मालदा : जंजीर से बंधी काली माता की पूजा देखने के लिए हबीबपुर ब्लॉक की जाजइल ग्राम पंचायत के मानिकोड़ा गांव में हजारों की संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ती है. यहां चक्षुदान के समय काली माता के सामने पहली बलि होती है. बलि के समय देवी मां सामने की तरफ झुक नहीं पड़ें और इससे प्रतिमा को कोई नुकसान न हो, इसके लिए भक्त देवी की प्रतिमा को पीछे से जंजीर से बांध कर रखते हैं.
करीब 500 साल पुरानी इस पूजा को लेकर मानिकोड़ा गांव में सात दिवसीय मेला लगता है. दूर-दूर से भक्त मां काली के दर्शन करने आते हैं. काली पूजा की रात से लेकर अगले दिन की सुबह तक असंख्य बकरों, कबूतर और सफेद कुम्हड़े की बलि दी जाती है. बलिबेदी के सामने मशाल जलाकर रखी जाती है. जब तक मंदिर में पूजा चलती है, तब तक मंदिर प्रांगण इलाके में असंख्य मशालें जलती नजर आती हैं.
इलाके के बुजुर्गों ने बताया कि मानिकोड़ा की काली पूजा डकैतों ने शुरू की थी. बाद में यह पूजा इलाके के एक जमींदार ने अपने हाथों में ले ली. जमींदार के निधन के बाद स्थानीय ग्रामीणों के प्रयास से पूजा चालू रही. लोगों ने मिल-जुलकर मानिकोड़ा श्यामाकाली मंदिर का भी निर्माण कराया. इसके अलावा मानिकोड़ा सार्वजनिक काली पूजा कमेटी का भी गठन हुआ.
कमेटी के संयुक्त सचिव सजल राय ने बताया कि देवी की प्रतिमा के अगल-बगल डाकिनी और जोगिनी विराजती हैं. बलि देते हुए मां का चक्षुदान किया जाता है. उस समय देवी माता सामने की ओर झुक जाती हैं.
जब तक यह अलौकिक दृश्य लोग अपनी आंखों से नहीं देख लेते, तब तक इस पर विश्वास कर पाना कठिन होता है. यह दृश्य देखने के लिए मंदिर प्रांगण में भारी संख्या में लोग उमड़ पड़ते हैं. इस पूजा को लेकर और भी कई कथाएं प्रचलित हैं. यहां हर सप्ताह मंगलवार और शनिवार को बलि के साथ धूमधाम से पूजा होती है.
