सिलीगुड़ी : मेडिकल छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत हैं डॉ युवराज सिंह चौधरी, जानें इन्‍हें

By Prabhat Khabar Digital Desk
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सिलीगुड़ी का युवा अमेरिका की न्यू जर्सी में चीफ रेजीडेंट, हाईस्कूल के दौरान ही मेडिकल शिक्षा की ओर हुआ रुझान
सिलीगुड़ी : सिलीगुड़ी के एक युवा डॉ युवराज सिंह चौधरी ने अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा के बूते ऐसी शानदार सफलता हासिल की है, जो सभी के लिए प्रेरणादायी है. वह 2016 में न्यू जर्सी, अमेरिका के इंटर्नल मेडिसिन रेजीडेंसी प्रोग्राम के लिए चुने गये और अभी वहां चीफ रेजीडेंट हैं. इस प्रोग्राम के चुना जाना कितना मुश्किल है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हर साल दुनियाभर से 35 हजार से अधिक मेडिकल छात्र व ग्रेजुएट अमेरिकी रेजीडेंसी प्रोग्राम के लिए आवेदन करते हैं. 2018 में इनमें से केवल 3490 को सफलता मिली.
डॉ चौधरी की कहानी दृढ़ निश्चय और लगन की एक मिसाल है. निवेदिता लेन, प्रधान नगर के निवासी आरपीएस चौधरी और सुखदीप चौधरी के बेटे युवराज सिंह चौधरी ने सिलीगुड़ी के डॉन बॉस्को स्कूल से स्कूली शिक्षा ग्रहण की. स्कूल से लौटने के बाद मार्ग्रेट स्कूल के मैदान में क्रिकेट खेलने को वह अब भी भूल नहीं पाये हैं.
जिस समय वह हाई स्कूल में थे तभी एक ऐसी घटना घटी कि उनका रुझान मेडिकल की पढ़ाई की ओर हो गया. उनके पिता को हृदय संबंधी कुछ समस्या हो गयी थी. उस दौरान परिवार ने विभिन्न कार्डियोलॉजिस्ट के चक्कर काटे. किसी ने स्टेंट का सुझाव दिया, तो किसी ने बाइपास सर्जरी को एकमात्र इलाज बताया. भ्रम की इस स्थिति के कारण पूरा परिवार काफी असमंजस में रहा. युवराज पर इस घटना ने गहरा असर डाला और कार्डियोलॉजी उनका जिज्ञासा का केंद्र बन गया.
जब वह हाईस्कूल में तभी एक और घटना घटी. 2006 में युवराज एक मोटरसाइकिल हादसे का शिकार हो गये. उनकी बांह में कई फ्रैक्चर हो गये.
कई महीनों तक उन्हें तकलीफ से गुजरना पड़ा, पर उन्हें एक नयी रोशनी भी डॉक्टरों ने ही दिखायी. जब वह ठीक हुए तो 10वीं की बोर्ड परीक्षा में चार महीने ही रह गये थे. इसके बावजूद उन्हें बेहतरीन नंबरों से परीक्षा पास की. इस घटना ने भी उन्हें मेडिकल की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया.
10वीं के बाद उन्होंने पढ़ाई के लिए देश की राजधानी नयी दिल्ली जाने का फैसला किया. परिवार की छांव और आरामदेह जिंदगी से निकलकर दिल्ली में रहना कठिन था, पर उन्होंने यह किया. दिल्ली में पढ़ाई के दौरान उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई के लिए इरादा पक्का कर लिया था. अपनी कठिन मेहनत की बदौलत उन्होंने 12वीं की बोर्ड परीक्षा में जीवविज्ञान में 100 प्रतिशत अंक हासिल किये. इसके लिए उन्हें अपने पंसदीदा व्यक्तित्व तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपेजी अब्दुल कलाम के हाथों बॉयोटेक्नोलॉजी छात्रवृत्ति प्रदान की गयी.मेडिकल की पढ़ाई के लिए वह पुणे गये, जहां एनाटॉमी और फिजियोलॉजी ने उन्हें बांध लिया.
मेडिकल कॉलेज से डॉक्टर बन कर निकले युवराज दिल्ली लौटे और एशिया के व्यस्ततम अस्पतालों में से एक, सफदरजंग अस्पताल में काम शुरू किया. इसने उनके चिकित्सकीय कौशल को और निखारा. अमेरिकी मेडिकल प्रणाली में चिकत्सकीय अनुभव हासिल करने उन्होंने दुनिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित अस्पतालों में से एक, मैसाच्युसेट्स जेनरल हॉस्पिटल व हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में सब-इंटर्नशिप स्वीकार की. सब-इंटर्नशिप के दौरान ही उन्हें एहसास हुआ कि उन्हें फिर से अमेरिका आकर रेजीडेंसी ट्रेनिंग लेनी चाहिए.
अमेरिका में सब-इंटर्नशिप पूरी होने के बाद वह भारत लौटे और यूएसएमएलई परीक्षा की जोरदार तैयारी शुरू की. तीन परीक्षाओं को पूरा करने में उन्हें एक साल का समय लगा. युवराज कहते हैं, ‘मेरा दोस्त जिंदगी में आगे बढ़ रहे थे, नौकरियां पा रहे थे, गाड़ियां खरीद रहे थे, शादी कर रहे थे, जबकि मैं अभी प्रक्रिया में ही चल रहा था.’ इसे लेकर वह बेचैन रहते थे.
लेकिन अपनी बेचैनी को उन्होंने एक सकारात्मक काम में लगाया. वह अपनी शारीरिक फिटनेस ठीक करने में जुट गये. नतीजा यह हुआ कि वह अपने 103 किलो वजन को 87 किलो तक लाने में सफल हुए.
आखिरकार साल 2016 डॉ युवराज सिंह चौधरी के लिए सुसमाचार लेकर आया. एक दिन उन्होंने मेल खोला तो देखा कि वह एक इंटर्नल मेडिसिन रेजीडेंसी प्रोग्राम के लिए चुन लिये गये हैं. इसके बाद वह फिर अमेरिका पहुंच गये. दो साल तेजी से बीते और वह अभी इस प्रोग्राम में चीफ रेजीडेंट हैं. जो मेडिकल शिक्षा में रुचि रखते हैं, उनके लिए यह किसी बड़े सपने के साकार होने से कम नहीं.
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