था. जब समाज वैज्ञानिकों ने साहित्य को समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखने की कोशिश की, तो हिंंदी भाषा के सृजित साहित्य में से बेहतर साहित्य के चयन का विवेक पाठकों में पनपा. ‘साहित्य में अनामंत्रित’ पुस्तक में अभय कुमार दुबे के पंद्रह लेख शामिल हैं, जिनमें हिंदी के साहित्येतिहास की समस्याओं से लेकर साहित्य की दुनिया में विचारधारा, राजनीति और प्रतिबद्धता के नाम पर होनेवाले बौद्धिक संघर्षों की विस्तृत मीमांसा है.
मीमांसाएं करने का यह अवसर हंस के पन्नों पर राजेंद्र यादव ने मुहैया कराया था और कॉलम का नाम दिया था- ‘साहित्य में अनामंत्रित’. किताब के प्राक्कथन में अभय उन्हें याद करतेे हुए कहते हैं- हिंदी साहित्य के शलाकापुरुष राजेंद्र यादव की आत्मीय साजिश का नतीजा मानता हूं. संयोगवश मैं हंस के दफ्तर में उनसें मिला, तो उन्होंने शरारती अंदाज में पूछा कि यार, तुम फूको और देरिदा ही करते हो या कहानी-वहानी भी लिखते हो. इस पर मेरा कहना था कि मैं साहित्य नहीं लिखता, पर साहित्य पर लिखना जरूर चाहता हूं. इसी के बाद राजेंद्रजी के प्रोत्साहन से मैंने साहित्यिक कृतियों को समाज-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखना शुरू किया.
‘राजेंद्र यादव : स्मृति-शेष’ शीर्षक लेख में राजेंद्रजी के आलोचना और समालोचना टिप्पणियों को एक साथ देखेंगे, तो उनके स्पष्ट और निष्पक्ष आलोचना दृष्टि को समझ पायेंगे. हंस के जरिये राजेंद्रजी का उद्यम हिंंदी की आधुनिकता के लोकतंत्रीकरण का उद्यम था. उनका विश्वामित्र अपने दूसरे संस्करण के तहत सार्वजनिक जीवन में सक्रिय ‘पब्लिक मेन’ की तरह उभरा, जिसे हम ‘पब्लिक इंटलेक्चुअल’ भी कह सकते हैं.
भगवान दास मोरवाल के ‘रेत के बहाने’ लेख में अभय का कहना है कि सेक्सुअलिटी के भौतिक और दृश्य पहलुओं के प्रति असहजता हिंदी रचनाकारों को वह क्षमता विकसित करने से रोक देती है, जिसके तहत वे अपने किरदारों के दैहिक व्यक्तित्व का प्रभावी वर्णन कर सकते हैं. किताब का सबसे बड़ा लेख ‘हिंंदी का ज्ञानकांड’ है, जिसमें रामविलास का ‘अर्ली-मॉडर्न’, परंपरा की आधुनिकता और हिंंदी-वर्चस्व का लोकतांत्रीकरण के बहाने इतिहास लेखन से लेकर हिंदुस्तानी भाषा पर गहन विश्लेषण है. हिंंदी के गंभीर पाठकों के लिए यह जरूरी किताब है.
मनोज मोहन

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