दलबदल की राजनीति में माहिर थे बंगाल के ‘चाणक्य’ मुकुल रॉय

कभी पश्चिम बंगाल की राजनीति के ‘चाणक्य’ और पर्दे के पीछे की रणनीति के माहिर माने जाने वाले मुकुल रॉय का लंबी बीमारी के बाद रविवार देर रात निधन हो गया. रॉय को राज्य की राजनीति में कई बार दलबदल के लिए भी जाना जाता रहा.

कोलकाता.

कभी पश्चिम बंगाल की राजनीति के ‘चाणक्य’ और पर्दे के पीछे की रणनीति के माहिर माने जाने वाले मुकुल रॉय का लंबी बीमारी के बाद रविवार देर रात निधन हो गया. रॉय को राज्य की राजनीति में कई बार दलबदल के लिए भी जाना जाता रहा. तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे रॉय के निधन के साथ ही वाम-युग के बाद के पश्चिम बंगाल की सबसे उतार-चढ़ाव भरी राजनीतिक यात्राओं में से एक का अंत हो गया. वर्ष 1954 में उत्तर 24 परगना जिले के कांचरापाड़ा में जन्मे रॉय ने 1980 के दशक में युवा कांग्रेस से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की.

ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर जब 1998 में तृणमूल कांग्रेस बनायी तो रॉय उन शुरुआती नेताओं में थे, जिन्होंने उनका साथ दिया. मृदुभाषी और कुशल आयोजक के रूप में पहचाने जाने वाले रॉय बयानबाजी से दूर रहते थे. बूथ समितियों, जिला स्तर के समीकरण, टिकट वितरण और गठबंधन प्रबंधन में उन्हें महारत हासिल थी. कुछ ही वर्षों में वह पार्टी के महासचिव बन गये और दिल्ली में प्रमुख संकटमोचक के रूप में उभरे. रॉय 2006 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए और बाद में फिर से चुने गए. वह 2009 में उच्च सदन में तृणमूल कांग्रेस के नेता बने. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दूसरे कार्यकाल में उन्होंने पहले पोत परिवहन राज्य मंत्री के रूप में काम किया और बाद में 2012 में रेल मंत्री बने लेकिन उनका वास्तविक राजनीतिक मंच पश्चिम बंगाल ही रहा. 2011 के चुनाव में तृणमूल की ऐतिहासिक जीत के साथ जब वाम दलों का लगातार 34 साल का शासन समाप्त हुआ, तो रॉय के नेतृत्व में दलबदल की अप्रत्याशित राजनीतिक लहर भी चली.

विपक्ष के नियंत्रण वाली नगरपालिकाएं और जिला परिषदों में रातों-रात सत्ता परिवर्तन होता दिखा. कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के कई नेताओं ने सत्ता के नये केंद्र को भांपते हुए सत्तारूढ़ पार्टी की ओर रुख किया. इससे पहले तक पश्चिम बंगाल अपनी वैचारिक स्थिरता पर गर्व करता था और दलबदल को अन्य राज्यों की बुराई बताकर खारिज किया जाता था लेकिन रॉय के दौर में दलबदल एक पद्धति की तरह बन गया. रॉय की इसी रणनीतिक क्षमता के कारण उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति का चाणक्य कहा जाने लगा. कुछ लोगों के लिए वह वैचारिक लचीलेपन के दौर में निर्मम व्यावहारिकता के प्रतीक थे, तो कुछ के लिए अवसरवाद का पर्याय थे लेकिन उनकी संगठनात्मक कुशलता पर शायद ही किसी ने सवाल उठाया हो. 2014 के राज्यसभा चुनाव और उसके बाद के स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान रॉय की पर्दे के पीछे की रणनीतियां तृणमूल के विस्तार का अभिन्न अंग बन गयीं. पार्टी की संगठनात्मक शक्ति पर उनकी छाप स्पष्ट थी. हालांकि, उनके कार्यों पर विवादों का साया भी पड़ा. उनका नाम सारधा चिट फंड मामले और नारदा स्टिंग ऑपरेशन में सामने आया. वह इन आरोपों को लगातार नकारते रहे. साथ ही तृणमूल के भीतर समीकरण भी बदल गये और सत्ता का केंद्रीकरण बनर्जी के इर्द-गिर्द और अधिक बढ़ गया. वह 2015 तक तृणमूल के महासचिव के रूप में पार्टी में दूसरे नंबर पर माने जाते थे लेकिन पार्टी से मतभेदों के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया. बनर्जी के साथ उनके रिश्ते 2017 तक और खराब हो गये. उन्होंने उस पार्टी को छोड़ दिया जिसे बनाने में उन्होंने अहम भूमिका निभायी थी और वह भाजपा में शामिल हो गये. तृणमूल के विस्तार के शिल्पकार उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल में शामिल हो गये. रॉय ने भाजपा में भी अपनी सुनियोजित रणनीति से पार्टी की मदद की. वह 2019 के लोकसभा चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रमुख समन्वयक के रूप में उभरे. उनके पीछे तृणमूल के कई और नेताओं ने दल बदला. पार्टी नेताओं ने दावा किया कि 2019 में पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीट में से 18 सीट जीतने में रॉय की नेताओं को शामिल करने की मुहिम की अहम भूमिका रही. उन्हें 2020 में भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया.

रॉय 2021 में भाजपा के टिकट पर कृष्णानगर उत्तर से विधायक चुने गये थे लेकिन विधानसभा चुनाव परिणामों के कुछ ही हफ्तों के भीतर वह तृणमूल में वापस लौट आये और इसे अपना पहला और आखिरी घर बताया. उस समय ममता बनर्जी ने लगातार तीसरी बार निर्णायक जीत हासिल की थी. वह तृणमूल कांग्रेस में दोबारा शामिल तो हो गये थे लेकिन उन्हें वह राजनीतिक दबदबा कभी वापस नहीं मिला जो उन्हें कभी प्राप्त था. स्वास्थ्य बिगड़ने के साथ ही वह धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर होते चले गये. रॉय का स्वास्थ्य 2021 में तेजी से खराब होता चला गया और उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से लोकसभा की लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था. कलकत्ता उच्च न्यायालय ने दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया. बाद में उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले पर रोक लगा दी. विडंबना यह है कि जिस कानून से वह लंबे समय से बचकर निकलते रहे थे और आलोचकों के अनुसार अपने करियर के चरम में जिसका उन्होंने हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था, वही अब उन्हीं पर भारी पड़ गया.

उन्हें मंच की बजाय एकांत, शोरगुल की बजाय बातचीत और नारों की बजाय आंकड़े अधिक पसंद थे. वह शायद ही कभी किसी आंदोलन का चेहरा बने हों, लेकिन अक्सर उसके सूत्रधार रहे. रॉय का जीवन पश्चिम बंगाल में 2011 के बाद की राजनीतिक उथल-पुथल को दर्शाता है, जिसमें कठोर वैचारिक रेखाओं का धुंधला होना, दलबदल और भावनाओं पर अस्तित्व की प्रधानता जैसी चीजें शामिल रहीं. रॉय के निधन के साथ ही पश्चिम बंगाल के राजनीतिक रंगमंच ने पर्दे के पीछे के उस दक्ष निर्देशक को खो दिया जो सत्ता में मंच से अधिक पर्दे के पीछे सक्रिय रहा और बदलावों की पटकथा को वहीं से अंजाम देकर चुपचाप बाहर निकल गया.

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By BIJAY KUMAR

BIJAY KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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