कोलकाता: गांव में रहनेवाली गरीब घर की बच्चियां भी सपने देखती हैं, जो उम्र के साथ-साथ और भी बढ़ते जाते हैं. प्राय: सभी ग्रामीण लड़की में शहरी जिंदगी जीने की लालसा रहती ही है, जिसे वह साकार करना चाहती है. उनके इसी सपने को जिस्मफरोशी करनेवाले हथकंडा बनाते हैं. ये बचपन की दहलीज को पार करके किशोरावस्था में कदम रखनेवाली लड़कियों को अपना शिकार बनाते हैं. ये कम उम्र की लड़कियों को प्रलोभन देकर उनके सपनों को खरीद लेते हैं और शहर में जिस्म की मंडी में ले जाकर बेच देते हैं.
राजधानी दिल्ली की एक गंदी मंडी में ग्यारह महीने बिताने के बाद एक 13 वर्षीया मासूम चेतना वेलफेयर सोसाइटी नामक स्वयंसेवी संस्था की मदद से रिहा करायी गयी. दक्षिण 24 परगना के काकद्वीप के एक गांव से दिल्ली तक के उसके सफर की दास्तां मार्मिक है. वह बताती है : गांव में मेरा परिवार बेहद खुशहाली भरा था. मै अपने गांव के एक विद्यालय में सातवीं कक्षा में पढ़ रही थी. पिता रास्ते में घुम-घुम कर जूता चप्पल बेचा करते थे. जहां मेरा घर था उसी गांव में पड़ोस वाले घर में इलियास इलाही नामक एक व्यक्ति रहा करता था.
कई महीनों तक गायब रहता फिर अचानक महीनों बाद आ धमकता था. उसके रहने के तरीके और रुपये पैसे पर पूरे गांव वालों की नजर थी. कुछ दिनों से पिता से मिलने के बहाने उसका मेरे घर में आना जाना बढ़ गया था. मैं रोजाना जब भी स्कूल से घर लौटती वह मुझसे बात करने की कोशिश करता. एक दिन उसने मुझसे प्यार करने की बात कही. उसका उम्र ज्यादा होने के कारण मैंने उसकी बातों को मजाक समझा, लेकिन फिर अगले ही दिन इलियास ने मुझसे जवाब मांगा. उसकी फर्राटेदार बातें मुझें प्रभावित करने लगी थी, लेकिन किसी लिहाज से मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं भी उससे प्यार करने लगी हूं.
एक दिन मुङो चुपके से दिल्ली चलने का उसने प्रस्ताव दिया. उसने दिल्ली में शादी करके आलिशान घर में रहने और ऐश में रहने का प्रलोभन दिया. मैं तैयार हो गयी, और एक दिन उसके साथ दिल्ली पहुंच गयी. यहां इलियास ने मुङो 30 से 35 वर्षीय एक स्क्रैप व्यापारी से मेरा सौदा कर दिया. रोज रात को वह मेरे शरीर के साथ खिलवाड़ करता और अगले ही दिन सुबह होती ही मुङो खिलौने व तोहफे देता था. शुरुआत में मुङो समझ नहीं आया, लेकिन कुछ दिनों के बाद शरीर में तकलीफ होने के कारण मैं इसका विरोध करने लगी. मुङो यह तक पता नहीं था कि मेरे शरीर के साथ रोजाना वह करता क्या था. मेरे विरोध करने पर वह मुङो मारता पीटता और अगले ही पल मुङो प्यार भी करता. उसका साथ नहीं देने पर वह नशे की गोलियां खिला कर मार देने की धमकी देता. दहशत में मैं चीख भी नहीं पाती. अब रिहा होने के बाद पिताजी को क्या चेहरा दिखाउंगी, इसीलिए घर नहीं लौटना चाहती.
300 किशोरियां बन चुकी है शिकार : चेतना वेलफेयर सोसायटी के सुब्रत पानीग्राही कहते हैं : दक्षिण 24 परगना के सिर्फ काकद्वीप में अब तक तीन सौ से ज्यादा किशोरियों की तस्करी हो चुकी है. उनमें 95 प्रतिशत की उम्र 13 से 15 वर्ष के बीच है. किशोरियों को फंसाने के लिए तस्करों को ट्रेनिंग दी जाती है. वहीं शक्ति वाहिनी संस्था के सदस्य ऋषिकांत के मुताबिक कई इलाकों में तस्कर सक्रिय हैं.
