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तृणमूल के नये स्लोगन से तेज हुई ‘भीतरी बनाम बाहरी’ की लड़ाई, जानें क्यों ‘बंगाल को चाहिए अपनी बेटी’

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
तृणमूल कांग्रेस के नये स्लोगन से फिर तेज होगी भीतरी-बाहरी की जंग.
तृणमूल कांग्रेस के नये स्लोगन से फिर तेज होगी भीतरी-बाहरी की जंग.
Prabhat Khabar

कोलकाता : तृणमूल कांग्रेस के नये स्लोगन ने विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल में एक बार फिर ‘भीतरी बनाम बाहरी’ की लड़ाई को हवा दे दी है. राज्य में 10 साल से शासन कर रही तृणमूल ने चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ‘बंगाल की बेटी’ करार देते हुए ‘बांग्ला निजेर मेये केई चाय’ (बंगाल को चाहिए अपनी बेटी) का नारा दिया.

इस नारे के साथ ममता बनर्जी की फोटो वाले होर्डिंग समूचे कोलकाता में लगाये गये हैं, जिस पर बांग्ला भाषा में ‘बांग्ला निजेर मेयकेई चाई’ लिखा है. सरकार चला रही पार्टी ने ईएम बाईपास के पास स्थित अपने मुख्यालय से आधिकारिक रूप से इसकी शुरुआत की.

तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पार्थ चटर्जी ने कहा, ‘राज्य के लोग अपनी बेटी को चाहते हैं, जो पिछले कई साल से मुख्यमंत्री के रूप में उनकी सेवा कर रही हैं. हम बंगाल में किसी बाहरी को नहीं लाना चाहते.’ तृणमूल के लोग भाजपा नेताओं को बाहरी कहते हैं. उनका कहना है कि ये बाहरी नेता राज्य में ‘चुनावी सैर सपाटे’ के लिए आये हैं.

टीएमसी के राज्यसभा सदस्य सुब्रत बख्शी ने कहा, ‘आगामी चुनाव तृणमूल कांग्रेस के लिए कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है. पूरा देश देख रहा है कि कैसे संविधान की रक्षा की जा सकती है और चुनाव के नतीजे इसको साबित कर देंगे.’

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के लोगों को पिछले 10 वर्षों में किये गये कार्यों का रिपोर्ट कार्ड पहले ही सौंप दिया है. बख्शी ने कहा, ‘किस राज्य ने इतना किया है? किसी ने नहीं.’

बंगाल की नब्ज को जानती हैं ममता बनर्जी

राज्य के पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने कहा कि जहां अन्य दल मुख्यमंत्री का चेहरा खोजने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी हैं, जो बंगाल के लोगों की नब्ज को जानती हैं. श्री मुखर्जी ने कहा कि वह महिलाओं की सुरक्षा करना जानती हैं.

उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी का ग्रामीण बंगाल से आत्मीय संबंध है और उन्होंने गांवों में 34 लाख घर बनाये, जबकि 96 लाख घरों को बिजली उपलब्ध कराया. सुब्रत मुखर्जी ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में कुल 1.18 लाख किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण हुआ.

Posted By : Mithilesh Jha

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