रांची. रांची विवि अंतर्गत जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा में कुरमाली विषय के नेट/जेआरएफ उत्तीर्ण विद्यार्थी पिछले ढाई–तीन साल से पीएचडी के लिए गाइड की तलाश में हैं. गाइड नहीं मिलने से उनका रजिस्ट्रेशन भी नहीं हो पा रहा है. विद्यार्थियों का कहना है कि विवि नियमानुसार वे ह्यूमिनिटिज विषयों के साथ पीएचडी कर सकते हैं, लेकिन आपसी खींचतान के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है. गाइड नहीं मिलने से नेट/जेआरएफ की अवधि भी समाप्त हो सकती है. वर्तमान में कुरमाली विषय में रांची विवि में दो ही नियमित शिक्षक कार्यरत हैं. इनमें से केवल एक ही शिक्षक पीएचडी शोध निर्देशन के लिए योग्य हैं, लेकिन उनकी निर्धारित सीटें पहले ही भर चुकी हैं. विवि ने कुरमाली सहित मुंडारी, संताली, हो, खड़िया, खोरठा, पंचपरगनिया, नागपुरी, कुड़ुख जैसी भाषाओं को मानविकी संकाय से अलग कर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय में शामिल कर दिया है. इसके बाद से कुरमाली विषय के शोधार्थियों को संस्कृत, हिंदी, बांग्ला, दर्शनशास्त्र, अंग्रेजी, उर्दू जैसे विषयों के शिक्षकों के अधीन पंजीकृत होने से रोक दिया गया है. जबकि रेगुलेशन के एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया के प्वाइंट नंबर दो में स्पष्ट उल्लेख है कि क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषा के विद्यार्थी ह्यूमिनिटिज विषयों के शिक्षकों के अधीन शोध कार्य कर सकते हैं. इससे पूर्व कुरमाली शोधार्थी संस्कृत और हिंदी विषयों के शिक्षकों के मार्गदर्शन में शोध कार्य कर चुके हैं. इधर, अबुआ अधिकार मंच के बैनर तले भुक्तभोगी विद्यार्थियों ने अभिषेक शुक्ला और विशाल कुमार यादव के नेतृत्व में विवि के डीएसडब्ल्यू प्रो सुदेश कुमार साहू से मिलकर समस्या से अवगत कराया और एक ज्ञापन भी सौंपा. अभिषेक शुक्ला ने कहा कि जेआरएफ की अवधि तीन साल की होती है. यदि विवि प्रशासन ने तत्काल पहल नहीं की, तो विद्यार्थियों की मेहनत पर पानी फिर जायेगा.
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