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World Environment day 2022: जानिए सारंडा के बाघमारी ‘भीमा’ की कहानी

सरकारी दस्तावेज बताते हैं पुराने रांची जिला में 1911 से 1913 तक हर वर्ष औसतन 1121 मवेशियाें काे बाघ मार कर खा जाते थे. इसी अवधि में रांची में 177 लाेगाें काे बाघ ने मारा था.

By अनुज कुमार सिन्हा
Updated Date
World Environment day 2022
World Environment day 2022
Prabhat Khabar

एक बाघ के दर्शन के लिए तरस रहा है झारखंड, लेकिन दर्शन नसीब नहीं होता. साल में एक-दाे बार यह चर्चा हाे ही जाती है कि अमुक जंगल में बाघ दिखा या बाघ के पदचिह्न दिखे या सीसीटीवी में बाघ दिखा. लेकिन साै-सवा साै साल पहले झारखंड के हालात ऐेसे नहीं थे. बाघाें की अच्छी खासी संख्या थी. अंगरेज अफसराें आैर शिकारियाें के लिए झारखंड पसंदीदा जगह हुआ करता था. उसी दाैरान बाघ-चीता आैर जंगली जानवराें काे मारने के लिए कुछ युवकाें काे बढ़ावा दिया गया था.

ऐसे युवकाें काे बाघमारी कहा जाता था. बाघ-चीता मारने पर इनाम मिलता था. इसी पैसे की लालच में झारखंड से बाघ साफ हाे गये. उस समय के सरकारी दस्तावेज, अंगरेज लेखकाें-शिकारियाें की किताब-डायरी में सारंडा, पाेड़ाहाट, बरवाडीह, सिमडेगा-गुमला (पुराना रांची जिला) आदि जगहाें में बड़ी संख्या में बाघाें के हाेने-उन्हें मारने का जिक्र है.

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1911 से 1913 यानी तीन वर्ष में बाघ ने सिर्फ पुराने रांची जिला में 177 लाेगाें काे मार डाला था, जिसके बाद चले अभियान में 34 बाघाें काे मार डाला गया. एक बाघ मारने पर सरकार की आेर से पांच साै रुपये का इनाम दिया जाता था. इसी इनाम के चक्कर में बाघाें का सफाया हाे गया.

अंगरेज लेखक ए मरवीन स्मिथ ने स्पॉट एंड वेंचर इन इंडियन जंगल नामक पुस्तक (लंदन से 1904 में प्रकाशित) में सारंडा के कुछ गांवाें की घटनाओं का उल्लेख किया है, जाे साै-सवा साै साल पहले की स्थिति का प्रमाणिक दस्तावेज है. सारंडा में मनाेहरपुर के पास काेयल नदी के किनारे समीज है. अब ताे वहां प्रसिद्ध आश्रम भी है.

पास में ही एक गांव बारा (अभी इसे बारा डुंगरी कहा जाता है) है. इसी गांव में साै-सवा साै साल पहले भीमा नामक युवक रहता था. वह बाघ, चीता, भालू मारने में माहिर हाे गया था. अासपास के गांवाें में भीमा जैसे और भी युवक (बाघमारी) थे जाे बाघ-चीता मारा करते थे.

भीमा काे अंगरेज अफसर-शिकारी पसंद करते थे. उस भीमा ने अफसराें काे बाघ से जुड़ी अपनी कहानी बतायी थी. उसी की जुबानी कहानी सुनिए. ‘मेरा नाम भीमा है. बारा में रहता हूं. जाति से तांती हूं. छाेटा बाघ (पैंथर) ने मुझे बाघमारी बनाया है. तीन साल पहले एक बाघ ने बारा में मुझ पर हमला कर मुझे घायल कर दिया था. मैंने कुल्हाड़ी से उस पर प्रहार किया. उसका एक कान कट गया था. गत वर्ष जब उसने माधाे के बेटे काे मार कर खा गया, तब मैंने गुस्से में उसे मार डाला. बदला लेने के लिए मैं बाघमारी बना हूं.

बाघ के हमले से मेरे चेहरे पर निशान बन गये थे, जिसे देख कर लड़कियां मुझ पर हंसती थीं. इसलिए मैं बदला लेना चाहता था. कुछ साल पहले मैंने अपने गांव की एक महिला के लिए कपड़े की सिलाई की थी. उसने पूरा पैसा नहीं दिया. पैसा मांगने पर उसने मुझे श्राप दिया कि तुम्हें बाघ खा जायेगा.

