इंडियन स्वाद
पुष्पेश पंत
बारिश का मौसम अपने साथ सिर्फ पानी और नमी लेकर ही नहीं आता है, बल्कि हमारे मिजाज की नमी को दूर करने के लिए चटपटेदार जायके भी लेकर आता है. यही वजह है कि मॉनसून की अगवानी अधिकतर लोग गरमा-गरम पकौड़ियों से करते हैं. ये पकौड़ियां हर जगह अपने नये और अलग अंदाज में बनायी जाती हैं. चटपटी पकौड़ियों के बारे में बता रहे हैं भारतीय व्यंजनों के माहिर प्रोफेसर पुष्पेश पंत…
बारिश की पहली बौछार ही कुछ ऐसा जादू जगाती है कि गर्मियों की मंदभूख अचानक खुल जाती है
और बहुत कुछ तला-भुना खाने को मन ललचाने लगता है. मॉनसून की अगवानी अधिकतर लोग गरमा-गरम पकौड़ियों से करते हैं. हालांकि आजकल कुछ लोग, जो अपनी सेहत के बारे में कुछ ज्यादा ही फिक्रमंद हैं, इनसे परहेज करने लगे हैं. हम उनमें से नहीं हैं और पकौड़ी हो या पकौड़े, चाहे जिस भी शक्ल-सूरत के हों, हम जमकर निबटाते हैं.
छोटे आकार की पकौड़ियां पालक या मेथी की दक्षिणी भारत में भजिया कहलाती है और उड़ीसा में पतली कतरी प्याज की पकौड़ियां पियाजी नाम से मशहूर है. बंगाल में इन्हें तेलिया कहते हैं, जिसके बारे में यह जनश्रुति है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपनी युवा अवस्था में अपने घर के नजदीक एक दुकान में जाकर इनका स्वाद लेते थे. इस दुकान को चलानेवाले बिहार से आये एक शाहूजी थे. बंगाल में पकौड़ियों के अलावा भाजा सदाबहार व्यंजन है, जिसमें बैगूनी या हल्के बेसन की परत वाला बैंगन का भाजा सबसे मशहूर है. पंजाब में गोभी के साथ-साथ पनीर के पकौड़े बड़े चाव से खाये जाते हैं. वहीं उत्तर प्रदेश में आलू-पालक, प्याज और मेथी के साथ-साथ मिर्च का चलन है.
देश के धुर उत्तर में जम्मू-कश्मीर राज्य में पंडित वाजवान में कमल ककड़ी के डंठल को मोटी-मोटी कतरों में छीलकर उसे मसालेदार बेसन के घोल में तलकर स्थानीय पकौड़े का अवतार प्रकट होता है. हिंदुस्तान का शायद ही कोई हिस्सा है, जहां भजियां या पकौड़े बारिश का मजा दोगुना ना करते हों.
मगर यह न समझें कि बारिश का मजा सिर्फ पकौड़ों के साथ ही लिया जा सकता है. महाराष्ट्र में नाश्ते के लिए जो साबूदाना-बड़े खाये जाते हैं, उनमें तेल का प्रयोग कम होता है और उन्हें ज्यादा सेहतमंद समझा जाता है. मैसूर में बॉन्डा ज्यादा पसंद किया जाता है, जिसे आप मराठी पाव के साथ खाये जानेवाले आलू वड़ा का सहोदर समझ सकते हैं. समोसे की तरह की, मगर उससे कम मिर्च-मसाले वाले पिट्ठी इसके भीतर भरी जाती है और मेथीदाना, राई और करी पत्ता इसका साथ देते हैं. तमिलनाडु में चेटिनाडु क्षेत्र में पनियारम खाया-खिलाया जाता है. यह व्यंजन नन्हीं-नन्हीं इडलियों को एक विशेष पात्र में तलकर बनाया जाता है. यह पात्र आजकल लगभग हर जगह मिल जाता है और आप बड़े मजे से घर बैठकर इसका आनंद ले सकते हैं.
हाल के वर्षों में विदेशी व्यंजनों के साथ भारतीय पारंपरिक व्यंजनों की जुगलबंदी फ्यूजन के नाम पर साधी जाती रही है. हमारे एक युवा शेफ मित्र, जो मूलतः झारखंड निवासी हैं और कई अंतरराष्ट्रीय खान-पान समारोहों में अपने इस तरह के आविष्कारों से नाम कमा चुके हैं. वे अपने पकौड़ों में बेसन का नहीं, बल्कि जापानी टैम्पूरा के चावल के आटे का प्रयोग करते हैं और यह घोल बेसन वाली घोल की तुलना में काफी पतला होता है, इसलिए ये पकौड़े एक पारदर्शी आवरण में लिपटे नजर आते हैं.
यदि आप कुछ ज्यादा ही प्रयोग प्रेमी हैं, तो बारिश के नम मौसम को चटपटा बनाने के लिए तले की जगह सिंके, नमकीन चबैने का प्रयोग कर सकते हैं. छोटी-छोटी पोटलीनुमा कचौड़ियां और समोसे को नॉनस्टिक तवे पर बहुत हल्के तेल में सिंके खुंभ भाप में पकी मक्की के दाने या सिर्फ एक बार आंच दिखाये पनीर टिक्के के साथ खाइए और खिलाइए. साथ में यह तराना भी सुनते जाइए- बरखा बहार आयी… रस की फुहार लायी…
आवश्यक विधि
छोटे आकार की पकौड़ियां पालक या मेथी की दक्षिणी भारत में भजिया कहलाती हैं और ओड़िशा में पतली कतरी प्याज की पकौड़ियां पियाजी नाम से मशहूर हैं.
पुष्पेश पंत
