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डीजीपी नियुक्ति मामला : यूपीएससी को नियुक्ति की वैधानिकता जांचने का अधिकार नहीं, झारखंड सरकार ने यूपीएससी को भेजा जवाब

By Prabhat Khabar Print Desk
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डीजीपी नियुक्ति मामला
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शकील अख्तर, रांची : संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को राज्य सरकार द्वारा डीजीपी के पद पर की गयी नियुक्ति की वैधानिकता जांचने का अधिकार नहीं है. यह अधिकार हाइकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को है. सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें यूपीएससी द्वारा तैयार पैनल से डीजीपी के पद पर नियुक्त केएन चौबे को पद से हटाने और एमवी राव को डीजीपी का प्रभार दिये जाने को चुनौती दी गयी थी. यूपीएससी का अधिकार सिर्फ महानिदेशक के पद के लिए पैनल तैयार करना है.

यूपीएससी द्वारा झारखंड सरकार के अनुरोध पर डीजी के पद पर प्रोन्नति के लिए पैनल तैयार करने से इनकार करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विपरीत है. विवाद के आलोक में राज्य सरकार द्वारा यूपीएससी को भेजे गये जवाब में इन तथ्यों का उल्लेख किया गया है.

राज्य सरकार ने जवाब में कहा है कि यूपीएससी को संविधान के अनुच्छेद 315 और 320 के तहत मिली शक्तियां सिर्फ केंद्रीय सेवाओं में नियुक्तियों के लिए परीक्षाएं आयोजित करने, सिविल सेवा में नियुक्ति करने और संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ की जानेवाली अनुशासनात्मक कार्रवाई के मामले में सलाह देने से संबंधित हैं. संविधान ने यूपीएससी को राज्य सरकार द्वारा की जानेवाली नियुक्तियों के वैधानिकता जांचने का अधिकार नहीं दिया है. यूपीएससी द्वारा झारखंड में डीजी के पद के लिए नया पैनल तैयार करने से इनकार किया जा रहा है.

डीजीपी का पदस्थापन राज्य का अधिकार : सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार व अन्य के मामले में यूपीएससी को सीमित अधिकार दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने न्यायादेश में यूपीएससी को अधिकारियों के सेवा इतिहास और कार्य दक्षता को देखते हुए डीजीपी के पद पर प्रोन्नति देने के लिए एक पैनल बनाने का अधिकार दिया है. इन प्रोन्नत अधिकारियों में से डीजीपी के पद पर किसे पदस्थापित किया जाये, यह पूरी तरह राज्य सरकार का अधिकार है.

झारखंड ने दिया दूसरे राज्यों का हवाला : सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सभी दलीलों को अमान्य करते हुए याचिका खारिज कर दी. साथ ही केएन चौबे ने भी सरकार को यह लिख कर दिया है कि वह डीजीपी के रूप में काम करने के इच्छुक नहीं है. यूपीएससी को भेजे गये जवाब में झारखंड सरकार ने जम्मू-कश्मीर और आंध्र प्रदेश में हुए डीजीपी के तबादले का उल्लेख किया है. इन राज्यों में हुए तबादलों के बाद यूपीएससी ने नया पैनल बनाने में वह रवैया नहीं अपनाया, जो झारखंड के सिलसिले में अपनाया. आंध्र प्रदेश में तो नयी सरकार के आते ही डीजीपी के पद पर कार्यरत अधिकारी का तबादला कर दिया गया. जम्मू-कश्मीर के मामले में यूपीएससी द्वारा दी गयी दलील भी सही नहीं है.

बिगड़े हालात के आधार पर तबादला : सरकार की ओर से भेजे गये जवाब में जम्मू-कश्मीर में डीजीपी के तबादले की चर्चा करते हुए यह कहा गया है कि वहां तबादले का अाधार बिगड़े हालात को सुधारने के लिए उठाया गया प्रशासनिक कदम था. इधर, झारखंड में भी जनवरी 2020 से मार्च 2020 की अवधि में नक्सल गतिविधियों में तेजी, निर्दोष ग्रामीणों की सामूहिक हत्या सहित अन्य घटनाओं में वृद्धि हुई. इस स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने डीजीपी के पद पर नियुक्त केएन चौबे का तबादला किया था.

एमवी राव के पदस्थापन को दी गयी थी चुनौती : राज्य सरकार ने एमवी राव को अपने ही वेतनमान में डीजीपी का प्रभार दिया. केएन चौबे का तबादला करने और एमवी राव को इस पद का प्रभार दिये जाने के सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी थी. इस मामले की सुनवाई के दौरान याचिकादाता की ओर से कोर्ट में वे सभी दलीलें पेश की गयीं, जिनके आधार पर यूपीएससी द्वारा डीजी के पद के लिए नया पैनल तैयार करने से इनकार किया जा रहा है.

Posted by : Pritish Sahay

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