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महामारी में लॉकडाउन को मानना शरई लिहाज से जरूरी : दारुल उलूम, अलीगढ़ के मुफ्ती बोले- शब-ए-बरात पर कब्रिस्तानों-मस्जिदों में ना जाएं

By Kaushal Kishor
Updated Date
दारुल उलूम देवबंद
दारुल उलूम देवबंद
सोशल मीडिया

लखनऊ / अलीगढ़ : देश के प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थानों में शुमार दारुल उलूम देवबंद ने कोरोना वायरस संक्रमण के मद्देनजर घोषित लॉकडाउन के पालन को शरई लिहाज से जरूरी बताते हुए कहा है कि मौजूदा हालात में शब-ए-बरात में घरों में ही रह कर इबादत करना शरई और कानूनी दोनों ही लिहाज से जरूरी है. वहीं, अलीगढ़ के मुख्य मुफ्ती खालिद हमीद ने गुरुवार को शब-ए-बरात के मौके पर मुसलमानों को कब्रिस्तानों व मस्जिदों में कतई ना जाने का निर्देश देते हुए कहा कि मौजूदा हालात में इन पाबंदियों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए.

देश के प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थानों में शुमार दारुल उलूम देवबंद ने कोरोना वायरस संक्रमण के मद्देनजर घोषित लॉकडाउन के पालन को शरई लिहाज से भी जरूरी बताते हुए कहा है कि मौजूदा हालात में शब-ए-बरात में घरों में ही रह कर इबादत करना शरई और कानूनी दोनों ही लिहाज से जरूरी है.

दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी ने मुस्लिम कौम को लिखे खुले पत्र में कहा कि देश की सरकार ने कोरोना महामारी के मद्देनजर लॉकडाउन घोषित किया है. इसे मानना हर नागरिक का फर्ज है. महामारी से संबंधित शरीयत की हिदायत भी यही है. उन्होंने कहा कि पैगंबर मोहम्मद साहब की हदीस और हजरत उमर फारूक समेत तमाम सहाबा कराम के अमल से भी यही मार्गदर्शन मिलता है. लिहाजा मौजूदा हालात में एहतियात करना और घरों में ही रहना शरई और कानूनी दोनों ही एतबार से जरूरी है. तमाम मुसलमान लॉकडाउन की पाबंदियों को मानें और किसी तरह की गफलत ना बरतें.

मौलाना नोमानी ने एक अहम मसले की तरफ ध्यान दिलाते हुए यह भी कहा कि यह सही है कि दुनिया में सारी चीजें उस परम पिता के हुक्म से होती हैं. मगर, हमें महामारी का उपाय अपनाने का हुक्म भी शरीयत ही से मिला है. उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के खतरे के तहत दुनिया के ज्यादातर देशों की तरह हमारे मुल्क में भी लॉकडाउन लागू है.

लॉकडाउन के 14 दिन गुजर चुके हैं, लेकिन अभी तक यह शिकायत सुनने में आती है कि लोग इस पाबंदी का पूरी तरह पालन नहीं कर रहे हैं. शायद ऐसे लोग उन पाबंदियों को सिर्फ हुकूमत की प्रशासनिक नीति के तौर पर देखते हैं. तमाम मुसलमानों से यह गुजारिश है कि हुकूमत और कानून की पाबंदी मानना भी हमारी अखलाकी और शरई जिम्मेदारी है.

मौलाना नोमानी ने कहा कि हदीस के मुताबिक शब-ए-बरात में इबादत, दुआ करना और उसके अगले दिन रोजा रखना चाहिए. लेकिन, इनमें से कोई भी काम सामूहिक रूप से करने का कोई सुबूत नहीं है. इस रात में कब्रिस्तान जाने की भी कोई व्यवस्था नहीं है. इसके बावजूद बहुत से लोग कब्रिस्तान या मस्जिदों में सामूहिक रूप से जाते हैं. उन्होंने कहा कि तमाम मुसलमानों से आग्रह है कि वे मौजूदा हालात में शब-ए-बरात में मस्जिदों या कब्रिस्तान जाने का इरादा भी ना करें. अपने बच्चों और नौजवानों को बाहर निकलने से मना करें. चिराग जलाने या पटाखे जलाने जैसी रस्मों और 'गुनाहों' से मुकम्मल परहेज करें.

शब-ए-बरात पर कब्रिस्तानों और मस्जिदों में कतई ना जाएं : मुफ्ती

अलीगढ़ के मुख्य मुफ्ती खालिद हमीद ने गुरुवार को शब-ए-बरात के मौके पर मुसलमानों को कब्रिस्तानों और मस्जिदों में कतई ना जाने का निर्देश देते हुए कहा कि मौजूदा हालात में इन पाबंदियों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए. मुफ्ती हमीद ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर कहा कि शब-ए-बरात पर अपने पुरखों की कब्र पर फातिहा पढ़ना और रोशनी करना एक रवायत है. मगर, कोरोना वायरस संक्रमण के मद्देनजर मुसलमानों को कब्रिस्तान और मस्जिदों में बिल्कुल भी नहीं जाना है.

उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में सभी मुस्लिम अपने घरों में अपने पुरखों के लिए फातिहा और दुआ करें और किसी भी सूरत में यह ना लगे कि ये चीजें सिर्फ कब्रिस्तानों और मस्जिदों में ही की जा सकती हैं. मुफ्ती ने शब-ए-बरात पर पटाखे जलाये जाने का सख्ती से मना करते हुए कहा कि मुस्लिम कौम के एक तबके में यह हाल के कुछ वर्षों में यह रवायत फैली है. इसका शब-ए-बरात के अकीदे से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है.

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