कोलकाता.
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता व पार्टी के प्रदेश महासचिव मोहम्मद सलीम ने मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाये जाने की घटना का बचाव करते हुए कहा कि जब अन्याय ही कानून बन जाये, तो प्रतिरोध ही एकमात्र रास्ता रह जाता है. मोहम्मद सलीम ने इस घटना को ‘जनता की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने में केंद्र और राज्य, दोनों के ही विफल रहने व त्रुटिहीन मतदाता सूची के प्रकाशन का परिणाम’ बताया. उन्होंने कहा कि जब लोगों की नागरिकता और मतदान के अधिकार छीने जाते हैं, तो ऐसे आंदोलन होना तय है. निर्वाचन आयोग जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन कर रहा है. जब आपराधिक मानसिकता के लोग विधायक बनते हैं, तो वे कानून बनाकर उभरते मुद्दों का समाधान करने में विफल रहते हैं और कार्यपालिका व नौकरशाही की शक्ति बढ़ा देते हैं. इसलिए अब यह लड़ाई जनता बनाम कार्यपालिका बन गयी है. उन्होंने कहा कि जब बीडीओ से लेकर सीइओ और निर्वाचन आयोग तक के अधिकारी न्याय देने में विफल रहते हैं, तो प्रशासन का चरित्र पुलिस राज्य जैसा हो जाता है. वे लोकतांत्रिक रास्ते से भटक कर कठोर दमनात्मक कदम उठाने लगते हैं. बदलते राजनीतिक परिदृश्य को समझने के लिए कबीर से मुलाकात की थी : हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) के साथ माकपा की संक्षिप्त वार्ता को लेकर उठे सवालों के बीच माकपा ने स्पष्ट किया है कि यह कवायद केवल राज्य के बदलते राजनीतिक परिदृश्य को समझने और व्यापक विपक्षी एकता की संभावनाएं तलाशने के लिए की गयी थी.मोहम्मद सलीम ने कहा कि हालांकि हर तरह की सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ माकपा के रुख स्पष्ट करने और चर्चा में आगे बढ़ने के लिए शर्त रखने के बाद कबीर की पार्टी के साथ सीट-बंटवारे पर बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी.
