सिलीगुड़ी में भी इतिहास बन गया पीसीओ बूथ

सिलीगुड़ी: एक जमाना था, जब लोग घर से दूर रहनेवाले अपने रिश्तेदार, भाई-बंधू का हाल-चाल पूछने के लिए व उनसे दो-चार प्यार भरी बातें करने के लिए पब्लिक कॉल ऑफिस (पीसीओ)पर जाते थे. पहले हर दस कदम के फासले पर पीसीओ बूथ नजर आते थे, मगर अब अत्याधुनिक तकनीक के इस जमाने में पीसीओ बूथ […]

सिलीगुड़ी: एक जमाना था, जब लोग घर से दूर रहनेवाले अपने रिश्तेदार, भाई-बंधू का हाल-चाल पूछने के लिए व उनसे दो-चार प्यार भरी बातें करने के लिए पब्लिक कॉल ऑफिस (पीसीओ)पर जाते थे. पहले हर दस कदम के फासले पर पीसीओ बूथ नजर आते थे, मगर अब अत्याधुनिक तकनीक के इस जमाने में पीसीओ बूथ पर इक्का-दुक्का लोग ही नजर आते हैं. शहर से पीसीओ बूथ लुप्त होते जा रहे हैं. कई शहर तो अब ऐसे हैं जहां पीसीओ बूथ की उपस्थिति नहीं के बराबर है. एक समय था जब एसटीडी करने के लिए लोगों को समय तय कर पीसीओ में जाना पड़ता था व नंबर डायल कर बातें करनी पड़ती थी.

इसमें प्रति मिनट में काफी पैसे लगते थे, लेकिन अब एसटीडी, आइएसडी जैसी कॉल सुविधाएं सेल फोनों में ही समा गयी है. बस कोड नंबर दबाइये और दूर बैठे अपने रिश्तेदारों से बात करिये. अब लोगों को समय निकाल कर पीसीओ नहीं जाना पड़ता है, बल्कि चलते-चलते, खाते-खाते, होटल में, रेस्टूरेंट में बैठ कर लोग अपने मोबाइल से घंटों रिश्तेदारों से बातें करते हैं. वर्तमान समय में कोई भी कहीं भी एसटीडी, आइएसडी अपने ही सेल फोन से कर लेते हैं.

नई नई तकनीकि ने दुनिया काफी सिमट गयी है. अब तो बस हाथ में ही सबकुछ है. पीसीओ बूथ अब रोड, गलियारों को छोड़ कर इतिहास के पन्नों में अपना आशियाना बनाने जा रहे हैं. बदलते जमाने में एसटीडी बूथ की अहमियत नहीं रह गयी है. तकनीकि आविष्कारों ने इनसानी मुश्किलों का हल निकाल कर उसे आसान कर दिया है. आने वाले दिनों में शायद और भी परिवर्तन हो. सिलीगुड़ी के आश्रम पाड़ा निवासी एक एसटीडी बूथ के मालिक स्वपन सरकार ने कहा कि आजकल सभी के जेब में मोबाइल है, इसलिए दुकान में बहुत कम लोग ही आते हैं. ऐसे कस्टमर तो खूब आते हैं, लेकिन फोन करने के लिए नहीं, रिचार्ज वाउचर खरीदने के लिए. पहले जो लोग पीसीओ बूथ चलाते थे, आज कल वे टेलीफोन को एक कोने में रख कर, रिचार्ज वाउचर, प्रिटिंग, स्कैनिंग का व्यवसाय करने में लगे हैं. शहर के और एक पीसीओ बूथ मालिक ने कहा कि एक जमाना था, जब उनके बूथ में फोन के लिए लाइन लग जाती थी. और अब कोई नहीं आता. फिर भी समय बिताने के लिए वह अपना पीसीओ बूथ खोल कर रखते हैं.

उन्होंने कहा कि वर रिटायर हो गए हैं और अब यह टेलीफोन बूथ उनके लिए टाइम पास के समान है. पहले टेलीफोन व लैंड लाइन को घर की शान माना जाता था. आज कई घर ऐसे मिल जायेंगे, जहां टेलीफोन को कबाड़ में रख दिया गया है या तो बच्चों को खेलने के लिए दे दिया गया है. टेलीफोन विक्रेताओं का कहना है कि सरकारी व निजी कंपनियों, स्कूल-कॉलेज में इंटरकॉम के लिए ज्यादा टेलीफोन बिकते हैं. घर के लिए तो कोई फोन खरीदने नहीं आता है. कुछ दिनों पहले भी इंटरनेट कनेक्शन के लिए टेलीफोन का होना जरूरी था. लेकिन अब तो इंटरनेट भी डोंगल और सीम कार्ड से हो जाता है.

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