महालया के दिन ही शुरू होती है पूजा और इसी दिन हो जाती है समाप्त

मां की प्रतिमा का विसर्जन एकादशी के दिन किया जाता है.

अनोखी परंपरा: धेनुआ गांव में पिछले 46 वर्षों से दुर्गापूजा को लेकर चली आ रही है अनूठी प्रथा

पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, संधि पूजा सारा कुछ एक ही दिन में पूरा करके कला बऊ और घट का हो जाता है विसर्जन, प्रतिमा का विसर्जन होता है एकादशी को हजारों की संख्या में लोग जुटते हैं इस पूजा को देखने के लिए, नर नारायण सेवा के साथ सामाजिक कार्यों का भी होता है आयोजन

आसनसोल. आसनसोल महकमा के हीरापुर थाना क्षेत्र अंतर्गत धेनुआ गांव कालीकृष्ण जोगा आश्रम में पिछले 46 वर्षों से एक अनोखी परंपरा चली आ रही है. यहां पितृपक्ष में महालया के दिन दुर्गापूजा (मां महामाया) शुरू होती है और इसी दिन ही समाप्त हो जाती है. पंचमी, षष्टी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी के साथ संधि पूजा, कला बऊ की स्थापना सारा कुछ एक ही दिन किया जाता है और पितृपक्ष में ही पूजा का समापन करके घट (कलश) व कला बऊ का विसर्जन कर दिया जाता है. मां की प्रतिमा का विसर्जन एकादशी के दिन किया जाता है. इस पूजा को देखने के लिए हजारों की संख्या में दूर-दूर से लोग आते हैं. नर नारायण सेवा के साथ विभिन्न प्रकार के सामाजिक कार्यों का आयोजन भी होता है. पश्चिम बंगाल में यह अपने किस्म का पहला दुर्गापूजा है. जो पितृपक्ष में महालया के दिन शुरू होकर, इसी दिन समाप्त हो जाता है.

गौरतलब है कि जब पूरे देश में महालया के दिन भोर से शारदीय दुर्गोत्सव की शुरुआत होती है, ठीक उसी दिन धेनुआ गांव में में पूजा शुरू होकर समाप्त भी हो जाती है. यहां मां का आगमन, पूजन और विदाई सारा कुछ महालया के दिन ही हो जाता है. पिछले 46 वर्षों से यह अनूठी परंपरा का निर्वाह स्थानीय ग्रामीण करते आ रहे हैं. रविवार को भी महालया के दिन यहां इसी प्रकार पूजा का आयोजन हुआ. सुबह कला बऊ लाकर पूजा मंडप में स्थापना की गयी और इसके साथ ही पूजा शुरू हो गयी. पंचमी, षष्टी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी के साथ अष्टमी की संधि पूजा भी पूरी कर ली गयी और कला बऊ के साथ घट को विसर्जन कर दिया गया.

यहां मां के असुर वध की मूर्ति नहीं होती है स्थापित

यहां मां की प्रतिमा एक अलग ही रूप में होती है. मां सिंहवाहिनी स्वरूप में होती हैं, लेकिन असुर वधिनी नहीं. उनके साथ केवल जया और विजय सखियां रहती हैं. पहले प्रतिमा अग्निवर्णा बनायी जाती थी, फिर श्वेतवर्णा और अब बसंती रंग की प्रतिमा स्थापित होती है. इस अनोखी पूजा को देखने दूर-दूर से लोग धेनुआ आते हैं. भक्तों का कहना है—“जब पूरे राज्य में महालया से पूजा का माहौल बनता है, धेनुआ में मां की विदाई हो जाती है. यही वजह है कि यहां पूजा देखने की खुशी और विदायी की कसक, दोनों एक साथ देखने को मिलती है.

सत्यानंद ब्रह्मचारी के सपने में मां ने दिया दर्शन जिसके बाद से यहां इस पद्धति से शुरू हुई पूजा

कालीकृष्ण आश्रम के सहायक सचिव उज्ज्वल बनर्जी ने बताया कि इस आश्रम की स्थापना वर्ष 1937 में हुई थी. साधक कालीकृष्ण सरस्वती ने इस आश्रम की स्थापना की और उन्हीं के नाम से इस आश्रम का नामकरण हुआ. उनके शिष्य सत्यानंद ब्रह्मचारी के सपने में मां ने दर्शन दिया और उसके बाद से ही वर्ष 1979 से ही यहां मां दुर्गा के कुंवारी रूप की पूजा शुरू हुई. यहां मां के साथ उनकी दो सखियां जया और विजया की मूर्ति स्थापित होती है और मां के साथ ही उनकी भी पूजा आराधना की जाती है. वर्ष 1979 से ही यहां पूजा की यही परंपरा चली आ रही है. संस्थापक सेवायत ज्योतिन महाराज के निधन के बाद से यह परंपरा ग्रामीणों और आश्रम समिति की देखरेख में चल रही है.

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Published by: Ganesh mahto

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