कोलकाता. राज्य स्वास्थ्य विभाग अब सरकारी अस्पतालों में जुड़े चिकित्सकों पर नकेल कसने जा रहा है. राज्य के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के खिलाफ चिकित्सीय लापरवाही के आरोप कहां और कैसे दर्ज किये जायेंगे? सरकारी चिकित्सकों के शिकायतों को दर्ज कराये जाने के लिए अब तक सरकारी तौर पर कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी और ना ही इसके बारे में कोई स्पष्ट दिशा निर्देश ही था, पर अब ऐसी शिकायतों को दर्ज करने के लिए गाइडलाइंस तैयार की जायेंगी. मालूम हो कि स्वास्थ्य और स्वास्थ्य शिक्षा समेत अन्य मुद्दों से संबंधित शिकायतें दर्ज कराये जाने की व्यवस्था की जायेगी. इस नयी व्यवस्था को तैयार किये जाने के लिए नौ सदस्यीय समिति का गठन किया गया है. कमेटी के सदस्यों ने शुक्रवार को पहली बैठक की. इस संबंध में एक स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया कि देश के कानून बदल गये हैं. आइपीसी, सीआरपीसी का स्थान भारतीय नागरिक प्रक्रिया संहिता, नागरिक सुरक्षा संहिता ने ले लिया है. ऐसे में समझ नहीं आ रहा कि सरकारी डॉक्टरों की लापरवाही की शिकायत कैसे दर्ज करायी जाये. दूसरे, नये कानून में चिकित्सीय लापरवाही या उससे होनेवाली मौत के मामले में सरकारी डॉक्टरों का मेडिको-लीगल जोखिम कहां है? किसी भी कानून के प्रावधान कितने सख्त हैं? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने चिकित्सा समुदाय को इस बारे में जागरूक करने के लिए अप्रैल में राज्य सरकार को पत्र भेजा था. राज्य के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक नये कानून में लापरवाही से मौत के मामले में सजा बढ़ा दी गयी है. इससे पहले, चिकित्सकीय लापरवाही के कारण मौत के आरोप में डॉक्टरों को भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 304ए के तहत गिरफ्तारी होती थी. नये भारतीय दंड संहिता में वह प्रावधान अनुच्छेद 106 में रखा गया है, लेकिन डॉक्टरों का मानना है कि इसके अच्छे और बुरे दोनों पहलू हैं, क्योंकि पुराने कानून में जहां लापरवाही को संज्ञेय अपराध के रूप में पहचाना जाता था, वहीं गैर-जमानती वारंट का प्रावधान था. नये अधिनियम ने इस धारा को जमानती बना दिया है. पुराने कानून में जहां तीन महीने से लेकर अधिकतम दो साल तक की सजा का प्रावधान था, वहीं नये कानून में इसे 2-5 साल तक कर दिया गया है. अनिवार्य जुर्माने के साथ. सरकारी डॉक्टरों के संगठन एसोसिएशन ऑफ हेल्थ सर्विस डॉक्टर्स के महासचिव मानस गुमटा ने कहा, ””इस नये कानून में डॉक्टरों की सजा व्यावहारिक रूप से बढ़ गयी है. इससे डॉक्टरों का गुस्सा और बढ़ेगा.” उन्होंने कहा- इलाज में लापरवाही या कोताही अलग-अलग तरह की होती है. पुराने कानून की विभिन्न धाराओं में इस पर विचार किया गया. लेकिन नये कानून में सारी लापरवाही एक ही व्यक्ति में मापी जाती है! एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने कहा, दुनिया भर में आधुनिक चिकित्सा के प्रसार इसके निरंतर अनुसंधान और विशाल तकनीकी प्रगति के कारण निदान और उपचार के तरीके हर समय बदल रहे हैं. विज्ञान यह निर्धारित करता है कि उपचार सही हुआ या गलत. बिना गहन विश्लेषण के यह कहना संभव नहीं है. कोई भी डॉक्टर नहीं चाहता कि कोई मरीज मरे.
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