भवानीपुर चुनाव 2026: ममता बनर्जी vs शुभेंदु अधिकारी, क्या बचेगा दीदी का सबसे मजबूत किला?

Bhowanipore Assembly Seat 2026: पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में भवानीपुर सीट सबसे बड़ा युद्धक्षेत्र बन गयी है. ममता बनर्जी के गढ़ में शुभेंदु अधिकारी की एंट्री और मतदाता सूची से 47,000 नामों के हटने ने मुकाबले को रोमांचक बना दिया है. जानें भवानीपुर का इतिहास और 2026 के नये समीकरण.

Bhowanipore Assembly Seat 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति के लगातार बदलते परिदृश्य में भवानीपुर विधानसभा जैसी कुछ ही सीटें हैं, जिनके साथ इतिहास और प्रतीकात्मक महत्व इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है. यह केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि वह राजनीतिक सफर है, जो राज्य में कांग्रेस के लंबे प्रभुत्व से लेकर तृणमूल कांग्रेस के उभार तक के बदलाव को साफ तौर पर दर्शाता है.

प्रभावशाली नेताओं का आधार रही भवानीपुर विधानसभा सीट

आज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ मानी जाने वाली भवानीपुर सीट हमेशा से तृणमूल कांग्रेस की पहचान नहीं रही. आजादी के बाद दशकों तक दक्षिण कोलकाता की यह सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी और राज्य के कई प्रभावशाली नेताओं का राजनीतिक आधार रही.

भवानीपुर का सामाजिक गणित : क्यों है यह ‘मिनी इंडिया’?

दक्षिण कोलकाता की यह सीट अपनी बहुसांस्कृतिक पहचान के लिए जानी जाती है. यहां की आबादी का मिश्रण ही इसे राजनीतिक रूप से रोचक बनाता है.

  • बंगाली हिंदू : लगभग 42 प्रतिशत
  • गैर-बंगाली (हिंदी भाषी/व्यापारी वर्ग) : 34 प्रतिशत
  • मुस्लिम मतदाता : करीब 24 प्रतिशत
  • कोलकाता का प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का निवास इसी क्षेत्र में है. इससे इस सीट का महत्व और बढ़ जाता है.

पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे भवानीपुर से जीते

पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में और बाद में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीता. कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं जैसे मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, जिससे भवानीपुर कांग्रेस का प्रमुख शहरी गढ़ बन गया.

कुछ दिनों के लिए वामदलों के कब्जे में रही भवानीपुर

कई वर्षों तक यह सीट कांग्रेस के प्रभाव में रही, जबकि वामपंथी दल उस समय केवल 1969 में थोड़े समय के लिए यहां जीत हासिल कर सके, जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट विधानसभा क्षेत्र कर दिया गया था. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता साधन गुप्ता ने बांग्ला कांग्रेस और माकपा की संयुक्त मोर्चा की दूसरी सरकार के दौरान यह सीट जीती. वह 1953 में भारत के पहले दृष्टिहीन सांसद बने थे.

बंगाल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

1972 में नक्शे से गायब हो गयी भवानीपुर सीट

भवानीपुर की राजनीतिक यात्रा ने तब अप्रत्याशित मोड़ ले लिया, जब यह सीट 1972 में परिसीमन के बाद चुनावी नक्शे से ही गायब हो गयी. लगभग 4 दशकों तक यह सीट केवल राजनीतिक स्मृतियों में ही बनी रही. वर्ष 2011 के परिसीमन के दौरान यह सीट दोबारा अस्तित्व में आयी, तब पश्चिम बंगाल की राजनीति भी बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही थी. उसी वर्ष वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत हुआ और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी का दौर शुरू हुआ.

2011 में सुब्रत बक्शी ने जीती सीट

नये सिरे से बनी भवानीपुर सीट जल्द ही तृणमूल के उभार से जुड़ गयी. ममता बनर्जी ने 2011 के पहले चुनाव में अपने करीबी सहयोगी सुब्रत बक्शी को इस सीट से उम्मीदवार बनाया. बक्शी ने 64 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करके माकपा के नारायण जैन को करीब 50,000 वोट से हराया और भवानीपुर को तृणमूल का मजबूत गढ़ बना दिया.

इसे भी पढ़ें : बंगाल चुनाव 2026: 63 लाख वोटर गायब और ‘अस्मिता’ की जंग, ममता बनर्जी बचा पायेंगी अपना किला?

