-सेंट्रल डेस्क-
आजादी के बाद पहला संसदीय चुनाव 1952 में हुआ था. उस समय निर्वाचित हुए लोकसभा सदस्यों में से अब सिर्फ चार जीवित बचे हैं. ये हैं- छत्तीसगढ़ के रेशमलाल जांगड़े, मणिपुर के रिशांग कीशिंग, विशाखापत्तनम के कंडाला सुब्रमण्यम तिलक और तल्लारेवु के कनेति मोहन राव.
रेशमलाल जांगड़े अभी 90 साल के हैं. पंडित जवाहरलाल नेहरू उन्हें कांग्रेस और संसद में लेकर आये थे. आजकल वह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक सरकारी मकान में रहते हैं. वह कहते हैं कि आजादी के आंदोलन ने हमें तपा कर मजबूत बना दिया था, यही वजह है कि इस उम्र में भी पूरी तरह सक्षम हैं और चुनाव अभियानों में शामिल होने का भी दम-खम रखते हैं.
जांगड़े का जन्म इसी राज्य के परसाडीह गांव में एक गरीब दलित किसान परिवार में सन 1925 में हुआ था. वह रोज तैर कर महानदी पार करके स्कूल जाते थे. 1939 से 1942 के बीच वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रभावित रहे और भड़काऊ भाषण देने की वजह से जेल भेज दिये गये. लेकिन, इसके बाद उन पर गांधीजी का असर हुआ और वह भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हो गये. इस क्रम में वह दलित समुदाय और अन्य पिछड़ी जातियों के बड़े नेता के रूप में उभरे. यहीं से वह नेहरू की निगाह में आये.
जांगड़े ने नागपुर से वकालत की डिग्री ली थी. वह वकालत करनेवाले सतनामी समाज के पहले शख्स थे. अनुसूचित जाति से आने के बावजूद उन्होंने 1952 में पहला लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर एक सामान्य सीट, बिलासपुर से लड़ा. 70 के दशक में वह आपातकाल के दौरान जेपी आंदोलन से प्रभावित हुए और जनता पार्टी में शामिल हो गये. यहां से वह भाजपा की ओर मुड़ गये.संसद में उनकी अंतिम पारी 1989 से 1991 तक, भाजपा सदस्य के रूप में रही. इसके बाद उन्हें टिकट नहीं मिला, पर वह अब भी भाजपा से जुड़े हुए हैं. वह चुनाव प्रचार में धनबल और बाहुबल के बढ़ते प्रभाव से दुखी हैं.
जांगड़े के परिवार का अपना अलग दुख है. उसे लगता है कि स्वतंत्रता सेनानी और ईमानदार राजनीतिज्ञ के रूप में जांगड़े के योगदान की उपेक्षा की गयी है. उनके बेटे हेमचंद जांगड़े कहते हैं- आज हम गरीबी में जी रहे हैं, हमारे पास कोई खास सुविधाएं नहीं हैं. पिताजी ने कभी ज्यादा पैसा बनाया नहीं और आज पार्टियों ने उन्हें भुला दिया है. हालांकि, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार 2012 में उनसे मिली थीं और उसी साल 12 मई को राष्ट्रपति ने पहली लोकसभा के चारों जीवित सदस्यों को सम्मानित भी किया था.
94 वर्षीय रिशांग कीशिंग देश के सबसे बुजुर्ग पूर्व सांसद हैं. वह खुद को रिटायर मान कर आजकल बागबानी का शौक पूरा कर रहे हैं. लेकिन यह भी कहते हैं कि जरूरत पड़ने पर वह सड़कों पर उतर सकते हैं. इस साल की शुरुआत में उन्होंने मणिपुर से राज्यसभा जाने के लिए अपनी पार्टी कांग्रेस को मना कर दिया था. वह चार बार मणिपुर के मुख्यमंत्री भी रहे हैं. वह भी संसद में आये मौजूदा बदलावों से दुखी हैं.
90 वर्षीय के. मोहन राव आंध प्रदेश के गोदावरी जिले के तल्लारेवु में रहते हैं. वह सिर्फ 27 साल की उम्र में सांसद बन गये थे. 1952 में वह भाकपा के टिकट पर काकीनाडा और राजमुंदरी सीटों से लड़े थे. वह अपनी खुशनसीबी मानते हैं कि उन्हें संसद में डॉ भीमराव आंबेडकर के बगल में बैठने और चर्चा करने का मौका मिला. वह जमींदारी के खिलाफ आंदोलन के अगुवा थे. आज उनके पास एकमात्र संपत्ति तल्लारेवु में 8 एकड़ जमीन का एक टुकड़ा हे. वह दो साल पहले तक 1400 रुपये पेंशन पर गुजारा कर रहे थे. इस बीच संसदीय कार्य मंत्री राजीव शुक्ला ने इस बारे में खबर पढ़ी और उनकी पेंशन 20,000 रुपये महीना करवा दी.
93 वर्षीय सुब्रमण्यम तिलक ने कानून की पढ़ाई की थी और उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. इसके लिए उन्हें विजियानगरम में चार महीने की जेल भी हुई थी. 1940 में जयप्रकाश नारायण विजियानगरम आये. उनके आह्वान पर वह मजदूर आंदोलन से राजनीति में आये. वह जेपी के अलावा विनोबा भावे, अशोक मेहता, जॉर्ज फर्नाडीस और जी रामचंद्र राव से करीब से जुड़े थे. 1952 में वह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर 32 साल की उम्र में संसद के लिए चुने गये. आतिशी नेता, तिलक दोस्तों से उधार लेकर शपथ लेने गये थे. बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़ दी. 1977 में वह चेन्नई में रेलवे सर्विस कमीशन के प्रमुख बने. वह आज की राजनीति में नैतिकता खत्म होने से दुखी हैं.
(सूचनाएं व तथ्य आउटलुक से साभार)
