जहां पहुंचने के लिए इंसानों को महीनों की ट्रेनिंग और काफी हिम्मत की जरूरत पड़ती है, वहां अब एक रोबोट ने चढ़ाई कर दुनिया को हैरान कर दिया है. पेंबा नाम के ह्यूमनाइड रोबोट ने इक्वाडोर के बर्फीले चिम्बोराजो ज्वालामुखी पर 6,000 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई तक पहुंचकर इतिहास रच दिया है. दावा है कि इतनी ऊंचाई तक चढ़ने वाला यह दुनिया का पहला ह्यूमनाइड रोबोट है. ऐसे में अब इसे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर भेजने की तैयारी की जा रही है, जहां यह पर्यावरण से जुड़े एक खास मिशन को पूरा करेगा.
बर्फीले पहाड़ पर पेंबा ने दिखाया दम
चिम्बोराजो ज्वालामुखी पर चढ़ना आसान नहीं है. बर्फ से ढके रास्ते, फिसलन और बेहद कम तापमान इस सफर को काफी मुश्किल बनाते हैं. इन सभी चुनौतियों के बावजूद पेंबा 6,000 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई तक पहुंचने में सफल रहा. इस रोबोटिक पर्वतारोहण मिशन को अमेरिका के एक गैर-लाभकारी संगठन और नेपाल की एक एक्सपीडिशन कंपनी ने मिलकर पूरा किया है. इस सफलता ने दिखाया है कि आने वाले समय में रोबोट का इस्तेमाल उन जगहों पर भी किया जा सकता है, जहां इंसानों के लिए जाना मुश्किल या जानलेवा हो सकता है.
सिर्फ 35 किलो वजन, लेकिन काम बड़े-बड़े
पेंबा की ऊंचाई 1.32 मीटर है और इसका वजन करीब 35 किलोग्राम है. आकार में छोटा दिखने वाला यह रोबोट कठिन पहाड़ी रास्तों और खराब मौसम का सामना करने के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है. इसमें मशीन लर्निंग पर काम करने वाला एडवांस्ड सिस्टम लगाया गया है. यह तकनीक पेंबा को ऊबड़-खाबड़ और फिसलन वाले रास्तों पर संतुलन बनाए रखने में मदद करती है. रास्ते में अचानक कोई मुश्किल आने पर यह परिस्थितियों को समझकर आगे बढ़ने का फैसला भी ले सकता है.
कड़ाके की ठंड में भी नहीं रुकेगा पेंबा
ऊंचे पहाड़ों पर तापमान -20°C से भी नीचे जा सकता है. इतनी ठंड में सामान्य बैटरी और मशीनों के पार्ट्स ठीक से काम करना बंद कर सकते हैं. इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए पेंबा में हीटेड बैटरी कंपार्टमेंट दिया गया है, जो उसकी बैटरी को काम करने लायक तापमान पर बनाए रखने में मदद करता है. रोबोट के अलग-अलग मैकेनिकल पार्ट्स में खास तरह के लुब्रिकेंट का इस्तेमाल किया गया है. इस तरह के लुब्रिकेंट बेहद कम तापमान वाली परिस्थितियों में मशीन के पार्ट्स को ठीक से काम करने में मदद करते हैं.
नेटवर्क नहीं मिला तो खुद लेगा फैसला
पेंबा की सबसे दिलचस्प खूबियों में इसका ऑटोनॉमस मोड भी शामिल है. कम ऊंचाई वाले इलाकों में इसे सैटेलाइट कनेक्टिविटी की मदद से कंट्रोल किया जा सकता है. लेकिन पहाड़ों की ऊंचाई पर अगर नेटवर्क या कनेक्टिविटी नहीं मिलती है, तो पेंबा खुद काम कर सकता है. ऑटोनॉमस मोड में यह अपने आसपास के माहौल और रास्ते की स्थिति को समझकर फैसला लेने में सक्षम है. एवरेस्ट जैसे कठिन और दूर-दराज के इलाकों में यह तकनीक काफी काम आ सकती है.
अब दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर नजर
चिम्बोराजो पर सफल चढ़ाई के बाद अब पेंबा के लिए इससे भी बड़ी चुनौती तैयार है. अगली योजना इसे माउंट एवरेस्ट पर भेजने की है. मिशन के दौरान रोबोट को अलग-अलग पार्ट्स में पहाड़ पर ले जाया जाएगा और जरूरत के अनुसार अलग-अलग कैंप पर इंजीनियर इसे फिर से जोड़ेंगे. योजना के अनुसार, पेंबा को 5,364 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद एवरेस्ट बेस कैंप से लेकर 7,920 मीटर की ऊंचाई वाले कैंप-IV तक इस्तेमाल किया जा सकता है. यहां इसे कड़ाके की ठंड, बर्फीले रास्तों और कम ऑक्सीजन जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना होगा.
रोबोट के लिए बनाने पड़ सकते हैं नए नियम
रोबोट का पहाड़ पर चढ़ना अपने आप में एक नया मामला है. फिलहाल नेपाल में रोबोटिक पर्वतारोहण को लेकर अलग से स्पष्ट नियम नहीं हैं. ऐसे में पेंबा के एवरेस्ट मिशन से पहले सुरक्षा, संचालन और दूसरी जरूरी प्रक्रियाओं के लिए नए नियम तैयार किए जा सकते हैं. इस पूरे रोबोटिक पर्वतारोहण मिशन पर करीब 1.7 करोड़ रुपये से 4.2 करोड़ रुपये तक खर्च होने का अनुमान है. अगर पेंबा एवरेस्ट मिशन में सफल होता है, तो यह रोबोटिक्स की दुनिया में एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है. भविष्य में ऐसे रोबोट मुश्किल इलाकों में पर्यावरण की जांच करने, जरूरी डेटा जुटाने और जोखिम भरे मिशन पूरा करने में इंसानों की मदद कर सकते हैं.
(प्रस्तुति: स्वप्निल श्रीवास्तव)
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