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BHU के सर सुंदरलाल अस्पताल ने तलाशा गाल ब्लैडर कैंसर का इलाज, जानें खोज की हर बड़ी बात

IMS-BHU के सर्जिकल आंकोलॉजी विभाग में वरिष्ठ डॉक्टर प्रोफेसर मनोज पांडेय, प्रो. वीके शुक्ला और उनकी शोध छात्रा रुही दीक्षित (प्रथम लेखिका) और मोनिका राजपूत को भारत में पहली बार गाल ब्लैडर कैंसर के बायो मार्कर (जिम्मेदार जीन) खोजने में सफलता मिली है.

By Prabhat Khabar Digital Desk, Varanasi
Updated Date
मरीजों का इलाज करते डॉक्‍टर्स.
मरीजों का इलाज करते डॉक्‍टर्स.
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Varanasi News: गंगा के किनारे रहने वाले लोगों के लिए नासूर और लाइलाज बने गाल ब्लैडर कैंसर (पित्त की थैली का कैंसर) का परमानेंट सॉल्यूशन खोज निकाला है काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के सर सुंदरलाल अस्पताल ने. IMS-BHU के सर्जिकल आंकोलॉजी विभाग में वरिष्ठ डॉक्टर प्रोफेसर मनोज पांडेय, प्रो. वीके शुक्ला और उनकी शोध छात्रा रुही दीक्षित (प्रथम लेखिका) और मोनिका राजपूत को भारत में पहली बार गाल ब्लैडर कैंसर के बायो मार्कर (जिम्मेदार जीन) खोजने में सफलता मिली है. BHU के सर सुंदरलाल अस्पताल में आए 300 मरीजों पर इस तरह का ट्रायल किया गया है.

20 प्रकार के म्यूटेशन

भारत में हर साल 8 लाख लोगों को गाल ब्लैडर कैंसर से ग्रस्त होते हैं. 5 लाख 50 हजार मौतें हो जातीं हैं. इसमें 80 प्रत‍िशत मामले केवल कानपुर से पटना के बीच गंगा घाटी के क्षेत्रों में आती है. वहीं जो लोग यहां से दिल्ली और मुंबई माइग्रेट कर गए हैं उन्हें वहां पर समस्या आती है. इस बीमारी को लेकर शोध करने वाली BHU की महिला वैज्ञानिक, डॉ. रुही दीक्षित ने बताया कि इस बीमारी से पीड़ित मरीजों के खून या फिर ट्यूमर का सैंपल लेकर जीनोम सिक्वेंसिंग की गई तो हर मरीजों में 20 म्यूटेशन का पता चला. इस आधार पर कहा जा सकता है कि ये 20 प्रकार के म्यूटेशन जिस किसी भी मरीज में मिले तो उसे गाल ब्लैडर कैंसर होने की संभावना है.

1 महीने के बजाय मात्र 1-2 दिन ही लगेगा

यह शोध मॉलिक्यूलर बायोलॉजी रिपोर्ट्स में प्रकाशित हो चुकी है. इसके लिये एक RNA चिप तैयार किया जा रहा है, जिससे 10 गुना कम खर्च में मरीज को इस रोग का प्रेडिक्शन किया जा सके. फिलहाल, एक मरीज के टेस्ट में लगभग 10 हजार रुपए का खर्च आया है. वहीं चिप तैयार होने के बाद यह 1000 रुपए पर आ जाएगा. इस टेस्ट में 1 महीने के बजाय मात्र 1-2 दिन ही लगेगा. समय और पैसा दोनों की बचत हो सकेगी. इस चिप को तैयार करने और खोज को वैलिडेट यानी कि स्थापित करने दो साल का समय लगेगा. इसके एक साल बाद यह सुविधा मरीजों को मिलनी शुरू हो सकती है. प्रो. पांडेय ने कहा कि यह RNA बेस्ड रिसर्च है. RNA से ही हमने DNA और प्रोटीन दोनों में क्या डिफेक्ट हो रहा है, इसका पता लगाया है.

रिपोर्ट : विपिन सिंह

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