मुख्य बातें
Bengal Election Result: कोलकाता. किसी चुनाव में जीतने और हारने से ज्यादा चर्चा उसकी होती है जिसके वोट के कारण जीत हार का फैसला प्रभावित होता है. ऐसे लोगों को चुनाव में वोट कटबा कहते हैं. पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस या माकपा के मुकाबले नोटा ने अधिक सीटों पर फैसले को प्रभावित किया है. बंगाल चुनाव के आंकड़ों बताते हैं कि यहां असली बाजीगर कोई नेता नहीं बल्कि नोटा बन गया है.
ईवीएम का वो आखिरी बटन
ईवीएम का वो आखिरी बटन जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, उसने इस बार बंगाल की कई सीटों पर ऐसा खेल किया है कि हारने वाले उम्मीदवार अपना सिर पकड़ कर बैठे होंगे. मामला बड़ा दिलचस्प है और थोड़ा पेचीदा भी. लोकतंत्र में जनता जनार्दन होती है, लेकिन जब जनता का एक हिस्सा हाथ जोड़कर कह दे कि साहब, हमें आपमें से कोई पसंद नहीं, तो समझ लीजिए कि हार-जीत का सारा गणित बिगड़ने वाला है. बंगाल की चार सीटों सतगछिया, जंगीपाड़ा, इंदस और रैना विधान सभा सीट पर जो कुछ भी घटा है, वो किसी सस्पेंस वाली फिल्मी कहानी से कम नहीं है.
पश्चिम बंगाल की अन्य महत्वपूर्ण खबरों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया
पश्चिम बंगाल के इन सीटों पर जीत का सेहरा किसी और के सिर बंध सकता था, लेकिन जनता की एक खामोश नाराजगी ने पूरी बाजी ही उलट दी है. आसान भाषा में कहें तो इन सीटों पर नोटा ने वो काम कर दिया जो विपक्षी पार्टियां नहीं कर पाईं. यहां हार-जीत का अंतर इतना बारीक है कि अगर नोटा दबाने वाले चंद मतदाता भी किसी एक तरफ झुक जाते, तो इन विधानसभाओं के चेहरे कुछ और ही होते. अब आंकड़ों के इस खेला को समझिए कि कैसे इन चार सीटों पर नोटा ने नेताओं की पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया है.
गुस्साये वोटरों ने नोटा दबाया
सतगछिया विधान सभा सीट से बीजेपी के अग्निस्वर नस्कर ने टीएमसी की सोमश्री बेताल को हरा तो दिया, लेकिन जीत का अंतर सिर्फ 401 वोट है. इसी सीट पर 1654 लोगों ने नोटा का बटन दबाया है. यानी जीत के अंतर से चार गुना ज्यादा लोगों ने कह दिया कि हमें कोई पसंद नहीं. अगर इन 1600 लोगों में से मामूली वोट भी सोमश्री की तरफ चले जाते, तो आज पासा पलट चुका होता. यही कहानी जंगीपाड़ा सीट पर भी नजर आती है, जहां बीजेपी के प्रसेनजित बाग ने टीएमसी के स्नेहाशीष चक्रवर्ती को 862 वोटों के मामूली अंतर से मात तो दे दी, लेकिन यहां 2388 लोगों ने नोटा का बटन दबाया है.
जीत के कम अंतर ने ज्यादा दे दी टीस
जहां हार-जीत का फैसला 1000 वोटों से भी कम पर टिका हो और वहां रिजेक्शन वाले वोट ढाई हजार के करीब पहुंच जाएं, तो उसे वोट कटबा कहा जाता है. इंदस और रैना विधान सभा सीट का किस्सा भी कुछ ऐसा ही रहा, जहां चुनावी गणित ने सबको चौंका दिया. धनखली में बीजेपी के निर्मल कुमार ने महज 900 वोटों से जीत तो दर्ज की, लेकिन वहां 1582 लोगों ने किसी को भी अपना प्रतिनिधि नहीं माना. वहीं पुरसुराह की बात करें तो यहां बीजेपी के सुभाष पात्रा ने 834 वोटों से बाजी तो मार ली, लेकिन यहां भी 1442 लोगों ने नोटा का ही बटन दबाना बेहतर समझा.
Also Read: बंगाल चुनाव: मुर्शिदाबाद ने कांग्रेस और वामपंथ की बचाई लाज, हुमायूं-नौशाद की भी बच गयी साख
