नयी किताब: महिमा गाथा

यह पुस्तक गुरुदेव के चमत्कारी पक्ष पर ध्यान केंद्रित किये हुए है. भानुमति श्रीश्री को बुद्ध के बरअक्स देखती हैं. श्री श्री रविशंकर की छोटी बहन भानुमति नरसिम्हन ने रविशंकर की बायोग्राफी ‘गुरुदेव : शिखर पर अचल’ लिखा है. समाज का वह ऊपरी तबका, जो आर्थिक समृद्धि के बावजूद शांति और स्वास्थ्य की तलाश में […]

यह पुस्तक गुरुदेव के चमत्कारी पक्ष पर ध्यान केंद्रित किये हुए है. भानुमति श्रीश्री को बुद्ध के बरअक्स देखती हैं.

श्री श्री रविशंकर की छोटी बहन भानुमति नरसिम्हन ने रविशंकर की बायोग्राफी ‘गुरुदेव : शिखर पर अचल’ लिखा है. समाज का वह ऊपरी तबका, जो आर्थिक समृद्धि के बावजूद शांति और स्वास्थ्य की तलाश में रहता है, उस वर्ग के गुरु श्रीश्री रविशंकर माने जाते हैं. पाठकों का एक बड़ा तबका है, जो इस किताब को हाथों-हाथ लेकर पढ़ेगा. भानुमति जी रविशंकर को न सिर्फ देखती ही रही हैं, बल्कि उन्हें श्रीश्री की आध्यात्मिक प्रतिभा और महिमा के बारे में सुनने को भी पर्याप्त मिला है. उन्होंने यहां देखने से ज्यादा सुनी हुई बात को महिमा-मंडित किया है. उनमें रविशंकर के प्रति एक गहरा आस्थाबोध है, जो उनकी छोटी बहन होने की स्वाभाविक परिणति है.

श्रीश्री की पहली अधिकृत जीवनी फ्रांस्वा गोतिए ने ‘द गुरु अॉफ ज्वाॅय’ शीर्षक से लिखा था. उसके बाद स्वयं प्रकाश ने ‘जीना सिखा दिया’ लिखा. ये दोनों लेखक श्रीश्री के शिष्य रहे हैं. इसके बावजूद फ्रांस्वा गोतिए में एक वस्तुनिष्ठ दृष्टि है. उस दृष्टि का इस पुस्तक में अभाव है.

तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था ‘एक प्रबुद्ध समाज का श्रीश्री का लक्ष्य वस्तुतः एक असाधारण स्वप्न है.’ उनका स्वर सकारात्मक था. लेकिन, बीतते समय में रविशंकर को कई मौके पर अपने व्यक्त विचारों के कारण संदिग्ध स्थिति का सामना करना पड़ा है. ‘संतन को कहां सीकरी सों काम’ को माननेवाले लोगों के लिए गुरुदेव की राजनीतिक आसक्ति चौंकाती है. वर्तमान प्रधानमंत्री के शपथग्रहण के मौके पर उनकी उपस्थिति को लोगों ने पसंद नहीं किया था.

यह पुस्तक गुरुदेव के चमत्कारी पक्ष पर ध्यान केंद्रित किये हुए है. श्रीश्री को बुद्ध के बरअक्स रखते हुए भानुमति कहती हैं- जहां कहीं शिष्य के प्यासे होने की खबर मिलती हैं, वहीं भगवान बुद्ध दौड़े चले आते हैं, जबकि गुरुदेव का कहना है- ऐसा नहीं है कि केवल शिष्य ही गुरु की ओर बढ़ते हैं, बल्कि गुरु भी शिष्य से मिलने के लिए आगे बढ़ते हैं.

वेस्टलैंड पब्लिकेशन से प्रकाशित इस पुस्तक का अनुवाद बेहद साधारण है और प्रूफ की गलतियां पढ़ने में खलल डालती हैं. लेखक को थोड़ा संशयशील होना चाहिए था. भानुमति बहन और शिष्य के फर्ज निभाने में यह भूल गयीं कि पाठकों को तथ्यों की जानकारी मिलनी चाहिए. फिर भी आध्यात्मिक रुचि के पाठकों को यह किताब पसंद आयेगी.

मनोज मोहन

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