कल्पना कीजिए, आप घर पर आराम से बैठे हैं और अचानक फोन की घंटी बजती है. दूसरी तरफ से किसी ‘सीबीआई अधिकारी’ का दावा कि आपके बैंक अकाउंट से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग की जांच चल रही है. कुछ ही मिनटों में वीडियो कॉल पर यूनिफॉर्म पहने व्यक्ति स्क्रीन पर नजर आता है, फर्जी वॉरंट दिखाता है और कहता है- “आप डिजिटल अरेस्ट में हैं, फोन मत काटिए, परिवार को कुछ मत बताइए, वरना गिरफ्तारी हो जाएगी.” घबराहट में आप लाखों-करोड़ों ट्रांसफर कर देते हैं. यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि भारत में तेजी से फैल रहा साइबर घोटाला है, जहां एक छोटी-सी गलती पूरे परिवार की जिंदगी बर्बाद कर देती है. भले ही 2025 में जागरूकता के कारण मामले थोड़े कम हुए हों, लेकिन खतरा अब भी मंडरा रहा है और लाखों लोग इसके शिकार हो चुके हैं.
डिजिटल अरेस्ट स्कैम का पूरा तरीका: कैसे शिकार फंसाते हैं ठग?
साइबर ठग अब पुराने तरीकों से आगे निकल चुके हैं. वे पहले स्पूफ्ड नंबर से कॉल करते हैं, खुद को पुलिस, ईडी या सीबीआई अधिकारी बताते हैं और कहते हैं कि आपके आधार या बैंक अकाउंट से जुड़ी कोई गंभीर धोखाधड़ी हुई है. फिर व्हाट्सऐप या वीडियो कॉल पर फर्जी दस्तावेज दिखाते हुए ‘डिजिटल अरेस्ट’ का आदेश देते हैं. पीड़ित को घंटों वीडियो पर रखा जाता है, परिवार से बात करने की मनाही होती है और लगातार दबाव डाला जाता है कि ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’ या ‘जुर्माना’ के रूप में पैसा ट्रांसफर कर दो. कई बार गहरे फेक वॉइस या यूनिफॉर्म वाले डीपफेक का भी इस्तेमाल होता है. असल में भारतीय कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, लेकिन डर के माहौल में पीड़ित समझ ही नहीं पाते.
आंकड़े बयां करते हैं भयावह सच्चाई: लाखों करोड़ का नुकसान
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2022 में 39,925 मामले दर्ज थे जिनमें 91 करोड़ रुपये लुटे. 2024 तक यह संख्या 1,23,672 पहुंच गई और नुकसान 1,935 करोड़ रुपये से ज्यादा का हो गया. अप्रैल 2021 से नवंबर 2025 तक कुल 54,000 करोड़ रुपये से अधिक की रकम ठगों के हाथ लग चुकी है. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहर सबसे ज्यादा प्रभावित रहे. 2025 में जागरूकता अभियानों के चलते मामले 86 प्रतिशत कम हुए, लेकिन फिर भी 17,264 शिकायतें आईं और 644 करोड़ रुपये गंवा दिये गए. बुजुर्ग, डॉक्टर, रिटायर्ड अधिकारी और यहां तक कि सांसद भी शिकार बन चुके हैं. एक गलती का खामियाजा पूरी जिंदगी चुकाना पड़ रहा है.
पीड़ितों पर मानसिक और आर्थिक प्रभाव: परिवार बिखर रहे हैं
इस घोटाले का सबसे बड़ा असर पीड़ितों की मानसिक स्थिति पर पड़ता है. घंटों की वीडियो निगरानी, लगातार धमकियां और अकेलापन इतना बढ़ जाता है कि कई लोग हार्ट अटैक या डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं. एक बेंगलुरु की महिला ने छह महीने तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ झेला और 31 करोड़ रुपये गंवाए. दिल्ली में एक बुजुर्ग दंपति ने एक करोड़ से ज्यादा खोया. आर्थिक नुकसान तो है ही, लेकिन परिवारों में विश्वास टूटता है, रिश्ते बिगड़ते हैं और कई बार आत्महत्या तक की खबरें आती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ पैसा लूटने का नहीं, बल्कि पूरे जीवन को तहस-नहस करने का खेल है.
सरकार और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: CBI को मिला फ्री हैंड
मामलों की गंभीरता देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में स्वत: संज्ञान लिया और सीबीआई को पूरे देश में डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच का प्राथमिक अधिकार दे दिया. कोर्ट ने इसे ‘डकैती’ करार दिया और बैंकों को म्यूल अकाउंट्स पर सख्ती बरतने के निर्देश दिये. गृह मंत्रालय ने व्हाट्सऐप से डिवाइस आईडी ब्लॉक करने को कहा, जबकि राज्यों में साइबर सेल्स को मजबूत किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में भी इसकी चेतावनी दी. अब पुलिस बड़े-बड़े गिरोहों को पकड़ रही है- दिल्ली पुलिस ने हाल ही में झारखंड-उत्तराखंड से छह आरोपियों को गिरफ्तार किया, जबकि सीबीआई ने कई राज्यों में छापेमारी की.
बचाव का सबसे आसान तरीका: जागरूकता ही हथियार
इस घोटाले से बचना मुश्किल नहीं है. सबसे पहले याद रखें- कोई भी सरकारी अधिकारी फोन या वीडियो पर अरेस्ट नहीं करता, न ही पैसे मांगता है. अगर ऐसी कॉल आये तो तुरंत फोन काट दें, परिवार को बताएं और 1930 या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें. OTP, बैंक डिटेल्स या किसी ऐप का रिमोट ऐक्सेस कभी शेयर न करें. संदिग्ध कॉल पर *#21# डायल करके फॉरवर्डिंग चेक करें. बैंक मैनेजर से सीधे संपर्क करें. जागरूकता अभियान ‘रुको, सोचो, एक्शन लो’ इसी का हिस्सा है. छोटी-सी सावधानी लाखों रुपये और सम्मान बचा सकती है.
यह भी पढ़ें: पुणे में डिजिटल अरेस्ट स्कैम, 1.2 करोड़ गंवाने के सदमे से 83 साल के बुजुर्ग की मौत, आप रहें अलर्ट
यह भी पढ़ें: WhatsApp – Telegram पर फैल रहे फर्जी mParivahan ऐप और RAT मैलवेयर, सेकेंडों में हो जाएगी आपकी पहचान और कमाई की चोरी
