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Exclusive: अलीगढ़ में धान की बोली से पहले हो जाता है 'अंगोछा में सौदा', छला जा रहा किसान, आढ़ती खा रहे पकवान

अलीगढ़ की मंडियों में धान की बोली से पहले ही 'अंगोछा में सौदा' हो जाता है. इससे जहां किसान छले जा रहे हैं, वहीं आढ़ती मालामाल हो रहे हैं. किसानों को अपनी फसल मजबूरन कम दामों में बेचनी पड़ती है.

By Prabhat Khabar Digital Desk, Aligarh
Updated Date
Exclusive: अलीगढ़ में धान की बोली से पहले हो जाता है 'अंगोछा में सौदा'
Exclusive: अलीगढ़ में धान की बोली से पहले हो जाता है 'अंगोछा में सौदा'
प्रभात खबर

Aligarh News: अलीगढ़ में इन दिनों मंडी में किसान अपने धान की फसल को ले जा रहे हैं, जहां पर उन किसानों के धान की बोली लगती है, पर बोली से पहले ही 'अंगोछा में सौदा' हो जाता है जिससे किसान को धान का मूल्य वह नहीं मिल पाता, जो उसको मिलना चाहिए‌. बोली में शामिल होने वाले कुछ चंद आढ़ती अपने मनमाने रेट पर धान को खरीद लेते हैं और किसान मायूस होकर अपनी फसल को कम से कम दामों में बेचकर चला जाता है.

कैसे होता है 'अंगोछा में सौदा'

अलीगढ़ की धनीपुर मंडी में धान बेचने आए किसान विजेंद्र कुमार शर्मा ने प्रभात खबर को बताया कि 'अंगोछा में सौदा' कैसे होता है? उन्होंने बताया कि धान की बोली बोलने से पहले ही जो पक्के लेवाल होते हैं यानी कि धान को खरीदने वाले, वह फोन इत्यादि के माध्यम से बोली से पहले ही तय कर लेते हैं कि अधिक से अधिक कितने तक बोली पहुंचा कर माल को खरीदना है. इस दौरान जब बोली बोली जाती है, तो जो बोली बोलने वाले होते हैं, पक्के आढ़ती, वह अंगोछा के नीचे अपने हाथ के माध्यम से दूसरे आढ़ती की जो उंगलियां हैं, उनको इस तरीके से दबाते हैं, जिससे संकेत मिलता है, जैसे कि एक उंगली 1000, दो उंगलियां 2000.

किसान प्रेमपाल सिंह
किसान प्रेमपाल सिंह
प्रभात खबर

इस तरीके से इन के कुछ संकेत होते हैं, जिसके माध्यम से अंगोछा में सौदा हो जाता है और किसान को पता भी नहीं लगता और बोली लग जाती है. किसान प्रेमपाल सिंह ने बताया कि धान की बोली से पहले ही आढ़तियों के द्वारा सेटिंग कर ली जाती है. उसके बाद तो बोली बोलना एक काम चलाऊ प्रक्रिया ही रह जाती है.

धान की बोली में यह होता है नजारा

मंडी में जब धान की बिक्री के लिए बोली होती है, तो बीच में एक व्यक्ति खड़ा होता है, जो बोली की काउंटिंग करता है. उसके चारों तरफ घेरा बनाए 30 से 40 लोग होते हैं, परंतु देखने में अधिकतर यह मिलता है कि उनमें से कुछ चंद यानी 4 ही बोली लगाते हैं. वही, उसमें कीमतें बढ़ाते हैं, बाकी सब या तो नजारा देखने वाले होते हैं या फिर उन्हें बोली बोलने का मौका नहीं मिलता. हर एक बोली में अधिकतर वही लोग बोली लगाते हैं.

पक्के आढ़तियों ने इस पर कहा यह

पक्का आढ़तिया मुकेश शर्मा
पक्का आढ़तिया मुकेश शर्मा
प्रभात खबर

जब इस बारे में मंडी के पक्के आढ़ती मुकेश शर्मा से प्रभात खबर की बात हुई तो, उन्होंने बताया कि बोली के दौरान मंडी समिति के इंस्पेक्टर, सहायक आदि सभी होते हैं. उनके सामने ऐसा संभव नहीं है, पर हां 10 से 12 तक ऐसे पक्के आढ़ती हैं जो, हर बोली में शामिल होते हैं.

आढ़तिया अब्दुल
आढ़तिया अब्दुल
प्रभात खबर

अन्य आढ़ अब्दुल ने बताया कि अनाज तो पक्के आढ़ती ही खरीदेंगे, क्योंकि उन के माध्यम से ही आगे अनाज को राइस मिल में भेजा जाता है. वहीं गिने-चुने पक्के आढ़ती हैं तो हर बोली पर उन्हीं में से होना वाजिब है.

धनीपुर मंडी समिति सचिव ने कहा यह

मंडी सचिव वीरेंद्र चंदेल
मंडी सचिव वीरेंद्र चंदेल
प्रभात खबर

कृषि उत्पादन मंडी समिति के सचिव वीरेंद्र चंदेल ने प्रभात खबर को बताया कि धान की जब बोली होती है, वहां मंडी समिति के इंस्पेक्टर, नामित कर्मचारी व मैं स्वयं रहता हूं, बोली में इस तरीके से आढ़तियों का खेल पुराने समय में होता हो, तो पता नहीं पर इस समय ऐसा कुछ नहीं है. बोली सेक्टर के अनुरूप कराई जाती है और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कहीं अधिक अनाज की कीमत दिलाई जा रही है. अलीगढ़ धनीपुर मंडी में तो किसानों को अच्छा और अधिक रेट मिलता है. आज भी 1509 धान 2785 रुपये प्रति क्विंटल, सुगंधा 2451, शरवती 2100 धान का रेट रहा. अंगोछा में सौदा जैसा कुछ नहीं है, पर अगर ऐसा कुछ पाया जाता है तो उनके खिलाफ कार्यवाही भी की जाएगी.

विदित है कि मंडी सचिव वीरेंद्र चंदेल ने चार्ज लेने के बाद मंडी में अव्यवस्थित चीजों को व्यवस्थित किया है. अभी कुछ दिन पहले लापरवाही पर मंडी के चार आढ़तियों के लाइसेंस निरस्त किए गए हैं.

यूपी की अधिकतर मंडियों में बोली पर हो रहा ऐसा खेल

अंगोछा में सौदा व बोली से पहले की धान की बोली करने में सेटिंग उत्तर प्रदेश के अधिकतर मंडियों में किसानों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है. उत्तर प्रदेश के सरकार द्वारा धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को मिल भी जाता है, पर उससे कहीं अधिक कीमत पर पक्के आढ़तियों का कब्जा है, जिससे आढ़तिए मलाई खा रहे हैं और किसान के साथ में कुछ नहीं.

रिपोर्ट- चमन शर्मा

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