भवानीपुर से उपचुनाव लड़कर पहली बार सीएम बनीं ममता

बाद में सुब्रत बक्शी ने सीट छोड़ दी, ताकि तृणमूल की भारी जीत के बाद मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी उपचुनाव के जरिये विधानसभा में प्रवेश कर सकें. ममता बनर्जी ने करीब 77 प्रतिशत वोट हासिल कर माकपा की नंदिनी मुखर्जी को 54,000 से अधिक मतों से हराया और भवानीपुर में अपना मजबूत राजनीतिक आधार स्थापित किया. तब से यह सीट तृणमूल के कब्जे में बनी हुई है.

कई-हाई प्रोफाइल मुकाबले हुए, लेकिन नतीजा नहीं बदला

कोलकाता के महापौर और पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री फिरहाद हकीम कहते हैं कि भवानीपुर हमारे लिए सिर्फ एक सीट नहीं है. यह वह जगह है, जहां लोगों ने ममता बनर्जी की विकास और समावेश की राजनीति पर बार-बार भरोसा जताया है. वर्षों से भवानीपुर में कई हाई-प्रोफाइल मुकाबले हुए, लेकिन नतीजा नहीं बदला.

इसे भी पढ़ें : बंगाल चुनाव 2026: भितरघात और SIR का घातक कॉकटेल, 120 सीटों पर बिगड़ सकता है दिग्गजों का खेल!

2016 में ममता बनर्जी ने दीपा दासमुंशी को हराया

वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में वाम दलों और कांग्रेस ने गठबंधन कर वरिष्ठ कांग्रेस नेता दीपा दासमुंशी को ममता बनर्जी के खिलाफ उतारा. इस मुकाबले को ‘दीदी बनाम बौदी’ के रूप में पेश किया गया. ममता दीदी ने 65,520 वोट हासिल कर दीपा दासमुंशी को आसानी से हरा दिया. दीपा को 40,219 वोट मिले. भाजपा के चंद्र कुमार बोस तीसरे स्थान पर रहे, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार से ताल्लुक रखते हैं.

2021 में फिर भवानीपुर से उपचुनाव जीतकर बनीं सीएम

पांच साल बाद 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जहां उनका मुकाबला उनके पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी से हुआ. भवानीपुर से तृणमूल ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया. भाजपा ने यहां से अभिनेता रुद्रनील घोष को टिकट दया. घोष को 44,786 वोट मिले, जो इस सीट पर किसी विपक्षी उम्मीदवार को अब तक मिले सबसे ज्यादा वोट थे. फिर भी वह 28,000 से अधिक वोटों से हार गये.

इसे भी पढ़ें : बंगाल 2026 चुनाव से पहले Video वायरल, EVM बटन पर ‘इत्र’ का तानाशाही मॉडल?

ममता बनर्जी के लिए शोभनदेव ने खाली की थी सीट

उसी वर्ष यह सीट और अधिक महत्वपूर्ण हो गयी. नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी से 1,956 वोटों से हारने के बाद पश्चिम बंगाल की चीफ मिनिस्टर ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उपचुनाव जीतना जरूरी था. एक बार फिर भवानीपुर केंद्र में आया. शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने सीट खाली की और टीएमसी सुप्रीमो ने भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल के खिलाफ उपचुनाव लड़ा.

2021 के चुनाव में ममता बनर्जी को मिले 72 प्रतिशत मत

ममता बनर्जी ने 58,000 से अधिक वोटों के अंतर से प्रियंका टिबरेवाल को पराजित किया. टीएमसी सुप्रीमो को लगभग 72 प्रतिशत मत मिले. इसके साथ ही भवानीपुर उनकी सबसे भरोसेमंद सीट के रूप में स्थापित हो गयी.

इसे भी पढ़ें : बंगाल चुनाव 2026: एसआईआर में गायब हो गयीं 33 लाख महिला वोटर, क्या होगा असर?

भवानीपुर विधानसभा सीट का प्रोफाइल

भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र मुख्यतः कोलकाता नगर निगम के वार्डों से बना है, जो दक्षिण कोलकाता की सामाजिक विविधता को दर्शाता है. यहां बंगाली मध्यमवर्गीय इलाकों के साथ बड़ी संख्या में हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय भी रहता है. इस क्षेत्र में प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर भी है, जो कोलकाता के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. यहीं ममता बनर्जी का निवास भी है.

