UP Panchayat Election 2026: उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें प्रशासक बनाए जाने के सरकार के फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट से झटका लगा है. कोर्ट ने प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने पर रोक लगाते हुए सरकार के आदेश को असंवैधानिक करार दिया था. अब इस फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार अपील करने की तैयारी में है. सरकार का तर्क है कि असाधारण परिस्थितियों में ग्राम पंचायतों के कार्यों के संचालन के लिए वैकल्पिक प्रशासन की व्यवस्था करने का अधिकार कानून में दिया गया है. ऐसे में अब सरकार अपने तर्कों के साथ कोर्ट का रुख करेगी. इस मामले में आगे की सुनवाई पर सभी की नजरें हैं.
हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ ने 25 जून को दिए आदेश में कहा था कि असंवैधानिक हो चुके नियमों के आधार पर ग्राम प्रधान प्रशासक की भूमिका नहीं निभा सकते. कोर्ट ने सरकार को 13 जुलाई तक पंचायत चुनाव की रूपरेखा पेश करने का भी निर्देश दिया था.
पंचायतों का कार्यकाल पांच साल से अधिक नहीं
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 243C और पंचायतों से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता है. पंचायतों में चुनाव कराना संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है और इसे अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जा सकता.
सरकार किस कानून का दे रही हवाला?
शासन के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1947 की धारा 12 की उपधारा 3A ग्राम पंचायत के कार्यकाल और चुनाव टलने की असाधारण परिस्थितियों से संबंधित है. सरकार का तर्क है कि यदि अपरिहार्य परिस्थितियों या लोकहित में ग्राम पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव कराना संभव नहीं हो तो राज्य सरकार या उसके अधिकृत अधिकारी को ग्राम पंचायतों के कार्यों के संचालन के लिए वैकल्पिक प्रशासन की व्यवस्था करने की शक्ति है.
1984 में किया गया था संशोधन
सरकार की ओर से जिस प्रावधान का हवाला दिया जा रहा है, उसमें ऐतिहासिक संशोधन अप्रैल 1984 में लागू हुआ था. इसी प्रावधान के आधार पर सरकार का कहना है कि विशेष परिस्थितियों में पंचायतों के कामकाज को जारी रखने के लिए वैकल्पिक प्रशासन की व्यवस्था की जा सकती है.
प्रेमलाल पटेल केस का भी जिक्र
हाई कोर्ट ने प्रेमलाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सरकार मामले में दी गई व्यवस्था का भी उल्लेख किया है. इसमें माना गया था कि संबंधित धारा का इस्तेमाल चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए टालने या ग्राम प्रधानों को मनमाने तरीके से प्रशासक बनाकर उनका कार्यकाल बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता है.
चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग का अधिकार
हाईकोर्ट की व्यवस्था के मुताबिक पंचायत चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग का संवैधानिक अधिकार है. ऐसे में सरकार की ओर से प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था को लेकर संवैधानिक सवाल खड़े हुए हैं. अब सरकार इसी मुद्दे पर अपने कानूनी तर्क अदालत के सामने रखेगी.
अब आगे क्या होगा?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सरकार अपील करेगी. सरकार की ओर से अदालत में यह पक्ष रखा जाएगा कि असाधारण परिस्थितियों में ग्राम पंचायतों के संचालन के लिए वैकल्पिक प्रशासन की व्यवस्था का कानूनी प्रावधान मौजूद है. अब देखना होगा कि अपील पर अदालत क्या रुख अपनाती है और प्रदेश में ग्राम पंचायतों के संचालन तथा आगामी चुनाव को लेकर क्या तस्वीर सामने आती है.
सरकार के फैसले पर टिकी नजर
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का मामला अब सीधे कानूनी लड़ाई में पहुंच गया है. हाई कोर्ट की रोक के बाद सरकार के अपील करने के फैसले से यह मामला और महत्वपूर्ण हो गया है. फिलहाल निगाहें सरकार की अगली कानूनी कार्रवाई और अदालत के रुख पर टिकी हैं.
