अगर आप भी लगाते हैं घंटों ईयरफोन-हेडफोन तो हो जाए सावधान, हो सकता है माइग्रेन और याददाश्त जाने का खतरा

रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके ईयरफोन, हेडफोन का घंटों इस्तेमाल सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक हो सकता है. तेज आवाज में सुनने से न सिर्फ कानों की क्षमता कम होती है, बल्कि सिरदर्द, थकान और याददाश्त पर भी असर पड़ता है.

Earphone Side Effects : आज के समय में ईयरफोन, हेडफोन और ईयरबड्स युवाओं की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. सफर हो या पढ़ाई, ऑफिस का काम हो या टहलना, कई लोग घंटों तक कान में ईयरफोन लगाए रहते हैं. लेकिन तेज आवाज में लंबे समय तक ईयरबड्स और हेडफोन का इस्तेमाल सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक तेज आवाज के संपर्क में रहने से कानों की सुनने की क्षमता प्रभावित होने के साथ सिरदर्द, भारीपन, चक्कर, थकान और नींद से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. बच्चों और युवाओं में यह आदत उनकी समझने और याद रखने की क्षमता पर भी असर डाल सकती है.

90-100 डेसिबल तक पहुंच जाती है आवाज

फतेहाबाद रोड स्थित एक होटल में आयोजित सिजिकॉन-2026 कार्यक्रम के दौरान ईएनटी विशेषज्ञों ने ईयरफोन और हेडफोन के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर चिंता जतायी. द कॉकलियर इंप्लांट ग्रुप ऑफ इंडिया (CIGI) की अध्यक्ष बंगलूरू की डॉ. माधुरी गोरे ने बताया कि करीब 40 से 60 डेसिबल तक की आवाज कानों के लिए बेहतर मानी जाती है. वहीं, सड़क पर वाहनों की आवाज, टीवी, मोबाइल, डीजे और निर्माण कार्य जैसी गतिविधियों के कारण आसपास का शोर कई बार 60 से 80 डेसिबल तक पहुंच जाता है. इसके ऊपर जब युवा ईयरफोन या हेडफोन में तेज आवाज सुनते हैं, तो कानों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है.

4 से 6 घंटे लगातार ईयरफोन का इस्तेमाल खतरनाक

विशेषज्ञों के अनुसार कई युवा ईयरबड्स या हेडफोन पर 90 से 100 डेसिबल तक आवाज में लगातार 4 से 6 घंटे तक गाने या अन्य ऑडियो सुनते हैं. लंबे समय तक ऐसा करने से कानों में कई तरह की परेशानी हो सकती है. इसमें सुनने की क्षमता कम होना, सिरदर्द और सिर में भारीपन, चक्कर, थकान, दोहरी आवाज सुनाई देना, चिड़चिड़ापन और नींद कम आने जैसी समस्याएं शामिल हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, 20 वर्ष तक की उम्र के करीब आठ प्रतिशत मरीजों में ऐसी समस्याएं सामने आ रही हैं.

तेज आवाज से कान की कोशिकाओं को नुकसान

CIGI की पूर्व अध्यक्ष डॉ. कल्याणी मांडेक के मुताबिक, तय मानक से अधिक तेज आवाज में लंबे समय तक रहने से कानों की सुनने वाली कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं. लंबे समय तक ऐसी स्थिति बनी रहने पर कान में दर्द, सूजन और सीटी जैसी आवाज सुनाई देने की समस्या हो सकती है. बच्चों में कम उम्र से ही तेज आवाज सुनने की आदत पड़ने पर उनकी सुनने की क्षमता के साथ समझने और याद रखने की क्षमता भी प्रभावित होने की आशंका रहती है.

ईयरफोन इस्तेमाल करते समय इन बातों का रखें ध्यान

ईयरफोन और हेडफोन के इस्तेमाल को लेकर विशेषज्ञ कुछ सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं.

  • संभव हो तो ईयरबड्स का इस्तेमाल कम करें.
  • जरूरत पड़ने पर आवाज को 60 डेसिबल से कम रखें.
  • ईयरबड्स या हेडफोन लगातार इस्तेमाल न करें.
  • करीब 25 से 30 मिनट इस्तेमाल के बाद कुछ देर का ब्रेक लें.
  • मोबाइल और टीवी की आवाज बहुत तेज न रखें.
  • सुबह टहलते या सड़क पर सफर करते समय ईयरफोन लगाने से बचें.
  • सड़क के पास घर होने पर खिड़कियों और दरवाजों को बंद रखने का प्रयास करें.

नवजात बच्चों की सुनने की जांच जरूरी

कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने नवजात बच्चों में सुनने की क्षमता की जांच को भी जरूरी बताया. चेन्नई के पद्मश्री डॉ. मोहन कामेश्वरन और मुंबई के पद्मश्री डॉ. मिलिंद कीर्तने ने कहा कि जन्मजात रूप से मूक-बधिर बच्चों के लिए कॉक्लियर इंप्लांट मददगार हो सकता है.विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नवजात में सुनने की समस्या की समय रहते पहचान हो जाए तो जल्द उपचार शुरू किया जा सकता है. इससे बच्चे की सुनने और बोलने की क्षमता के विकास में मदद मिल सकती है.

एक हजार बच्चों में 3 से 5 में हो सकती है समस्या

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बंगलूरू के डॉ. सुनील दत्त ने कहा की करीब एक हजार बच्चों में 3 से 5 बच्चे जन्मजात रूप से मूक-बधिर हो सकते हैं. ऐसे बच्चों में शुरुआती उम्र में कॉक्लियर इंप्लांट कराने से सुनने और बोलने की क्षमता के विकास में बेहतर परिणाम मिल सकते हैं. विशेषज्ञों ने कहा कि नवजात की स्क्रीनिंग को बढ़ावा देने की जरूरत है, ताकि सुनने की समस्या की पहचान जल्द हो सके और आवश्यक उपचार समय पर शुरू किया जा सके.

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By रवि रंजन कुमार

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