इसके कुछ दिनाें बाद ही एक बाघ ने घर में मेरी दाे बकरियाें काे मार दिया. जब उसने तीसरी बकरी पर हमला किया ताे मैं पहुंच गया अाैर बाघ ने मुझे भी घायल कर दिया. तभी मैंने तय कर लिया था कि बदला लेना है. उसके बाद मैंने बाघ मारने का तरीका सीखा. माैन सिंह ने मुझे यह सब सिखाया. तीन साल से मैं बाघमारी हूं. मैंने अभी तक दाे बाघ, दस पैंथर्स, दाे चीता आैर पांच भालू मारा है.

सरकार ने मुझे हर बाघ काे मारने पर 25 रुपये, चीता-पैंथर काे मारने पर पांच-पांच रुपये का इनाम दिया है. भालू मारने का सरकार ने एक पैसा भी नहीं दिया. लेकिन इन जानवराें से प्रताड़ित गांववालाें ने मुझे बाघ-पैंथर काे मारने पर चार-चार सेर धान दिया था. जिस गांव में मैं जाता हूं, लाेग अपने घराें में खाना खिलाते हैं. मैं सिर्फ अपने गांव बारा के आसपास के 10 मील तक ही शिकार करता हूं.

मैं तीर काे जहरीला बनाने के लिए चाईबासा से डकारा खरीद कर लाता हूं. एक ताेला का दाम चार आना देना पड़ता है. डकाेरा काेलकाता से आता है. जहरीला तीर लगने से जानवर कुछ ही घंटाें में मर जाता है. बाघ जल्दी मरते हैं लेकिन भालू नहीं. जाे बाघ तीर लगने के बाद नहीं मरते, वे इतने कमजाेर हाे जाते हैं कि हमला नहीं कर सकते. मैं दाे काेबरा भी रखता हूं जिसके जहर का उपयाेग बाघ काे मारनेवाले तीर में करता हूं. जब भी कभी हम बाघ-चीता काे मारने के लिए नये गांव में जाते हैं, एक उजले मुर्गे की बलि देकर पूजा करते हैं.’

भीमा की कहानी बताती है कि सारंडा में बाघाें और चीताओं की कमी नहीं थी लेकिन उनका जमकर शिकार किया गया, मारा गया. दरअसल उन दिनाें जंगल आैर घने थे. बाघाें-चीताआें के हमले में अनेक ग्रामीण मारे जाते थे, गाय-बकरी काे खा जाते थे. ग्रामीण परेशान थे.

उन्हीं की आड़ में शिकारियाें ने अंगरेज अफसराें और सरकार की सहमति से बाघाें का सफाया करने के लिए भीमा जैसे युवाआें काे बढ़ावा दिया, जिसका दुष्परिणाम है कि आज सारंडा में एक भी बाघ नहीं है. सरकार एक बाघ मारने के लिए वर्ष 1900 के पहले 25 रुपये का इनाम देती थी.

बाद में इसे बढ़ा दिया गया. सिर्फ सारंडा ही नहीं, कई अन्य जिलाें में भी बाघाें का सफाया हुआ था. सरकारी दस्तावेज बताते हैं पुराने रांची जिला में 1911 से 1913 तक हर वर्ष आैसतन 1121 मवेशियाें काे बाघ मार कर खा जाते थे. इसी अवधि में रांची में 177 लाेगाें काे बाघ ने मारा था (संदर्भ : रांची डिस्ट्रिक्ट गैजेटियर).

इसके बाद अंगरेज सरकार ने घाेषणा कर दी कि एक बाघ मारने पर ग्रामीणाें काे पांच साै रुपये दिये जायेंगे. यह बड़ी राशि थी आैर इसी इनाम की लालच में ताेरपा, बानाे, काेलेबीरा, कुरडेग, चैनपुर आदि इलाकाें में बाघाें का सफाया हाेने लगा.

पांच आदमखाेर बाघ समेत 34 बाघाेें काे मार डाला गया. इसी दाैरान रांची जिले में 207 चीताआें काे मार डाला गया. साै साल पहले की गयी गलती (बाघाें काे मारने के लिए बढ़ावा देना) की सजा अब झारखंड भुगत रहा है. जिस एक बाघ काे मारने के लिए सरकार पांच साै रुपये का इनाम देती थी, आज एक बाघ काे खाेजने-बचाने के लिए कराेड़ाें रुपये खर्च कर रही है, फिर भी सफलता नहीं मिलती.

बाघाें की अच्छी खासी संख्या थी. अंगरेज अफसराें और शिकारियाें के लिए झारखंड पसंदीदा जगह हुआ करता था. उसी दाैरान बाघ-चीता आैर जंगली जानवराें काे मारने के लिए कुछ युवकाें काे बढ़ावा दिया गया था. ऐसे युवकाें काे बाघमारी कहा जाता था. बाघ-चीता मारने पर इनाम मिलता था. इसी पैसे की लालच में झारखंड से बाघ साफ हाे गये.

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