बस्ती के पास ही है 2,50,000 गैलन क्षमता का ओवरहेड जलाशय, फिर भी परेशान है हजारों की आबादी !
कालाझरिया प्रोजेक्ट से मिलता था पानी, पर पिछले बरसात में पाइपलाइन ध्वस्त होने के चलते पैदा हुआ जलसंकट आंदोलनकारियों की बस्ती से 200 मीटर दूर शंकरपुर हेड वर्क्स साइट से ही पानी देने की रखी है मांग काफी मान-मनौव्वल और आश्वासन के बाद नरम पड़ीं महिलाएं, खुला वाटर प्रोजेक्ट के गेट पर लगा तालाआसनसोल/पांडवेश्वर. पांडवेश्वर प्रखंड की छोरा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले डायमंड और भुइयांपाड़ा में जल संकट से परेशान महिलाओं ने आंदोलन पर उतरने का फैसला लिया. सोमवार सुबह छह बजे ही वे सड़क पर उतर पड़ीं. इसी क्रम में आंदोलनकारी महिलाओ का जत्था ढाई लाख गैलन पानी की क्षमता वाले शंकरपुर हेड वाटर वर्क्स साइट (ओवरहेड जलाशय) तक पहुंचा और मुख्य द्वार पर ताला जड़ दिया. इनकी मांग थी कि इनके गांवों को भी शंकरपुर वर्क्स साइट से जोड़ कर पानी मुहैया कराया जाये. इस जल परियोजना केंद्र से लगभग 200 मीटर की ही दूरी पर इनकी बस्ती है. आंदोलनकारी महिलाओं के मुताबिक, इनकी बस्ती के पास ही इतना बड़ा जल परियोजना केंद्र होने के बावजूद इन्हें पानी का संकट है, जबकि यहां का पानी दूर-दूराज के गांवों तक भेजा जा रहा है.जल संकट पर भड़की महिलाओं के कड़े रुख और तालाबंदी जैसे इनके कदम के चलते बनबहाल, शीतलपुर, नबग्राम व शंकरपुर आदि इलाके में जलापूर्ति बाधित हो गयी. महिलाओं के गुस्साने और उनके आंदोलन पर उतरे होने की सूचना मिलते ही छोरा ग्राम पंचायत के प्रधान रामचरित पासवान, पीएचइडी के सहायक अभियंता देवप्रिय घोष आदि घटनास्थल पर पहुंचे और बातचीत शुरू की. इस दौरान आंदोलित महिलाओं ने कहा कि उन्हें जब तक पानी नहीं मिलेगा, वे ताला नहीं खोलेंगी. हालांकि काफी मान-मनौव्वल के बाद दोपहर 12 बजे के आसपास आंदोलित महिलाओं का रुख बदला और वाटर प्रोजेक्ट साइट पर लगा ताला खोला जा सका.
क्यों है डायमंड और भुइयांपाड़ा में पानी की कमी
दामोदर नदी के पास स्थित 10 मिलियन गैलन प्रतिदिन की क्षमता वाले पीएचइडी के कालाझरिया वाटर प्रोजेक्ट से डायमंड और भुइयांपाड़ा गांवों में पानी मिलता रहा है. पिछले साल बारिश के दौरान वाटर सप्लाई पाइप लाइन को संभालने वाले एक ब्रिज के टूट जाने से यह परियोजना बाधित हो गयी थी. तब से अभी तक यहां यहां की स्थिति बदली नहीं है. नतीजतन यह प्रोजेक्ट सामान्य रूप से नहीं चल रहा है.
इस वाटर प्रोजेक्ट के साथ ही खड़ी की गयी एक वैकल्पिक व्यवस्था के तहत फिलहाल 40 फीसदी पानी सप्लाई हो पा रहा है. करीब 70 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन से होकर उपरोक्त बस्तियों तक जो भी पानी पहुंच सकता है, उसका एक हिस्सा रास्ते में ही चोरी भी हो जाता है. इन कारणों से डायमंड और भुइयांपाड़ा की आबादी को काफी कम पानी मिल रहा है. जो मिल रहा है, वह भी समय नहीं मिलता. अधिकतर बार आधी रात के बाद मिलता है. आंदोलनकारियों के मुताबिक, कभी-कभार तो बिल्कुल नहीं.