गन्ने से क्यों दूर हो रहे किसान? चीनी महंगी होने के पीछे यूपी के खेतों का बदलाव! मक्का-धान की ओर बढ़े कदम

UP News: उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती का रकबा लगातार घट रहा है, जिससे चीनी उत्पादन पर बड़ा असर पड़ा है. किसान मक्का और धान की फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिसके पीछे डिस्टिलरी उद्योग और बाजार की मांग का हाथ है. यह बदलाव चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण बन रहा है.

UP News: बाजार में चीनी के बढ़ते दाम के पीछे सिर्फ मांग और आपूर्ति का खेल नहीं है. उत्तर प्रदेश के खेतों में भी एक बड़ा बदलाव हो रहा है. जिस गन्ने पर देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्यों में से एक यूपी का चीनी उद्योग टिका है, उसी की खेती का रकबा लगातार घट रहा है. किसान अब मक्का और धान की ओर ज्यादा रुख कर रहे हैं. नतीजा यह है कि तीन साल में गन्ने का रकबा करीब चार फीसदी घटा और चीनी उत्पादन में करीब 14 फीसदी की गिरावट आ गई.

गन्ने से क्यों दूर हो रहे किसान?

उप्र चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023-24 में प्रदेश में गन्ने का रकबा 29.66 लाख हेक्टेयर था. वर्ष 2024-25 में यह 29.51 लाख हेक्टेयर रह गया. 2025-26 में गन्ने की खेती का क्षेत्रफल और घटकर 28.61 लाख हेक्टेयर हो गया. यानी तीन साल में 1.05 लाख हेक्टेयर जमीन गन्ने की खेती से बाहर हो गई. यही बदलाव अब चीनी के उत्पादन पर भी साफ दिखाई दे रहा है.

रकबा चार फीसदी घटा, चीनी 14 फीसदी कम हो गई

गन्ने की खेती में गिरावट भले करीब चार फीसदी रही हो, लेकिन चीनी उत्पादन इससे कहीं ज्यादा घट गया. 2023-24 में प्रदेश में 104.13 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था. 2024-25 में यह घटकर 92.45 लाख टन रह गया. वर्ष 2025-26 में चीनी उत्पादन और गिरकर 89.52 लाख टन रह गया. यानी तीन साल में 14.61 लाख टन की कमी आई. गन्ने के रकबे की तुलना में चीनी उत्पादन में गिरावट करीब साढ़े तीन गुना ज्यादा रही.

सिर्फ जमीन कम नहीं हुई, फसल की उत्पादकता भी घटी

गन्ने का रकबा घटने के साथ प्रति हेक्टेयर उत्पादन में भी गिरावट आई है. 2023-24 में गन्ने की उत्पादकता 2494.20 टन प्रति हेक्टेयर थी. 2025-26 में यह घटकर 2362.21 टन प्रति हेक्टेयर रह गई. इस दोहरी मार का असर चीनी मिलों तक पहुंचा. 2023-24 में 981.68 लाख टन गन्ने की पेराई हुई थी. 2025-26 में यह घटकर 878.12 लाख टन रह गई.

रेड रॉट और कीट ने बढ़ाई मुश्किल

गन्ने की फसल पर बीमारी और कीटों का असर भी पड़ा है. बीकेटी स्थित चंद्रभानु कृषि महाविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह के मुताबिक, मौसम के साथ अगोला बेधक कीट और रेड रॉट बीमारी ने गन्ने को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया. खासकर रेड रॉट बीमारी ने गन्ने की पैदावार को प्रभावित किया. इससे गन्ने की उपलब्धता कम हुई और इसका असर चीनी उत्पादन पर भी पड़ा.

किसान अब मक्का और धान की तरफ क्यों बढ़ रहे?

यूपी के खेतों में दूसरी तरफ तस्वीर बिल्कुल अलग है. मक्का और धान का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. मक्का का उत्पादन 2023-24 में 18.20 लाख टन था. 2024-25 में यह बढ़कर 21.16 लाख टन और 2025-26 में 22.80 लाख टन हो गया.धान का उत्पादन भी इसी दौरान 159.90 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 170.50 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया. यानी जिस अवधि में गन्ने का रकबा घटा, उसी दौरान मक्का और धान का उत्पादन बढ़ता गया. यह बदलाव किसानों की बदलती फसल पसंद की ओर इशारा करता है.

डिस्टिलरी उद्योग ने भी बदली खेती की दिशा

यूपी डिस्टिलर्स एसोसिएशन के महासचिव रजनीश अग्रवाल के मुताबिक, वर्ष 2018 के बाद से कई डिस्टिलरी मक्का, चावल और अन्य अनाज आधारित हो गई हैं. इससे मक्का और धान की मांग बढ़ी है. किसानों को इन फसलों के लिए बढ़ता बाजार दिखाई दे रहा है. ऐसे में गन्ने की तुलना में मक्का और धान की ओर उनका रुझान बढ़ना स्वाभाविक है.

खांडसारी का योगदान भी घटा

चीनी उत्पादन में खांडसारी का योगदान भी कम हुआ है. पहले यह करीब 1.5 फीसदी था, जो अब घटकर करीब आधा रह गया है. इससे चीनी की कुल उपलब्धता पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है.

अब समझिए चीनी के दाम से खेतों का कनेक्शन

पूरी तस्वीर को एक साथ देखें तो कहानी सिर्फ चीनी की कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं है. यूपी में गन्ने का रकबा घट रहा है. गन्ने की उत्पादकता कम हुई है. बीमारी और कीटों ने नुकसान पहुंचाया है. वहीं मक्का और धान की ओर किसानों का रुझान बढ़ रहा है. यानी चीनी महंगी होने की कहानी बाजार से शुरू होकर यूपी के खेतों तक पहुंचती है. अगर गन्ने की खेती का यह रुझान आगे भी जारी रहा, तो चीनी उद्योग के सामने कच्चे माल की उपलब्धता बनाए रखना बड़ी चुनौती हो सकती है.

आंकड़ों में बदलती तस्वीर

मक्का: 18.20 → 21.16 → 22.80 लाख टन धान: 159.90 → 164.80 → 170.50 लाख मीट्रिक टन

यूपी के खेतों में फसल का यह बदलता गणित आने वाले दिनों में चीनी की कीमतों और चीनी उद्योग, दोनों के लिए अहम साबित हो सकता है.

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By खुशी सिंह

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