रांची : सिर्फ बोनस से किसानों का भला नहीं

रांची : राज्य सरकारें बोनस पर ध्यान न दें, इससे किसानों का भला नहीं होने वाला. बोनस में वृद्धि की बात करने से बेहतर है कि जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइस या एमएसपी) तय है, कम से कम वह किसानों को मिले. अभी खरीफ 2019-20 में धान का एमएसपी 1815 रुपये प्रति क्विंटल […]

रांची : राज्य सरकारें बोनस पर ध्यान न दें, इससे किसानों का भला नहीं होने वाला. बोनस में वृद्धि की बात करने से बेहतर है कि जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइस या एमएसपी) तय है, कम से कम वह किसानों को मिले. अभी खरीफ 2019-20 में धान का एमएसपी 1815 रुपये प्रति क्विंटल तय है.
इधर देखा जा रहा है कि किसान 1200-1300 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खुले बाजार में अपनी धान बेच रहे हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए. कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) के अध्यक्ष विजय पॉल शर्मा ने उक्त बातें कही. वह खरीफ 2020-21 के लिए विभिन्न फसलों के मूल्य (नयूनतम समर्थन) निर्धारण के लिए अायोजित क्षेत्रीय बैठक में बोल रहे थे.
होटल बीएनआर-चाणक्य में आयोजित बैठक में झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, प बंगाल व अोड़िशा सरकार के प्रतिनिधि तथा वहां के प्रगतिशील किसान उपस्थित थे. श्री शर्मा ने कहा कि बोनस वृद्धि के बजाय हमें किसानों व कृषि के लिए बेहतर संरचना निर्माण व सुविधाएं प्रदान करने की जरूरत है. उन्होंने सबको आश्वस्त किया कि आयोग एमएसपी के लिए उत्पाद में लगे सभी तरह की लागत पर पूरा ध्यान रखता है. इसी के अनुरूप फैसले लिये जाते हैं.
कार्यक्रम का संचालन व धन्यवाद ज्ञापन उप निदेशक (पौध संरक्षण) डॉ एमएसएएम शिवा ने किया. बैठक में आयोग की अोेर से इसके अध्यक्ष के अलावा इसके सलाहकार डीके पांडेय, सदस्य सचिव अनुपम मित्रा, सहायक निदेशक सुतापा घोष सहित झारखंड सरकार के कृषि निदेशक छवि रंजन तथा राज्य खाद्य निगम के महा प्रबंधक रामचंद्र पासवान उपस्थित थे.
उत्पादन व उपभोग दोनों में विविधता जरूरी : देश में अनाज की बढ़ती जरूरत, मोटे अनाज में भरपूर पौष्टिक तत्व होने तथा ज्यादातर राज्यों में एक फसली (धान या गेहूं आधारित) कृषि व्यवस्था के संबंध में श्री शर्मा ने कहा कि हमें उत्पादन तथा उपभोग दोनों में विविधता लाने की जरूरत है. सिर्फ गेहूं व धान पैदा करने तथा यही खाने से काम नहीं चलेगा. मोटे अनाज की खपत बढ़ेगी, तो किसान भी इसे पैदा करेंगे.
इससे कृषि उत्पाद में विविधता आयेगी. इस मामले में अोड़िशा ने बेहतर प्रयोग किये हैं. वहीं प्रति पांच किलो राशन में चाल-गेहूं के साथ एक किलो रागी दी जा रही है. दरअसल पहले से हम जो अनाज खाते रहे हैं. फिर से इसकी आदत बनाना देश हित में है तथा स्वास्थ्य के लिए बेहतर भी.
कृषि का हाल व समस्याएं बता कर मदद मांगी : बैठक में शामिल पूर्वी क्षेत्र के सभी पांच राज्यों के प्रतिनिधियों ने अपने यहां किसान व कृषि की हालत तथा समस्याअों का जिक्र किया व आयोग से केंद्रीय मदद (खास कर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने) का आग्रह किया. सभी राज्यों से आये किसानों की समस्या एक ही थी. वह कृषि उत्पादों पर ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग कर रहे थे. वहीं बाजार की समस्या का जिक्र भी सभी किसानों ने किया. झारखंड के किसान पानी-बिजली मांग रहे थे.
सुनिश्चित सिंचाई व कृषि रकबा में झारखंड फिसड्डी
राज्य सिंचाई क्षेत्र खरीफ का रकबा रबी का रकबा
झारखंड 12-13 फीसदी 28 लाख हेक्टेयर 11 लाख हेक्टेयर
बिहार 60 फीसदी 33 लाख हेक्टेयर 22 लाख हेक्टेयर
छत्तीसगढ़ 30 फीसदी 48.20 लाख हेक्टेयर 16 लाख हेक्टेयर
अोड़िशा 66 फीसदी 55 लाख हेक्टेयर 20-22 लाख हेक्टेयर
(पश्चिम बंगाल से आये प्रतिनिधि उपरोक्त आंकड़े नहीं दे सके)
राज्य 2019-20 2020-21 का
प्रस्तावित
झारखंड 2000 रु 2784 रु
बिहार 1815 रु 2784 रु
छत्तीसगढ़ 2500 रु 2550 रु
प.बंगाल 1815 रु 2365 रु
अोड़िशा 1815 रु 2930 रु
दूध की कीमत अधिक मिले
अपने-अपने राज्यों में विभिन्न डेयरी से जुड़े किसान बड़ी हैरानी से यह बता रहे थे कि उन्हें उनके दूध की कीमत 23-26 रु प्रति लीटर मिलती है.
वहीं डेयरी वाले उपभोक्ताअों से दूध की कीमत 45 रु लीटर तक वसूलते हैं. उन्होंने सवाल किया कि क्या डेयरी वालों को प्रोसेसिंग व पैकेजिंग पर उत्पादन लागत के बराबर खर्च होता है? इस मुद्दे पर आयोग के अध्यक्ष श्री शर्मा ने उन्हें सलाह दी कि किसान अपनी संस्था बना कर खुले बाजार या कॉरपोरेट कंपनियों को अपना दूध बेच सकते हैं.

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