क्या अल्पसंख्यक संस्थाएं पूरी तरह शिक्षा के अधिकार कानून के दायरे से बाहर हैं : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने अल्पसंख्यकों के स्कूलों के संदर्भ में दायर एक याचिका पर आज केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया. याचिका में इस पहलू पर संविधान पीठ द्वारा फिर से विचार का अनुरोध किया गया है कि क्या सहायता प्राप्त और गैर सहायता वाली अल्पसंख्यक संस्थाएं पूरी तरह से शिक्षा के अधिकार […]

नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने अल्पसंख्यकों के स्कूलों के संदर्भ में दायर एक याचिका पर आज केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया. याचिका में इस पहलू पर संविधान पीठ द्वारा फिर से विचार का अनुरोध किया गया है कि क्या सहायता प्राप्त और गैर सहायता वाली अल्पसंख्यक संस्थाएं पूरी तरह से शिक्षा के अधिकार कानून के दायरे से बाहर हैं.

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति उदय यू ललित की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को भी इस याचिका पर नोटिस जारी किया है. याचिका में इस बिंदु पर फिर से विचार का अनुरोध किया गया है कि क्या शिक्षा के अधिकार कानून में कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए आरक्षण जैसे कुछ प्रावधान अल्पसंख्यक संस्थाओं पर लागू नहीं होते हैं.

न्यायालय ने इससे पहले इस याचिका पर नोटिस जारी किये बगैर ही केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा था. याचिका में कहा गया है कि अल्पसंख्यक संस्थाओं के शिक्षा के अधिकार कानून के दायरे से बाहर रखे जाने के बाद उन्हें तो इस कानून के प्रावधान के अनुसार मान्यता की जरूरत नहीं है.

पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने छह मई, 2014 को अपने फैसले में शिक्षा के अधिकार कानून 2009 को संवैधानिक करार देते हुये कहा था कि यह सहायता प्राप्त या गैर सहायता वाले अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं होता है.
याचिकाकर्ता इंडिपेनडेन्ट स्कूल्स फेडरेशन आफ इंडिया के वकील रवि प्रकाश गुप्ता ने तर्क दिया कि इस फैसले के बाद अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को शिक्षा के अधिकार कानून की धारा 18 और 19 के तहत मान्यता प्राप्त करने की भी आवश्यकता नहीं है.गुप्ता की दलील थी कि देश में तीन हजार से अधिक ऐसे स्कूल हैं जिनमें छात्रों का पंजीकरण शून्य है.

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