कोलकाता फुटपाथ: बिहार, झारखंड व यूपी के लाखों लोग आपको नजर आयेंगे यहां, क्या करें पापी पेट का सवाल

By Prabhat Khabar Digital Desk
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भारती जैनानी

कोलकाता : भारत की बौद्धिक राजधानी माना जानेवाला कोलकाता हर मायने में अलग है. सिटी ऑफ जॉय के नाम से मशहूर कोलकाता को कल्चरल कैपिटल ऑफ इंडिया भी कहा जाता है. इस शहर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां गरीब से गरीब व्यक्ति का भी गुजारा चल जाता है. यही कारण है कि बिहार, झारखंड व उत्तर प्रदेश के लाखों लोग यहां आकर जम गये हैं. ये लोग हॉकरी करके ही अपना गुजारा कर रहे हैं. फुटपाथों पर हॉकरी करने वाले हजारों लोग ऐसे हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम कर रहे हैं. हालांकि शहर के हर फुटपाथ पर कब्जा करनेवाले इन हॉकरों के पास कोई वैध लाइसेंस नहीं है लेकिन आम लोगों की जरूरतों को पूरा करने व सस्ता सामान मुहैया कराने के लिए ये हॉकर ही एकमात्र विकल्प हैं.
ये हॉकर स्वीकार करते हैं कि वे सरकारी जमीन पर बैठे हैं लेकिन क्या करें, पापी पेट का सवाल है. ये फुटपाथ ही हमारी रोजी-रोटी व परिवार का सहारा हैं. जानते हैं, कई बड़ी दुकानों के आसपास फुटपाथों पर कब्जा करनेवाले इन हॉकरों की कहानी. यहां हमने डलहौजी के आर एन मुखर्जी रोड पर बैठे कई हॉकरों से बातचीत की.

क्या कहते हैं फुटपाथ के दुकानदार
फुटपाथ पर 1956 से कारोबार कर रहे हैं. अभी तक कोई लाइसेंस या यूनियन का कार्ड नहीं बनवाये हैं, न ही यहां बैठने के लिए किसी को पैसा देते हैं. अपना खटते हैं, कारोबार चलाते हैं. रसोई का, घर का, सिलाई का हर सामान यहां से सस्ते में लोग खरीद कर ले जाते हैं. वैसे बिहार के हैं लेकिन अभी पूरा परिवार यहीं बस गया है. इसी फुटपाथ की दुकान से ही गुजारा चल रहा है.
शमशेर आलम (उम्र 62 साल)
20 साल से यहां कारोबार कर रहे हैं. पहले समाचार पत्र बेचने का काम करते थे. पश्चिम बंग संवाद पत्र विक्रेता समिति के कैशियर के रूप में पहले काम करता था. बाद में यहां पर अंडरगारमेंट्स का कारोबार शुरू किया. लाइसेंस देने की बात थी लेकिन अभी तक नहीं दिया गया है. पहले सीपीएम की यूनियन का हॉकर कार्ड बना फिर टीएमसी का. अब लगता है कि भाजपा यूनियन में कन्वर्ट होना पड़ेगा. हॉकर क्या करेगा, उसको तो सरवाइव करना है.
रतन कुमार गुप्ता
लगभग 20 साल से फुटपाथ पर फल बेचने का काम कर रहा हू. क्या करेंगे, कोई बड़ी पूंजी तो है नहीं, हम लोगों के पास. जब पुलिस डंडा मार कर उठाती है, तो भागना पड़ता है, नहीं तो कारोबार चल ही रहा है. फुटपाथ पर फल समेत कई अन्य सामान भी सस्ते मिलते हैं, तो लोग खरीदते हैं. अपना गुजारा हो जाता है. पहले स्थानीय थाने के पुलिसवाले आकर प्रत्येक हॉकर से 2-2 रुपये प्रतिदिन चंदा लेते थे. अभी सप्ताह के हिसाब से या यूनियन में कुछ देना पड़ता है.
सुरेश साव
फुटपाथ पर पहले कंघी बेचते थे, अब कई तरह के पेन बेच कर गुजारा कर रहे हैं. यहां बैठे 40 साल हो गये हैं. निगम की ओर से एक कागज बना हुआ है. जब सेंटर से कोई ऑर्डर आयेगा तो हटना ही पड़ेगा. अभी तो यह फुटपाथ ही अपना सहारा है. यूनियन का कार्ड पहले चला था, अभी नहीं है. जब वोट होता है तो हॉकरों की पूछ होती है, लेकिन जब पुलिस खदेड़ती है तो कोई बचाने नहीं आता है.
मोहम्मद इस्माइल
यहां 30-35 साल से मुड़ी की दुकान चला रहे हैं. इसी से हमारा परिवार चलता है. अभी कोई लाइसेंस नहीं बनवाया है. कुछ साल पहले यूनियन का एक कार्ड बनवाये थे लेकिन सरकार बदलने के बाद अब वह भी नहीं है. रहनेवाले तो बनारस के हैं लेकिन अब यहीं खट कर खाते-कमाते हैं. जिस दिन सरकार हटायेगी तो देखा जायेगा, फिलहाल तो रोजगार कर रहे हैं.
भगवान सिंह (झालमुड़ी की दुकान)
डलहौजी में 22 साल से कपड़े व अंडरगारमेंट्स बेचने का काम कर रहे हैं. जमीन तो सरकारी है, कभी भी खदेड़ा जा सकता है, क्योंकि लाइसेंस नहीं है. जब तक गुजारा चल रहा है, राम भरोसे बैठे हैं. टीएमसी का यूनियन कार्ड बना हुआ है, वही हॉकरों का लाइसेंस है.
तारकनाथ
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