Jharkhand Civic Polls: झारखंड में शहर की सरकार चुनने को लेकर राजधानी रांची के मतदाताओं में उत्साह की भारी कमी देखी जा रही है. आंकड़े गवाह हैं कि रांची नगर निगम के चुनावों में मतदान का प्रतिशत लगातार राज्य के औसत आंकड़ों से काफी नीचे रहा है. शहरी लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में राजधानी रांची के शिक्षित और मध्यम वर्गीय मतदाताओं की यह उदासीनता प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है.
मतदाताओं की भागीदारी में धीमा सुधार
रांची नगर निगम के चुनावी इतिहास पर नजर डालें, तो मतदाताओं की भागीदारी में सुधार की गति बेहद धीमी है. साल 2008 में हुए पहले नगर निगम चुनाव में महज 36 प्रतिशत मतदान हुआ था. पांच साल बाद 2013 के चुनाव में यह आंकड़ा मामूली बढ़त के साथ 38 प्रतिशत तक पहुंचा. वहीं, 2018 के पिछले निकाय चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 49.3 प्रतिशत दर्ज किया गया. हालांकि, यह रांची का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था, लेकिन इसके बावजूद आधे से ज्यादा मतदाताओं ने बूथ तक जाने की जहमत नहीं उठाई.
छोटे निकायों ने पेश की मिसाल
रांची के विपरीत, राज्य के अन्य छोटे नगर निकायों में मतदाताओं ने जबरदस्त भागीदारी दिखाई है. साल 2018 के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड के विभिन्न नगर निकायों का औसत मतदान लगभग 65.15 प्रतिशत रहा था. इस तुलना में रांची नगर निगम करीब 16 प्रतिशत पीछे रहा. विशेषज्ञों का मानना है कि बुंडू, लोहरदगा या अन्य छोटे निकायों में स्थानीय मुद्दों जैसे सड़क, पानी और नाली से मतदाताओं का सीधा जुड़ाव होता है, जिसके कारण वहां मतदान का स्तर ऊंचा रहता है.
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बड़े शहरों में मध्यम वर्ग की बेरुखी
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बड़े शहरों में मध्यम वर्गीय मतदाता स्थानीय निकाय चुनाव को अपेक्षाकृत कम महत्व देते हैं. रांची जैसे महानगर में एक बड़ा वर्ग अपनी नागरिक सुविधाओं के लिए स्वयं के संसाधनों (जैसे निजी बोरिंग या जनरेटर) पर निर्भर रहता है, जिससे ‘शहरी सरकार’ की भूमिका उनके लिए गौण हो जाती है. मतदाता उदासीनता राजधानी में कम वोटिंग का सबसे बड़ा कारण है.
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