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ग्वालियर में DSP ने ठंड से ठिठुरते भिखारी की मदद के लिए रोकी गाड़ी, लेकिन पास जाकर देखा तो रह गए भौंचक

ग्वालियर पुलिस की अपराध शाखा के डीएसपी रत्नेश सिंह तोमर गाड़ी से कहीं जा रहे थे, तो उन्होंने एक भिखारी को ठंड से ठिठुरते हुए देखा. भिखारी की स्थिति भांपकर उन्होंने उसे मदद करने की सोची. गाड़ी रोककर जब वे उसके पास जाकर बातचीत की, तो उसे देखकर वे पूरी तरह भौंचक रह गए. वह भिखारी कोई और नहीं, बल्कि 15 साल पहले उनके साथ काम करने वाला जांबाज पुलिस अधिकारी निकला.

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15 साल पहले बिछुड़े अपने सहयोगी मनीष मिश्रा के साथ ग्वालियर पुलिस की अपराध शाखा के डीएसपी रत्नेश सिंह तोमर.
15 साल पहले बिछुड़े अपने सहयोगी मनीष मिश्रा के साथ ग्वालियर पुलिस की अपराध शाखा के डीएसपी रत्नेश सिंह तोमर.

ग्वालियर : कई बार आदमी भिखारी को देखकर नजरअंदाज कर देता है. लेकिन, इन्हीं भिखारियों में से कुछ आदमी सूरमा होते हैं, लेकिन कई कारणों से वे घर-संसार छोड़कर दुनिया में दर-ब-दर भटकने का फैसला कर लेते हैं और जब जीवन-यापन का कोई ठोस जरिया नहीं मिलता है, तो भिखारी बन जाते हैं. ऐसा ही एक वाकिया मध्य प्रदेश के ग्वालियर में सामने आया है.

दरअसल, ग्वालियर पुलिस की अपराध शाखा के डीएसपी रत्नेश सिंह तोमर गाड़ी से कहीं जा रहे थे, तो उन्होंने एक भिखारी को ठंड से ठिठुरते हुए देखा. भिखारी की स्थिति भांपकर उन्होंने उसे मदद करने की सोची. गाड़ी रोककर जब वे उसके पास जाकर बातचीत की, तो उसे देखकर वे पूरी तरह भौंचक रह गए. वह भिखारी कोई और नहीं, बल्कि 15 साल पहले उनके साथ काम करने वाला जांबाज पुलिस अधिकारी निकला.

कचरे से खाना ढूंढ़ रहा पुलिस का अफसर

पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) रत्नेश सिंह तोमर ने शनिवार को पत्रकारों को बताया कि वह और उनके साथी डीएसपी विजय सिंह बहादुर मंगलवार रात को यहां एक मैरिज हॉल के पास अपनी गाड़ी में थे. तभी उन्हें मानसिक रुप से विक्षिप्त एक भिखारी जैसा दिखने वाला व्यक्ति ठंड से बुरी तरह कांपते हुए कचरे के ढेर से खाना ढूंढता हुआ दिखाई दिया.

2005 में दतिया में निरीक्षक पद तैनात रहते हुए गायब हो गए थे मनीष मिश्रा

तोमर ने बताया कि उसे देखने के बाद वे दोनों गाड़ी से उतरे और हममें से एक ने उस व्यक्ति को अपनी गर्म जैकेट पहनने को दी. तभी उस व्यक्ति ने हम दोनों को हमारे पहले नाम से पुकारा, तो हम दोनों चौंक गए. बाद में गौर से देखने पर हमने पाया कि वह और कोई नहीं, बल्कि पुलिस बल में हमारे पूर्व सहकर्मी मनीष मिश्रा है, जो 2005 में दतिया में निरीक्षक के पद पर रहते हुए लापता हो गए थे. ग्वालियर पुलिस की अपराध शाखा में डीएसपी तोमर ने कहा कि इतने सालों में किसी को भी उनके ठिकाने का पता नहीं था.

अच्छे एथलीट के साथ शार्प शूटर थे मिश्रा

इसके बाद तोमर और सिंह उन्हें एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) द्वारा संचालित आश्रय स्थल ले गए, जहां मिश्रा को अगली व्यवस्था होने तक रखा जाएगा. तोमर ने बताया कि मिश्रा एक अच्छे एथलीट और शॉर्प शूटर थे. वह हमारे साथ 1999 में पुलिस बल में शामिल हुए थे. वह कुछ वर्षो बाद मानसिक समस्याओं से पीड़ित हो गए थे. उनके परिवार ने उनका उपचार भी कराया था, लेकिन कुछ समय बाद वह लापता हो गए थे. डीएसपी ने कहा कि हम सभी उनके दोस्त यह प्रयास करेंगे कि मिश्रा का अच्छे से उपचार कराया जाए, ताकि वह फिर से अपना सामान्य जीवन जी सकें.

लापता होने के बाद पत्नी ने भी दे दिया तलाक

मीडिया की खबरों के अनुसार, उन्होंने 2005 तक पुलिस की नौकरी की. अंतिम बार में दतिया में बतौर निरीक्षक के पद पर तैनात थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी मानसिक स्थिति खराब होती चली गई. घरवाले उनसे परेशान हो गए. इलाज के लिए उनको कई जगहों पर ले जाया गया, लेकिन एक दिन वह परिवारवालों की नजरों से बचकर गायब गए. काफी खोजबीन के बाद परिवार को भी नहीं पता चल पाया कि मनीष कहां चले गए. इसके बाद उनकी पत्नी भी उन्हें छोड़कर चली गई. बाद में पत्नी ने तलाक ले लिया. इधर, धीरे-धीरे मनीष भीख मांगने लगे और भीख मांगते-मांगते करीब 15 साल गुजर गए.

पुलिस महकमे में है मनीष का पूरा परिवार

मीडिया की खबरों के अनुसार मनीष के भाई भी थानेदार हैं. पिता और चाचा एसएसपी के पद से रिटायर हुए हैं. उनकी एक बहन किसी दूतावास में अच्छे पद पर हैं. मनीष की तलाकशुदा पत्नी भी न्यायिक विभाग में पदस्थ हैं. फिलहाल, मनीष के इन दोनों दोस्तों ने उसका इलाज फिर से शुरू करा दिया है.

Posted By : Vishwat Sen

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