हाई-प्रोफाइल सीट की डेमोग्राफी

इस क्षेत्र में लगभग 42 प्रतिशत मतदाता बंगाली हिंदू, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और करीब 24 प्रतिशत मुस्लिम हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सामाजिक मिश्रण ममता बनर्जी की शहरी जनवादी राजनीति के अनुकूल रहा है. राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा- भवानीपुर दक्षिण कोलकाता की बहुसांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है. ममता बनर्जी ने यहां समुदायों से परे एक व्यक्तिगत जुड़ाव बनाया है.

इसे भी पढ़ें : ममता बनर्जी की 10 ‘महा-प्रतिज्ञाएं’: लक्ष्मी भंडार की राशि बढ़ी, बेरोजगारों को भत्ता, जानें दीदी के पिटारे से और क्या निकला

फिर राजनीति के केंद्र में आया भवानीपुर

जैसे-जैसे 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, भवानीपुर एक बार फिर राजनीति के केंद्र में है. ममता बनर्जी इसी सीट से चुनाव लड़ रहीं हैं. भाजपा ने उनके खिलाफ नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है, जिन्होंने वर्ष 2021 के बंगाल चुनाव में नंदीग्राम विधानसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता को हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया था.

मनोवैज्ञानिक युद्ध का मैदान – राजनीतिक विश्लेषक

ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के इस मुकाबले ने इस सीट की राजनीतिक कहानी में एक नया नाटकीय मोड़ जोड़ दिया है. विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि भवानीपुर में ममता बनर्जी को चुनौती देकर भाजपा इस सीट को मनोवैज्ञानिक युद्ध का मैदान बनाना चाहती है.

SIR ने भी तेज की राजनीतिक बहस

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने भी इस सीट को लेकर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है. भवानीपुर में मतदाता सूची से 47,000 से अधिक नाम हटाये गये हैं, जबकि 14,000 से अधिक मतदाता कानूनी पचड़े में फंसे हैं. भाजपा नेता सुकांत मजूमदार कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में समय बदल चुका है. जो सीटें कभी अजेय मानी जाती थीं, वे अब चुनौती का सामना कर रही हैं और भवानीपुर भी इसका अपवाद नहीं होगा.

इसे भी पढ़ें : बंगाल चुनाव 2026: कल्याणकारी योजनाएं बनाम सत्ता-विरोधी लहर, ममता बनर्जी के 15 साल के शासन की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा

भवानीपुर में 29 अप्रैल को दूसरे चरण में होगी वोटिंग

निकटवर्ती चुनावी मुकाबले से परे भवानीपुर अब राज्य की सबसे प्रतीकात्मक राजनीतिक लड़ाई के केंद्र में है. दांव पर ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी दोनों की साख है. कौन जीतेगा, कौन हारेगा, इसका फैसला 4 मई को होगा, क्योंकि 23 और 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में 2 चरणों में वोटिंग के बाद उसी दिन मतगणना होगा. भवानीपुर विधानसभा सीट पर 29 अप्रैल को मतदान होगा.

ममता बनर्जी बनाम भाजपा

चुनावविजेताप्रतिद्वंद्वीअंतर
नंदीग्राम 2021शुभेंदु अधिकारीममता बनर्जी1,956
भवानीपुर उपचुनाव 2021ममता बनर्जीप्रियंका टिबरेवाल58,835
भवानीपुर 2026??सीधी जंग

चुनाव कार्यक्रम

अधिसूचना जारी करने की तारीख02.04.2026
नामांकन की अंतिम तारीख09.04.2026
नामांकन पत्रों की जांच की तारीख10.04.2026
नाम वापस लेने की आखिरी तारीख13.04.2026
वोटिंग की तारीख29.04.2026
काउंटिंग की तारीख04.05.2026
चुनाव की प्रक्रिया हो जायेगी पूरी06.05.2026

इसे भी पढ़ें

बंगाल चुनाव 2026: भवानीपुर समेत 142 विधानसभा सीटों पर 29 अप्रैल को दूसरे चरण में होगी वोटिंग

बंगाल चुनाव 2026: चुनाव आयोग ने जारी किया पूरा शेड्यूल, देखें आपकी विधानसभा सीट पर कब होगा मतदान

विधानसभा चुनाव 2026: बंगाल की इन 294 सीटों पर होगी वोटिंग, एक-एक सीट का नाम यहां देखें

बंगाल चुनाव 2026 का ऐलान : जानिए कब पड़ेगा वोट और किस दिन आएगा रिजल्ट

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 30 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >