भारत में मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने Mobile Phone Manufacturing Scheme (MPMS) 2.0 लॉन्च की है. इस स्कीम के लिए कुल 62,500 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है. इसका मकसद देश में मोबाइल फोन की मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू स्तर पर वैल्यू एडिशन को मजबूत करना और भारतीय मोबाइल ब्रांड्स को सपोर्ट देना है.
सरकार इस स्कीम को 5 साल तक लागू करेगी. इसकी शुरुआत वित्त वर्ष 2026-27 से होगी और यह वित्त वर्ष 2030-31 तक चलेगी. सरकार के मुताबिक, स्कीम का पहला परफॉर्मेंस ईयर FY 2026-27 होगा.
स्कीम के तहत दो सेगमेंट होंगे
मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों के लिए सरकार ने इस स्कीम को दो हिस्सों में रखा है. पहले हिस्से में देश में मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों को बढ़ावा दिया जाएगा. वहीं, दूसरे हिस्से में भारतीय मोबाइल फोन ब्रांड्स को आगे बढ़ने में मदद की जाएगी.
मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों के लिए कुछ जरूरी शर्तें भी रखी गई हैं. भारत में रजिस्टर्ड कंपनियां इस स्कीम का फायदा उठा सकेंगी. इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स सामान बनाने वाली कंपनियां भी शामिल हैं. हालांकि, कंपनी का वित्त वर्ष 2025-26 में कम से कम 10,000 करोड़ रुपये का टर्नओवर होना चाहिए.
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इस स्कीम के तहत भारत में बनाए गए मोबाइल फोन बेचने पर कंपनियों को सरकार की तरफ से PLI यानी प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव मिलेगा. यह मदद 5 साल तक मिलेगी और इसकी दर 2.25 फीसदी से 5 फीसदी तक होगी. कितनी मदद मिलेगी, यह मोबाइल फोन की कैटेगरी और उस वित्त वर्ष पर निर्भर करेगा.
लोकल कंपोनेंट्स के लिए मिलेगा एक्स्ट्रा इंसेंटिव
इस स्कीम का एक बड़ा फोकस भारत में बने कंपोनेंट्स के यूज को बढ़ावा देना है. इसके तहत कंपनियों को घरेलू स्तर पर जरूरी कंपोनेंट्स और सब-असेंबली तैयार करने पर 1.5 फीसदी तक का एक्स्ट्रा इंसेंटिव मिल सकता है. इसमें डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा मॉड्यूल, एनक्लोजर, बैटरी और USB केबल जैसे कंपोनेंट्स शामिल हैं.
हालांकि, इस एक्स्ट्रा इंसेंटिव का फायदा लेने के लिए कंपनियों को एक शर्त पूरी करनी होगी. वित्त वर्ष में बेचे गए कुल मोबाइल फोन यूनिट्स में कम से कम 25 फीसदी यूनिट्स के लिए इन कंपोनेंट्स को लोकलाइज्ड करना जरूरी होगा. सरकार को उम्मीद है कि इस कदम से देश में मोबाइल कंपोनेंट्स की सप्लाई चेन और मजबूत होगी. साथ ही, दूसरे देशों से कंपोनेंट्स मंगाने की जरूरत भी कम होगी.
भारतीय मोबाइल ब्रांड्स पर फोकस
इस स्कीम का दूसरा टारगेट सेगमेंट भारतीय मोबाइल फोन ब्रांड्स को सपोर्ट करना है. इसके तहत Electronics manufacturing services (EMS) कंपनियों समेत वे कंपनियां पात्र होंगी, जिनका वित्त वर्ष 2025-26 में कम से कम 1,000 करोड़ रुपये का टर्नओवर रहा हो. इसका फायदा उठाने के लिए भारतीय ब्रांड का भारत में रजिस्टर या इनकॉरपोरेट होना जरूरी है. साथ ही, उसकी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) और ट्रेडमार्क भी भारत में ही होल्ड होना चाहिए.
इतना ही नहीं, कंपनी का मैनेजमेंट कंट्रोल भारतीय नागरिकों के पास होना चाहिए और भारतीय ब्रांड का दावा करने वाली इकाई में 51 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी भारतीय नागरिकों की होनी जरूरी है. कंपनियों के पास भारत में अपनी R&D और डिजाइन टीम भी होनी चाहिए.
इंसेंटिव की बात करें तो भारतीय ब्रांड्स को योग्य बिक्री पर 5 फीसदी का इंसेंटिव मिलेगा. इसके अलावा, भारत में किए गए प्रोडक्ट डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के लिए 3 फीसदी का एक्स्ट्रा इंसेंटिव भी दिया जा सकता है.
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