संथाली वाद्ययंत्र ‘बानाम’ को रोजगार से जोड़ा बॉलीवुड व विदेशों में भी मांग, 1000 ऑर्डर मिले

By Prabhat Khabar Digital Desk
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चाकुलिया : संगीत-नृत्य के लिए वाद्ययंत्र जरूरी है. वाद्ययंत्र संगीत को श्रवणीय और आकर्षक बनाते हैं. संथाली समाज की विद्या की देवी बिदु-चांदान का वाद्य यंत्र ‘बानाम’, जो विलुप्त होने के कगार पर था. लेकिन, यह आज चाकुलिया की बरडीकानपुर-कालापाथर पंचायत के माछकांदना गांव के युवाओं के हुनर व प्रयास से फिर से चलन में लौट आया है. साथ ही रोजगार का साधन भी बन रहा है. युवाओं ने इस वाद्ययंत्र का निर्माण कर प्राचीन कला व संस्कृति को जीवंत रखा है.

दुर्गा प्रसाद हांसदा व उनके 10 साथी महेंद्र मुर्मू, रवींद्र हांसदा, चांदराय हांसदा, लेम्हो टुडू, कुशल हांसदा, मानु हांसदा, हाम्बाय हेम्ब्रम, सेराल हांसदा, सिल्हु सोरेन, भोला सोरेन वाद्य यंत्र ‘बानाम’ का निर्माण कर हर माह 15-20 हजार रुपए की आमदनी कर रहे हैं. वहीं, परंपरागत वाद्ययंत्र को जीवित रखने में अपना योगदान दे रहे हैं.

संथाली समाज का पारंपरिक वाद्य यंत्र है ‘बानाम’

‘बानाम’ संथाली समाज का एक पारंपरिक वाद्य यंत्र है. हाल के दिनों में यह वाद्य यंत्र विलुप्त होने के कगार पर है. दुर्गा व उसके साथियों ने बनाम को एक नया जीवन दे दिया है. दुर्गा ने बताया, बिदु चांदान को संथाली समाज के लोग विद्या की देवी के रूप में पूजते हैं. इस पूजा में बनाम वाद्य यंत्र का विशेष तौर पर इस्तेमाल होता है. ‘बानाम’ वाद्य यंत्र व बांसुरी का इस्तेमाल एक साथ किया जाता है.

‘बानाम’ में गम्हार व डगर की लकड़ी

बानाम वाद्य यंत्र बनाने के लिए गम्हार व डगर की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. घोड़े की पूंछ के बाल कोलकाता से मंगाये जाते हैं. इसकी कीमत 5 हजार रुपए प्रति किलो है. हर महीने में 200 से 300 बानाम बनाकर बेच देते हैं.

वन विभाग की प्रदर्शनी में न्योता

राज्य की राजधानी रांची में वन विभाग की ओर से हर साल पारंपरिक कला-संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है. इस प्रदर्शनी में दुर्गा को अपने ‘बानाम’ वाद्य यंत्र लेकर पहुंचने का न्योता मिला है. चाकुलिया वन विभाग के पदाधिकारी दुर्गा के संपर्क में हैं.

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