रायगंज के बाजारों से नदारद विभिन्न प्रजाति की छोटी मछलियां

रायगंज : बारिश के इस भरे मौसम में भी रायगंज बाजारों में विभिन्न प्रजाति की छोटी मछलियां नदारद हैं. स्थानीय छोटे नहरों, खाल-बील, तलाब या पोखरों में मिलने वाली विभिन्न प्रकार की मछलियां विलुप्ती के कगार पर है. विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी मछलियों के वंश विस्तार के लिए अनुकूल परिवेश नष्ट हो रहा […]

रायगंज : बारिश के इस भरे मौसम में भी रायगंज बाजारों में विभिन्न प्रजाति की छोटी मछलियां नदारद हैं. स्थानीय छोटे नहरों, खाल-बील, तलाब या पोखरों में मिलने वाली विभिन्न प्रकार की मछलियां विलुप्ती के कगार पर है.

विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी मछलियों के वंश विस्तार के लिए अनुकूल परिवेश नष्ट हो रहा है. दूसरी ओर ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए वाणिज्यिक स्तर पर मछली पालन किये जाने के कारण पोठी सहित अन्य छोटी मछलियों का परिवेश नष्ट हो रहा है.
जिला मत्स विभाग सहित अधिकारी अभिजीत कुमार साहा ने कहा कि मत्स्य संचार योजना के तहत विलुप्त हो रही मछलियों का जीरा नदी में छोड़ा जा रहा है. इसके कारण कई प्रकार की छोटी मछलियां नहीं मिल रही है.
उन्होंने कहा कि वाणिज्यिक तौर पर छोटी मछली पालन को प्रोत्साहन दिया जा रहा है. इसके बावजूद कुछ कुछ छोटी मछलियां विलुप्त हो रही है. जुलाई महीने में उत्तर दिनाजपुर जिले के नागर, कुलिक, महानंदा, श्रीमती सहित विभिन्न नदियों में मछली इतनी ज्यादा नहीं मिल रही.
मछली पालकों का कहना है कि बारिश शुरू होते ही पोठी, टेंगरा, कवई, सिंघी, मांगुर, गरई, तीनकाटा, चिंगड़ी सहित विभिन्न प्रजाति की मछलियां इलाके में खूब मिलती थी. राजगंज के मोहनबाटी बाजारों में प्रतिदिन दो किलो छोटी मछली भी नहीं आ रही है. जितनी भी मछली बाजार में आती है क्रेता उसे मुंह मांगी कीमत पर खरीद लेते हैं. इनके स्थान पर बाटा, रेहु व कतला मछली से अपने को तृप्त कर रहे है.
विशेषज्ञों ने बताया कि छोटी मछलियां बारिश के समय धान के खेत में वंश विस्तार करती है. लेकिन अब खेतों में रसायनिक खाद व कीटनाशकों का धड़ल्ले से प्रयोग बढ़ने के कारण छोटी मछलियां विलुप्त हो रही है.
जलाशयों में छोटी मछलियां ना पकड़ाने के कारण मछुआरों की कमाई कम हो गयी है. वहीं खरीददार पोठी मछली जैसी स्वादिस्ट मछलियों के लिए 600 से 800 रुपए किलो भी कीमत देने को तैयार बैठे है.

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